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वक्त की नब्जः सुविधा की चुप्पी और मुखरता

जब कहा जाता है आज कि मोदी तानाशाह हैं और उनकी सरकार पत्रकारों पर दबाव डाल रही है, मुझे अजीब लगता है कि यही बात हमने पिछले दस सालों में क्यों नहीं कभी कही? क्या इसलिए कि हम जानते हैं कि भारत के राजपरिवार के खिलाफ बोलना खतरे से खाली नहीं है?

इन दिनों खबर गरम है कि नरेंद्र मोदी इतने बड़े तानाशाह हैं कि उन पत्रकारों को अखबारों और टीवी चैनलों से बर्खास्त करने की मुहिम शुरू हो गई है, जो उनके आलोचक माने जाते हैं। वरिष्ठ टीवी पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि उनको एबीपी टीवी से अलग होना पड़ा, सिर्फ इसलिए कि उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना करने की हिम्मत दिखाई थी। यह भी कहा उन्होंने कि आनंद बाजार पत्रिका टीवी के मालिकों ने उनको सावधान किया था कि प्रधानमंत्री की निजी तौर पर आलोचना करने से बाज आ जाएं। उनके मंत्रियों की जितनी मर्जी आलोचना करते रहें। एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने उनकी बातों के आधार पर पिछले सप्ताह एक लिखित वक्तव्य जारी किया, जिसका मुख्य संदेश था कि भारत में मीडिया पर नाजायज पाबंदियां लगाई जा रही हैं।

मैं काफी दिनों से सुन रही हूं कि मोदी के दौर में एक खतरनाक, अघोषित सेंसशिप चल रही है। प्रसिद्ध टीवी एंकर बरखा दत्त ने इल्जाम लगाया है कि उनके नए टीवी चैनल को लाइसेंस सिर्फ इसलिए नहीं दे रही है मोदी सरकार, क्योंकि वह मोदी की आलोचक रही हैं। मेरे पुराने दोस्त वरिष्ठ टीवी पत्रकार करण थापर ने अपनी नई किताब में लिखा है कि मोदी सरकार के मंत्रियों को आदेश मिला था प्रधानमंत्री कार्यालय से कि करण के शो पर न जाएं। इस तरह के किस्से और भी हैं, जिनको वजन स्मृति ईरानी ने दिया, जब बतौर सूचना प्रसारण मंत्री उन्होंने आदेश जारी किया कि उन पत्रकारों के प्रेस कार्ड वापस लिए जाएंगे, जो ‘फेक न्यूज’ फैलाने का काम कर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने खुद दखल दिया और यह फरमान रद्द कर दिया गया जारी होते ही, लेकिन नुकसान हो चुका था। जिनको सिर्फ शक था कि मोदी सरकार पत्रकारों पर दबाव डाल रही है, उनको सबूत मिल गया कि ऐसा वास्तव में हो रहा है।

ऐसा कहने के बाद यह भी कहना जरूरी है कि मोदी की आलोचना दैनिक तौर पर होती है टीवी चर्चाओं में और अखबारों के संपादकीयों में भी। नोटबंदी की खूब आलोचना की गई है। जीएसटी जिस तरह लागू किया गया, उसकी आलोचना हुई है। मोदी की नीतियों की आलोचना होती है लगातार। यहां तक कि कई पत्रकारों ने तो यह भी कहा है कि सर्जिकल स्ट्राइक हुआ ही नहीं था पाकिस्तान के खिलाफ। मोदी की कश्मीर नीति की विफलता की आलोचना हुई है जोरशोर से और हिंदुत्ववादियों की हिंसा की जब भी कोई नई घटना सामने आती है, तो देश भर में हल्ला मच जाता है कि देश फिर से टूटने की कगार पर है।

