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कभी-कभार: विलाप समय का

अशोक वाजपेयी   एक आकाशहीन संसार में, जमीन हो जाती है एक रसातल। और कविता समवेदना के उपहारों में से एक। और हवा का एक विशेषण : उत्तरी या दक्षिणी। बखान मत करो कैमरा जो तुम्हारे घावों को देखता है और अपने को सुनने के लिए चीखो, यह जानने के लिए कि तुम अभी जीवित […]
Author April 12, 2015 16:41 pm

अशोक वाजपेयी

 

एक आकाशहीन संसार में, जमीन हो जाती है

एक रसातल। और कविता समवेदना के उपहारों में से एक।
और हवा का एक विशेषण : उत्तरी या दक्षिणी।
बखान मत करो कैमरा जो तुम्हारे घावों को देखता है
और अपने को सुनने के लिए चीखो, यह जानने के लिए
कि तुम अभी जीवित हो और जीवन
इस धरती पर संभव है। बोलने के लिए एक इच्छा
ईजाद करो, कोई रास्ता या भ्रम खोजो
उम्मीद को लंबियाने के लिए, और गाओ।
सौंदर्य एक स्वतंत्रता है।

हाल ही में जब कलाविद अमित मुखोपाध्याय ने ‘विलाप’ की थीम पर तीन चित्र प्रदर्शनियां, कुछ वीडियो और एक परिचर्चा आयोजित की, तो इस ओर ध्यान गया कि इधर युद्ध का विरोध कुछ शिथिल-सा हो गया है। संसार में बढ़ते युद्धोन्माद और अपार शस्त्रीकरण के बावजूद बौद्धिक और रचनात्मक स्तर पर उसका विरोध, उससे होने वाले विनाश पर विलाप धीमा पड़ गया है। ऐसे इलाके हैं जैसे फिलस्तीन-इजराइल, जहां युद्ध एक दैनिक दुर्घटना की तरह बरसों से चल रहा है: वहीं के कवि महमूद दरवेश की कविता जैसे कि यहूदी कवि यहूदा अमीख़ाई कवि की रचनाओं को विलाप के रूप में पढ़ा-समझा जा सकता है। हम यह भी याद कर और कह सकते हैं कि हमारा एक महाकाव्य ‘महाभारत’ युद्ध की व्यर्थता और उससे होने वाले विनाश पर एक लंबा शोकगीत ही है। याद तो यह भी विवश कर सकते हैं कि युद्ध मनुष्य के अस्तित्व का एक लगभग अनिवार्य हालांकि सर्वथा अवांछनीय पहलू रहा है।

तीन प्रदर्शनियां महाभारत, दूसरे विश्वयुद्ध और फिलस्तीन पर केंद्रित हैं। उन्हें देखते हुए मनुष्य की क्रूरता, बेघरबार-बरबाद हुई जिंदगियां और उनकी मार्मिक छवियां, विस्थापन, भय और आतंक आदि से रूबरू होते हुए दिल दहल जाता है। परिचर्चा में यह कहा गया कि विलाप की सीमाएं हैं: कई बार राज और समाज दोनों विलाप करते हैं और राज उसे स्मारक आदि के रूप से स्थायी बनाने की कोशिश करता है। समाज में डर और दहशत के कारण विलाप सीधे व्यक्त नहीं होता: वह अंत:सलिल हो जाता है। पर इस समय, लगता है, युद्ध और विनाश को लेकर कुछ उदासीनता-सी है, जैसे हमने काफी विलाप कर लिया है; जैसे युद्ध अंतत: व्यर्थ होता है वैसे ही उस पर विलाप भी। मनुष्य का अपने को और दूसरों के जीवन को नष्ट करने का उत्साह हमारे समय में बढ़ता जाता है। सृजन का एक काम इस विनाशकारी तत्त्व का लगातार प्रतिरोध करना है। अगर हम बचा नहीं सकते तो हम बच भी नहीं सकते! फिर उसी महमूद दरवेश की कुछ और पंक्तियां याद आती हैं, जिनकी कुछ पंक्तियों से इस टिप्पणी की शुरुआत हुई थी:

