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बाखबरः भीड़-हिंसा का समाजशास्त्र

दिल्ली में तीन बच्चियों की भूख से मौत हुई। विपक्षी नेताओं ने ‘गरीबी टूरिज्म’ किया। एंकर विचलित हुए। दिल्ली की बरसात में दिल्ली की मौत ने विचलित किया। पहले बरसने को तरसे। जब बरस गए तो रोने लगे कि यहां पानी वहां पानी!

Author July 29, 2018 4:09 AM

इस सप्ताह दिखी अलवर ‘टू’ की मॉब-लिंचिंग एकदम ‘परफेक्ट लिंचिंग’ थी। एक भाजपा नेता ने शुरू में ही पुलिस पर आरोप लगाया कि रकबर की मौत के लिए पुलिस जिम्मेदार है। फिर जो कहानी चैनलों में चार दिन तक बजी, वह इसी लाइन को बजाती रही कि मौत की वजह पुलिस है! खबर की ‘सफाई’ तो देखने लायक थी। अब ‘लिंच मॉब’ गायब थी। सिर्फ तीन पकड़े गए। रकबर की मौत के साथ एंकर-रिपोर्टरों की हमदर्दी जाहिर रही। रकबर की मौत की जिम्मेदार पुलिस ही रही (मॉब्स नहीं)। सब चैनलों की कहानी मिला कर कुल कहानी बनाई जाए, तो इस तरह बनती है : ‘मॉब’ ने रकबर को पीटा। लेकिन मरा बाद में। पुलिस उसे जीप में डाल कर ले गई। आधी रात का वक्त था। छह किलोमीटर का सफर कठिन था। उसे तय करने में जीप को तीन घंटे लगे।

इतनी मेहनत के बाद आन ड्यूटी पुलिस को चाय की तलब होनी ही थी। एक चाय वाले से चाय पी। जीप में कौन था? चाय वाले ने देखा नहीं। इनचार्ज एएसआई बोला कि उससे गलती हुई। जो सजा देनी हो, दे दो। तीन का तबादला तुरंत कर दिया गया। और क्या पुलिस की जान लोगे? बाद में रिपोर्ट ने बताया कि रकबर की मौत ‘सदमे’ से हुई! इतनी साफ-सुथरी कहानी और ये चैनल फिर भी कांय कांय करते रहे। नासमझ चैनल जिस तिस के बयान दिखाते रहे, लिंचिंग पर बहसें दिखाते रहे और सरकार को व्यर्थ में जिम्मेदार ठहराते रहे! इसलिए देश को दोटूक शब्दों में समझाना जरूरी हुआ। एक हिंदुत्ववादी नेता ने हिंसक भीड़ों के ‘एक्शन’ का समूचा समाजशास्त्र तीन लाइनों में समझा दिया। ज्यादातर खबर चैनलों में ये लाइनें इसी क्रम से बार-बार दिखाई गर्इं :

– मुसलिम हमारी भावनाएं समझें!
– गोहत्याएं हुर्इं तो भीड़ की हिंसा बढ़ेगी!
– गोहत्या पर चुप नहीं रहा जा सकता!

टाइम्स नाउ की ‘स्क्रीन’ उस प्राइम टाइम में देखते ही बनती थी। सामने अंग्रेजी में पांच वाक्य एक के बाद एक लिखे आते थे, जो हमारे हिंदी-कानों में इस तरह रूपांतरित होते थे :

– जयंत माला पहनाते हैं!
– कटियार समर्थन करते हैं!
– इंद्रेश सही ठहराते हैं!
– राजा भड़काते हैं!
– गिरिराज उचित ठहराते हैं!

समाहार करने वाली एक लाइन रह गई, जो एक सीएम ने कही कि भीड़-हिंसा को बेवजह तूल दिया जा रहा है!

भीड़-हिंसा को लेकर गृहमंत्री राजनाथ सिंह द्वारा एक उच्च स्तरीय समिति बनाने की खबर भी बजती रही, लेकिन भीड़-हिंसा का समाजशास्त्र जिस प्यार भरे समुझावन के साथ आया, वह एकदम दोटूक था। बिल्ली थैले से बाहर थी!
टाइम्स नाउ के एंकर राहुल शिवशंकर को भीड़-हिंसा का समाजशास्त्र इस बातचीत के बाद ही समझ में आया। यह प्रबोधनकारी बातचीत कुछ-कुछ इस तरह चली :

एंकर- आपकी पार्टी का पूर्वोत्तर में शासन है। वहां तो बीफ खाया जाता है?

आरएसएस के एक नेता : आपका दिमाग प्रदूषित है। घर के बच्चे बिगड़ जाते हैं, तो कंप्रोमाइज करना पड़ता है। धीरे-धीरे समझाएंगे।… सब धर्मों में गोमांस बंद है। आपकी भी इच्छा गोमांस खाने की कर जाती होगी। तो गोमांस खाने पर हम आपको मारेंगे नहीं, जेल नहीं भेजेंगे। प्यार से समझाएंगे।

एंकर- इसका अर्थ है कि मुझे मार दिया जाएगा?

नेता : आप प्रश्न पूछ कर जहर फैलाना चाहते हैं। जब भावनाएं आहत होती हैं, तो ऐसा होता है। सहन नहीं करना चाहिए। धीरे-धीरे समझाना चाहिए।… गाय की सेवा करो। शरीर स्वस्थ रखो। जो नहीं माने गोमांस खाए, उससे आपका जीना-मरना तय होता है।… मंत्री ने सॉरी बोल दिया, फिर भी नहीं मानते…

एनडीटीवी के श्रीनिवासन जैन ने बताया कि मेघवाल ने कहा है कि लिंचिंग इसलिए हो रही है, क्योंकि मोदी सरकार ‘पापुलर’ हो रही है!
सत्य वचन महाराज!

भीड़-हिंसा की इस सुव्याख्यायित कहानी को काटा मराठा आरक्षण रैली की हिंसा ने और उसे काटा कांग्रेस के समर्पणवादी बयान ने कि मोदी को छोड़, ‘कोउ पीएम होय हमें का हानी’! चैनल माया-ममता का मैच कराने लगे। बीच में देवगौड़ा ‘एक्सीडेंटल पीएम-टू’ की झांकी देने लगे।

पाकिस्तान में इमरान खान की जीत के संदर्भ में ज्यादातर चैनलों की लाइन यही रही कि यह आतंकवादी जीते हैं! उनसे बातचीत कैसी?

दिल्ली में तीन बच्चियों की भूख से मौत हुई। विपक्षी नेताओं ने ‘गरीबी टूरिज्म’ किया। एंकर विचलित हुए। दिल्ली की बरसात में दिल्ली की मौत ने विचलित किया। पहले बरसने को तरसे। जब बरस गए तो रोने लगे कि यहां पानी वहां पानी! यहां डूबा वहां डूबा! ऐसा विचित्र विकास है कि न पानी का निकास है, न भविष्य में उसकी आस है!

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