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निनाद: पुत्र का मोह

वर्ष 2012 में किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि गर्भस्थ शिशु के लिंग का निर्धारण करने वाले परीक्षणों के कारण विश्व में प्रतिवर्ष पंद्रह लाख बालिकाएं जन्म ही नहीं ले पाती हैं। पुत्र का मोह सभी समाजों में है, लेकिन एशियाई समाजों में यह अपेक्षाकृत अधिक पाया जाता है।
Author May 3, 2015 16:26 pm

वर्ष 2012 में किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि गर्भस्थ शिशु के लिंग का निर्धारण करने वाले परीक्षणों के कारण विश्व में प्रतिवर्ष पंद्रह लाख बालिकाएं जन्म ही नहीं ले पाती हैं। पुत्र का मोह सभी समाजों में है, लेकिन एशियाई समाजों में यह अपेक्षाकृत अधिक पाया जाता है।

केवल अनपढ़ और गरीब बेटी को परिवार पर बोझ नहीं मानते, शिक्षित और संपन्न लोग भी ऐसा ही समझते हैं। इसीलिए देखा गया है कि जिन राज्यों में साक्षरता और संपन्नता औरों के मुकाबले अधिक है, वहां लिंगानुपात में असंतुलन भी औरों की अपेक्षा अधिक पाया जाता है। हरियाणा इसकी जीती-जागती मिसाल है। इस अपेक्षाकृत संपन्न राज्य में प्रति एक हजार पुरुष पर केवल आठ सौ सतहत्तर महिलाएं हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत प्रति एक हजार पुरुष पर नौ सौ चालीस महिलाओं का है।

राज्यसभा सदस्य केसी त्यागी ने संसद के माध्यम से देश का ध्यान इस विसंगति की ओर आकृष्ट करके प्रशंसनीय काम किया है कि इस समस्या से जूझ रहे राज्य हरियाणा ने, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना शुरू की है, एक ऐसे व्यक्ति को अपना ब्रांड एंबेसेडर बनाया है, जिसकी फार्मेसी पुत्रजीवक बीज नामक औषधि बना कर बेचती है। उनका इशारा बाबा रामदेव की ओर था, क्योंकि उनकी दिव्य फार्मेसी ही यह दवाई बेचती है। बाबा रामदेव ने केसी त्यागी से सार्वजनिक रूप से माफी मांगने को कहा है, क्योंकि उनका कहना है कि यह तो प्रजनन क्षमता बढ़ाने वाली औषधि है, पुत्र प्राप्ति में सहायता करने वाली औषधि नहीं। बाबा रामदेव ने यह आरोप भी लगाया कि प्रधानमंत्री पर हमला बोलने के लिए एक फकीर पर निशाना साधा जा रहा है।

बाबा रामदेव की कोई भी बात सीधी नहीं होती। संघ और भाजपा के साथ उनके रिश्ते तभी स्पष्ट हो गए थे, जब माकपा नेता वृंदा करात द्वारा आलोचना किए जाने के बाद संघ कार्यकर्ताओं ने दिल्ली में माकपा मुख्यालय पर हमला कर दिया था। पुत्रजीवक बीज नाम से ही पता चलता है कि औषधि का संबंध पुत्र से है। लेकिन औषधि के पैकेट पर ऐसा कुछ नहीं छपा है। इसके बावजूद बाबा रामदेव की औषधियों से संबंधित एक वेबसाइट पर लिखा हुआ है कि ‘आयुर्वेद के अनुसार यह औषधि पुत्रोत्पत्ति में मदद करती है, लेकिन यह शोध का विषय है। भारत में लोग यह मानते हैं कि यह पुत्र प्राप्त करने के लिए बहुत ही कारगर औषधि है।’ विदेशों में दिव्य फार्मेसी की दवाइयां इसी वेबसाइट के जरिए बेची जाती हैं।

इस वर्ष अट्ठाईस जनवरी को अंगरेजी दैनिक ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ ने इस संबंध में एक खबर भी प्रकाशित की थी। इस सबसे साफ जाहिर होता है कि बच निकलने के लिए एक चोर दरवाजा खुला छोड़ने के बावजूद बाबा रामदेव के लिए इस आरोप का खंडन करना आसान नहीं होगा कि पुत्रजीवक बीज नामक दवाई इसका सेवन करने वालों को आश्वस्त करती है कि इससे उन्हें पुत्र प्राप्ति होगी।

1980 के दशक की शुरुआत में सबसे पहले पंजाब में ऐसी क्लीनिक खुली थीं, जहां गर्भस्थ शिशु के लिंग का पता लगा कर मां-बाप को बता दिया जाता था। इसके बाद अक्सर उन स्त्रियों का गर्भपात करा दिया जाता था, जिनके पेट में बालिका होती थी। यानी बच्चियों को उनके पैदा होने से पहले ही मार दिया जाता था। धीरे-धीरे यह प्रवृत्ति बढ़ती गई और उसी के साथ ऐसी क्लीनिकों की संख्या भी, जो जन्मपूर्व शिशु का लिंग-निर्धारण करती थीं। काफी बाद में जाकर उन पर प्रतिबंध लगा। लेकिन जैसा कि हर कानून के साथ होता है, इस प्रतिबंध को भी अनेक स्थानों पर तोड़ा जाता है और जन्म से पहले ही बालिका भ्रूण को नष्ट करने का काम जारी है।