अब याद कीजिए जरा सोनिया-मनमोहन सरकार का दौर और बताइए कितनी बार आपको सोनिया गांधी के एक भी कार्य, एक भी नीति की आलोचना आपको याद आती है? सोनियाजी तबसे भारत की असली प्रधानमंत्री रही हैं, जबसे उनके पति की हत्या के बाद उन्होंने अपना पहला प्रधानमंत्री नियुक्त किया। नरसिंह राव ने कभी दस जनपथ के सामने माथा नहीं टेका, सो उनके देहांत के बाद उनकी अंतिम यात्रा सोनियाजी ने कांग्रेस मुख्यालय से होने नहीं दी और न ही इजाजत दी अन्य प्रधानमंत्रियों की तरह उनकी समाधि दिल्ली में यमुना किनारे बनने की। जब तक आई मनमोहन सिंह की बारी तब तक कांग्रेस के छोटे मुलाजिम भी जान गए थे कि कांग्रेस अध्यक्ष की जगह सबसे ऊपर है। अपने प्रिय डॉक्टर साहब प्रधानमंत्री रहे एक लंबे समय तक, लेकिन सोनियाजी की मर्जी से। उनकी मर्जी से उनके पुराने दोस्त ओत्तावियो क्वात्रोकी के लंदन में बैंक खाते खोल दिए गए। उन पर पाबंदी लगी थी जबसे बोफोर्स की रिश्वत का पैसा क्वात्रोकि और उनकी पत्नी मारिया के स्विस बैंक खातों में पाया गया था।

डॉक्टर साहब के सारे मंत्री दस जनपथ पर माथा टेकने जाया करते थे। हम लटयंस दिल्ली के सारे राजनीतिक पत्रकार इस बात को जानते थे। यह भी जानते थे हम कि सोनियाजी की एनएसी (राष्ट्रीय सलाहकार परिषद) प्रधानमंत्री के मंत्रिमंडल से ज्यादा महत्त्वपूर्ण थी। नीतियां बनती थीं एनएसी में सोनियाजी की सलाह लेकर और उनको निस्संकोच सहमति देती थी भारत सरकार। सोनियाजी के इन असंवैधानिक कार्यों का विरोध मेरे जैसे कोई पत्रकार करने की हिम्मत दिखाते थे, तो स्पष्ट शब्दों में हमको खबरदार हो जाने को कहा जाता था। मैंने जब फिर भी सोनियाजी की आलोचना नहीं बंद की, तो गंभीर कदम उठाए गए, जिनका जिक्र मैंने अपनी किताब ‘इंडियाज ब्रोकन ट्रिस्ट’ में विस्तार से किया है। यहां मैं कहना सिर्फ यह चाहती हूं कि आज तक सोनिया गांधी के खिलाफ लिखने की हिम्मत बहुत कम पत्रकार दिखाते हैं। ऐसा क्यों है, मैं नहीं जानती। इतना जरूर है कि जिस दिलेरी से मोदी की आलोचना करने को तैयार हैं मेरे पत्रकार बंधु, उस दिलेरी से उन्होंने कभी सोनिया गांधी के बारे में नहीं लिखा है।

सो, जब कहा जाता है आज कि मोदी तानाशाह हैं और उनकी सरकार पत्रकारों पर दबाव डाल रही है, मुझे अजीब लगता है कि यही बात हमने पिछले दस सालों में क्यों नहीं कभी कही? क्या इसलिए कि हम जानते हैं कि भारत के राजपरिवार के खिलाफ बोलना खतरे से खाली नहीं है? क्या इसलिए कि सोशल मीडिया पर रोज लगता इल्जाम सही है कि हम लटयंस पत्रकार नेहरू-गांधी परिवार के चमचे हैं? इन सवालों का जवाब मेरे पास नहीं है। इतना जानती हूं कि नेहरू-गांधी परिवार के किसी सदस्य का राज जब होता है, तो हम दिलेर पत्रकार इतने बुजदिल बन जाते हैं कि हमारी बोलती बंद हो जाती है। बहुत सारे राज हैं, जो हम जानते हैं, जिनका जिक्र तक हम नहीं करने की हिम्मत दिखाते हैं। बहुत सारे घोटाले हुए हैं हमारी आंखों के सामने और हमने अपनी आंखें बंद करना बेहतर समझा है हमेशा।

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