वे मर चुके हैं जो उन कमरों में सोते हैं जो तुम बनाओगे
वे मर चुके हैं जो अपने अतीत की सैर करते हैं उन जगहों में
जो तुमने नष्ट कर दीं
वे मर चुके हैं जो उन पुलों से गुजरते हैं जो तुम बनाओगे
वे मर चुके हैं जो रोशन करते हैं तितलियों की रात
मृतक जो भोर में चाय पीने तुम्हारे साथ आते हैं
इतने शांत जितना तुम्हारी बंदूकें उन्हें रहने देती हैं, तो छोड़ो
इस जगह के मेहमानो, कुछ सीटें अपने मेजबानों के लिए…
वे तुम्हें पढ़ाएंगे शांति की शर्तें- मृतकों के साथ।
युवा आलोचना

कृष्णा सोबती-शिवनाथ निधि, रज़ा फाउंडेशन और देवीशंकर अवस्थी सम्मान समिति ने इस सम्मान के दो दशक पूरे होने पर सभी सम्मानित युवा आलोचकों को ‘हमारे समय में साहित्य का पक्ष’ विषय पर बोलने के लिए आमंत्रित किया: कुल उन्नीस में से दस युवा आलोचक आए। दो दिनों में फैले आयोजन में उन्हें सुनने वालों में कृष्णा सोबती, नामवर सिंह, अजित कुमार, मैत्रेयी पुष्पा, चंद्रकांत देवताले, मैनेजर पांडे, मंगलेश डबराल, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, पंकज सिंह, चंचल चौहान आदि थे।

यह सवाल उठता रहता है कि एक ऐसे समय में, जिसमें हर कोई अपना पक्ष जोर-शोर और कई बार अतर्कित लगते आत्मविश्वास से सामने लाता रहता है, फिर वह धर्म हो, राजनीति, विज्ञान, सिनेमा, खेलकूद, अनेक सामाजिक रूप और संगठन वहीं साहित्य अपना पक्ष क्यों अक्सर अघोषित रखता है!

उसका कोई पक्ष है भी कि वह बाकी सब पक्षों से मिलाजुला मामला है? एक मत युवा आलोचकों में से कुछ ने प्रगट किया कि इस समय का साहित्य हस्तक्षेप नहीं बन पा रहा है: हिंदी अंचल में कोई लेखक सार्वजनिक बुद्धिजीवी नहीं है। यह कहा गया कि साहित्य का कोई अकेला या एकात्म पक्ष नहीं होता: वह तो हमेशा ही हर स्तर पर बहुवचन है। वैसे तो यह बात लगभग हरेक अनुशासन के बारे में कही जा सकती है कि वे सभी बहुवचन होते हैं अपने पक्ष में। भले अनेक हों, लेकिन साहित्य के पक्ष हैं कहां, उनकी सार्वजनिक उपस्थिति इतनी अलक्षित क्यों है? एक वरिष्ठ आलोचक ने अपनी टिप्पणी में यह याद दिलाया कि एक ऐसे राजनीतिक माहौल में, जब लोकसभा में विपक्ष बहुत सिमट गया है यानी संसद में ही असहमति का क्षेत्र सिकुड़ गया है, साहित्य का पक्ष विपक्ष होना ही हो सकता है।

कुछ का खयाल था कि जिस तरह की शक्तियां इस समय समाज और देश में सक्रिय हैं उनके रहते सिर्फ साहित्य साहित्यकार का कर्तव्य नहीं हो सकता: उसे नागरिक जीवन में सीधे सक्रिय होना चाहिए। कुछेक का खयाल था कि अब जब विचारधारात्मक कट््टरताएं समाप्तप्राय हैं, लेखकों को मिला-जुला मोर्चा बनाना चाहिए। यह परेशानी जाहिर हुई कि आज लेखकों के सरोकार, उनकी चिंताएं तो साहित्य में आ रही हैं, उनकी घृणा अव्यक्त ही रहती है।