तीन दिन पहले, तीस अप्रैल को, संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष द्वारा पूर्वी यूरोप और मध्य एशिया पर जारी एक रिपोर्ट का कहना है कि वहां भी स्थिति काफी खराब है। इस समय चिकित्सा विज्ञान में हुई प्रगति ने पुत्र प्राप्ति का एक और तरीका उपलब्ध करा दिया है। यह तकनीक खोजी तो गई थी जेनेटिक विकृतियों को दूर करने के लिए, लेकिन इसका इस्तेमाल हो रहा है वांछित लिंग के शिशु को जन्म देने के लिए। यानी माता-पिता पैदा होने वाले शिशु के लिंग का चयन कर सकते हैं। कनाडा में इस प्रकार के परीक्षणों और प्रक्रियाओं पर प्रतिबंध है, लेकिन पड़ोसी देश अमेरिका में नहीं है। विज्ञान का इस्तेमाल कैसे सामाजिक रूढ़ियों और पूर्वग्रहों को पुष्ट करने के लिए किया जा सकता है, ये मिसालें इसका प्रमाण हैं।

पिछली जनगणना के अनुसार तीन केंद्रशासित प्रदेशों और एक राज्य में लिंगानुपात की दृष्टि से स्थिति बेहद खराब है। ये हैं हरियाणा, दिल्ली, चंडीगढ़, दादरा एवं नगर हवेली और दमन एवं दीव। केरल में हालात सबसे अच्छे हैं- वहां प्रति एक हजार पुरुषों पर एक हजार चौरासी महिलाएं हैं। इसके बाद पुदुच्चेरी, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश (अविभाजित) का स्थान है। सभी जानते हैं कि लिंगानुपात में असंतुलन के कारण कई किस्म के सामाजिक अपराध पनपते हैं। यह असंतुलन इस बात का सबूत भी है कि पितृसत्तात्मक समाज के मूल्य कमजोर होने के बजाय मजबूत हो रहे हैं।

समस्या यह है कि हमारे समाज में महिलाएं भी इन मूल्यों की गिरफ्त में हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी इन मूल्यों का पुनर्सृजन होता जा रहा है। बहुत कम परिवार ऐसे हैं, जहां बेटी के साथ भेदभाव नहीं किया जाता, वरना अधिकतर परिवारों में मांएं ही बेटियों को सिखाती हैं कि वे अपने भाइयों से कमतर हैं। त्योहारों से लेकर शादी-ब्याह तक की रस्मों में पुरुष श्रेष्ठता के ये मूल्य गुंथे हुए हैं और इनसे केवल तभी छुटकारा पाया जा सकता है जब इस दिशा में सचेत प्रयास किए जाएं।

इस समय हमारे देश में जिस तरह का माहौल बनाया जा रहा है, उसमें किसी भी तरह के वैज्ञानिक और विवेकसम्मत सोच के विकसित होने की गुंजाइश कम नजर आती है। शासक दल के सांसद साक्षी महाराज नेपाल में भूकम्प का कारण राहुल गांधी की केदारनाथ यात्रा को बताते हैं, क्योंकि उनकी सूचना के अनुसार राहुल गांधी बीफ (गौमांस या भैंस का मांस) खाते हैं।

बलात्कारों के पीछे भी बीफ खाना प्रमुख कारण बताया जा रहा है। पति द्वारा पत्नी की इच्छा के विरुद्ध उसके साथ जोर-जबरदस्ती करने को बलात्कार न मानने की बात तो सरकार के मंत्री ही कह रहे हैं। ये सारे बयान, वे लोग दे रहे हैं, जिन्होंने संविधान का पालन करने और उसकी रक्षा करने की शपथ ली है, उसी संविधान की, जो उन पर वैज्ञानिक सोच विकसित करने की जिम्मेदारी भी डालता है। विस्मय की बात यह है कि हरियाणा से ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसी कल्याणकारी योजना की शुरुआत करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस सभी बातों पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करते। क्या देश के प्रधानमंत्री के नाते ऐसे तत्त्वों पर अंकुश लगाना उनकी जिम्मेदारी नहीं है?

इस बात से कोई इनकार नहीं करेगा कि पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। ब्रिटिश शासन के दौरान जिस तरह हमारा हस्तशिल्प और कृषि तबाह हुए, उसी तरह शिक्षा प्रणाली और चिकित्सा प्रणालियों को भी बेहद नुकसान पहुंचा। लेकिन इसके साथ यह भी सही है कि आयुर्वेद हो या यूनानी चिकित्सा पद्धति, इनमें शोध होना काफी पहले बंद हो चुका था और वैद्य और हकीम परंपरा से प्राप्त ज्ञान में कुछ जोड़ नहीं रहे थे। इसीलिए विदेशी चिकित्सा पद्धति यहां आकर अपना प्रभुत्व जमाने में आसानी से सफल हो सकी।

आज जरूरत इस बात की है कि पुत्रजीवक बीज जैसी अपने नाम से ही गुमराह करने वाली औषधियों पर रोक लगाई जाए। दवाई के पैकेट पर उसमें इस्तेमाल की गई चीजों का उल्लेख अनिवार्य बनाया जाए और आयुर्वेद तथा अन्य पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में शोध को प्रोत्साहित किया जाए, ताकि गलत-सलत दावे करके जनता को बेवकूफ न बनाया जा सके।

कुलदीप कुमार

 

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