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बाखबरः शहरी नक्सल का समाजशास्त्र

पुलिस धर ले गई। मुकदमा कर दिया। घर में नजरबंद। अब अदालत को करने दो फैसला कि क्या ये साजिशिए हैं या कि जैसा ये कह रहे हैं कि इन्हीं के खिलाफ साजिश की जा रही है। मामला साजिश से साजिश तक है। किसकी साजिश है? इसे अब अदालत ही तय करेगी।

खतरा था। खतरा खतरनाक था। खतरनाक खतरे को खतरनाक खतरे से भी खतरा था। दोनों देर तक खतरा खतरा खेलते रहे। राज्यसत्ता के लिए आजादी खतरनाक थी, आजादी के लिए राज्यसत्ता खतरनाक थी। इस सप्ताह की बड़ी खबर बननी थी नोटबंदी वाली आरबीआई की ‘रपट’ की, लेकिन खतरनाक खबर बनी ‘अरबन नक्सल’ यानी शहरी नक्सलों की धर-पकड़! कई एंकर कोरस में चीखते रहे : अरबन नक्सल! अरबन नक्सल! माओवादी माओवादी! माओवादियों के हमदर्द! पीएम को मारने की साजिश पीएम को मारने की साजिश! एक नया राजनीतिक पद बना ‘अरबन नक्सल’! जिसने इसे बनाया उसका आभार कि जगंली नक्सलों की जगह नक्सलों का ‘अर्बनाइजेशन’ कर डाला। चैनलों की बहसों में शहरी नक्सलों के पहचान कुछ चिह्न आगे साफ हुए।

एनडीटीवी पर रामचंद्र गुहा ने इन कथित शहरी नक्सलों के बारे में बताया कि इनमें से वे कइयों को निजी तौर पर जानते हैं। ये लोग अंग्रेजी जानते हैं। कानून जानते हैं। वंचितों के लिए लड़ते हैं। इसके आगे पुलिस के छापों ने शहरी नक्सल को परिभाषित किया। वरवरा राव के दामाद ने बताया कि पुलिस बिना वारंट आई और घर को तहस-नहस कर कहने लगी कि यहां मार्क्स की किताबें क्यों हैं? फिर एक एंकर ने एक खुफिया हिंदी पत्र बांचते हुए बताया कि यह है शहरी नक्सल का लिखा पत्र, जिसके आखिर में गीतकार शैलेंद्र का गीत छपा था : ‘तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत में यकीन कर/ अगर कहीं है स्वर्ग को उतार ला जमीन पर!’ यानी अंग्रेजी ज्ञान जमा कानून का ज्ञान जमा मार्क्स की किताबें जमा यह गीत बराबर शहरी नक्सल!

लेकिन यह भी मालूम हुआ कि ये शहरी नक्सल हैं तो अंग्रेजी वाले, लेकिन खतरनाक खत लिखते हैं शुद्ध हिंदी या मराठी में! बस यहीं कुछ शक हुआ। ये शहरी नक्सल हैं या शैलेंद्र के मुरीद हैं? फिर एक शहरी नक्सल वरवरा राव तो स्वयं कवि हैं। क्या कविता भी खतरनाक हो गई! हर चैनल पर इस नए खतरनाक खतरे को पहचानने की कोशिशें जारी रहीं। एबीपी का एक रिपोर्टर शहरी नक्सल को कवर करते-करते हांफ रहा था। हांफ-हांफ कर बताता जा रहा है- ‘ये देखो ये रहा अरबन नक्सल नवलखा का मकान। ये देखो ये आ रही है। पुलिस घर में घुसी और नवलखा बाहर आए।’ हम देख कर झटका खाए। अरे क्या? यही है डेढ़ हड्डी का पतला-दुबला लंबा खफीफी दाढ़ीवाला ‘खतरनाक’ शहरी नक्सल! इस शहरी नक्सल को देख कर बड़ी निराशा हुई। अगर यही खतरा है, तो फिर असली खतरा क्या है?

इसके बाद हर चैनल पर पांच चेहरे आते-जाते रहे। वही अंग्रेजी वाले, कुछ दाढ़ी कुछ बिना दाढ़ी मानवाधिकारवादी छाप और कुछ को देख कर लगा कि एक डरी हुई सरकार ने इनके भी दिन फेर दिए। इतना कवरेज दिला दिया कि हीरो हो गए। यह कुछ तो सत्ता का ‘ओवर किल’ था और कुछ अपने चैनलों का ‘ओवर किल’ था। खतरे को मिथ में ऐसे ही बदला जाता है, ताकि डर का स्थायी भाव बना रहे! इंडिया टुडे के राजदीप ने कहा भी कि पीएम को मारने की साजिश की बात गंभीर बात है, पूरी जांच करो, पक्के प्रमाण लाओ और अपराधियों को सख्त से सख्त सजा दो। शहरी नक्सलों के कई पक्षधर भी कहते रहे कि अगर साजिश है तो जांच करो, सजा दो लेकिन यह सताने का बहाना न बने। सच यह है कि ये सारे आरोप झूठे हैं। उनको फंसाया जा रहा है। यह असहमति को रौंदना है। अरुंधति राय बोलीं कि यह दो हजार उन्नीस तक चलना है।

बड़ी अदालत के एक न्यायाधीश महोदय ने इन कथित ‘अरबन नक्सल’ की एक और विशेषता प्रकारांतर से बताई कि ‘असहमति सेफ्टी वाल्व होती है। उसके न होने से प्रेशर कुकर फट सकता है।’ यानी शहरी नक्सल सेफ्टी वाल्व भी होते हैं। ये तो प्रेशर कुकर के मददगार हैं, दुश्मन नहीं! लेकिन अपने भाई अरनब ने ‘अरबन नक्सल’ का पीछा न छोड़ा और देर रात दहाड़ती हुई बहस में लाइन दे डाली : ‘डेस्ट्रॉय माओइस्ट! नेशनलिस्ट मस्ट डेस्ट्राय माओइस्ट!ऐलिमिनेट माओइस्ट…’ हम तो एकदम कनफ्यूज हो गए कि अरबन नक्सल कहें कि अरनब नक्सल कहें!अरबन और अरनब में जरा-सा ही तो फर्क है।

पुलिस धर ले गई। मुकदमा कर दिया। घर में नजरबंद। अब अदालत को करने दो फैसला कि क्या ये साजिशिए हैं या कि जैसा ये कह रहे हैं कि इन्हीं के खिलाफ साजिश की जा रही है। मामला साजिश से साजिश तक है। किसकी साजिश है? इसे अब अदालत ही तय करेगी। शहरी नक्सल की कहानी पूरी तरह शांत नहीं हुई थी कि राहुल भैया नोटबंदी और राफेल सौदे पर वो बरसे कि भाजपा के प्रवक्ताओं ने उनके अज्ञान पर फिर से तरस खाना शुरू कर दिया। लेकिन ये क्या? राहुल के अज्ञान की जय हो कि जिसने भाजपा को अंदर की बात बताने के लिए मजबूर कर दिया कि राफेल सौदे में क्या क्या नया है। टाइम्स नाउ का एंकर तो राफेल सौदे के उन गुप्त दस्तावेजों को ही बांचने लगा, जिसमें नए ‘कनफिगरेशन’ की बातें थीं। लगे रहो राहुल भाई! इति शहरी नक्सल के समाजशास्त्र का प्रथम कांड समाप्तम्!