यह देखना दिलचस्प था कि प्राय: किसी युवा आलोचक ने भाषा और शिल्प में जो कुछ हो या नहीं हो रहा है इसकी कोई चर्चा नहीं की। इक्के-दुक्के ने कुछ पहले के आलोचकों का जिक्र किया। बहुत कम ने रचनाकारों और कृतियों के नाम लिए। प्राय: सभी अपने समय की रचनाशीलता से असंतुष्ट लगे। हालांकि एकाध ने यह दृढ़तापूर्वक कहा कि युवा रचनाशीलता तो अग्रगामी है, आलोचना उससे पिछड़ रही है। इस ओर भी ध्यान खींचा गया कि संप्रेषण के अनेक नए माध्यम विकसित हो रहे हैं और उन्हें हिसाब में लिए बिना सार्थक उपस्थिति या हस्तक्षेप संभव नहीं है। एक पुस्तक के मुकाबले एक ब्लाग या ट्विटर के पाठक कई गुना अधिक और तत्पर हैं। संस्थाओं के क्षरण का भी उल्लेख हुआ, लेकिन इस पर कोई विचार सामने नहीं आया कि हिंदी अंचल में सरकारी और गैरसरकारी दोनों किस्म की संस्थाएं इस कदर निष्प्राण और गतिहीन क्यों हैं। नई संस्थाएं क्यों विकल्पत: सामने नहीं आ रही हैं।

पढ़ने पर हो सकता है कि यह गलतफहमी लगे, पर सुन कर यह धारणा भी बनी कि युवा आलोचना ने अभी तक अपनी कोई आलोचना-भाषा या नई अवधारणा-विश्लेषण की पदावली विकसित नहीं की है। किसी ने तो यहां तक कहा कि इस समय हिंदी साहित्य-संसार एक तरह की गढ़ी हुई सहमति की गिरफ्त में है। अधिक से अधिक उसके बचाव में यही कहा जा सकता है कि वह कुल मिला कर जातिवाद-धर्मांधता-सांप्रदायिकता, बाजार से उपजने वाले सरलीकरण और अमानवीयकरण, पूंजी के अश्लील खेल आदि के विरुद्ध है।

याद नहीं आता कि किसी ने हिंदी साहित्य में अध्यात्मशून्यता, दार्शनिक प्रश्नहीनता आदि को किसी अभाव के रूप में याद किया हो। यह जरूर कहा गया कि इस समय निर्मम आत्मालोचन की जरूरत है, पर यह नहीं बताया कि वह कहां-कैसे हो रही है। किसी भी युवा आलोचक को किसी कृति, लेखक या प्रवृत्ति पर नए ढंग से विचार करने की जरूरत कम से कम इस प्रस्तुति में नहीं लगी। इस खतरे की ओर एक वयोवृद्ध आलोचक ने अलबत्ता थोड़े में इशारा किया कि हमारा समय आत्मवीरगाथा का समय भी हो सकता है। अपने संघर्ष को यों हर पीढ़ी कुछ महिमामंडित और अतिरंजित करती है। क्या नई पीढ़ियां उससे मुक्त हैं? जैसा कि एक युवा आलोचक ने पूछा: क्या उनमें सहमति का विवेक और असहमति का साहस एक साथ हैं?

जाहिर है एक परिसंवाद युवा आलोचना का एक परिपूर्ण दृश्य उपस्थित नहीं कर सकता। वह कई सरोकार, रुझान, चिंताओं आदि का आभास जरूर दे सकता है। यही इस संवाद ने किया। स्वयं युवा आलोचकों को एक-दूसरे से मिलने और सुनने का एक दुर्लभ अवसर मिला। उम्मीद करनी चाहिए कि वे अपने इस संवाद को और समवर्ती साहित्य से अपने रिश्ते को और गहरा और सार्थक करने की कोशिश करेंगे। आलोचना अगर साझा उद्यम है तो उसे सार्वजनिक आयोजनों के अलावा भी सक्रिय रहना चाहिए। युवा आलोचक वीरेंद्र यादव, पंकज चतुर्वेदी, सुरेश शर्मा, अनिल त्रिपाठी, प्रमिला केपी, संजीव कुमार, ज्योतिष जोशी, प्रियम अंकित, विनोद तिवारी और जितेंद्र श्रीवास्तव इस संवाद में शामिल हुए।

 

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