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आदिवासी संस्कृति : परंपरा को पोसते हुए

भगवान महादेव के प्रति भारत के करीब सभी आदिम समुदायों की आस्था रही है। इसका कारण है कि महादेव आदिदेव हैं, जिनकी जीवन शैली में आदिम लक्षण पाए जाते हैं।
Author नई दिल्ली | April 3, 2016 00:12 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

एक वक्त तक मानवविज्ञान आदिवासियों की मानसिक अवस्था की तुलना बच्चों से करता था। लेवी स्ट्रॉस ने सभ्यता के अहंकार को बेनकाब कर दिया। उत्तरी और दक्षिण अमेरिका के आदिवासी मिथकों के अध्ययन के जरिए उन्होंने बताया कि आदिवासी भी औपचारिक और अमूर्त चिंतन करते हैं। उनका अपना ज्ञान-शास्त्र है। वे धरती या चांद के बारे में उतनी ही जटिलता के साथ सोच सकते हैं, जितनी जटिलता भौतिकी या बीजगणित की प्रणाली में होती है। वे तार्किक मानस के विभाजन को चुनौती देते हैं। उसके बाद यह माना जाने लगा कि कथित सभ्यताएं अपने उत्पादन, मशीनों और ताकत पर तो ऐंठ सकती हैं, लेकिन तार्किक क्षमता पर नहीं। स्ट्रॉस ने बताया कि किसी भी मिथक में एक प्रणाली होती है, जो चीजों, सामाजिक रिश्तों और विचारों का वर्गीकरण करती है। बहुत से लोग अब तक विज्ञान की समझ को ही चीजों का व्यवस्थित अध्ययन मानते थे। लेवी स्ट्रॉस और रोलां बॉर्थ ने मिथकों और विचारधारा की तार्किक बनावट के एक जैसा होने की तरफ इशारा किया।

मिथक मुख्यत: मनुष्य और प्रकृति के बीच के टकरावों और विरोधाभासों को कल्पना के स्तर पर हल करता है, तो विचारधारा यही सामाजिक अंतर्विरोधों और टकरावों को लेकर करती है। फर्क यही है कि मिथक इतिहास की गति से अछूते रह कर एक शाश्वत वर्तमान रच सकते हैं, जो अनंत काल तक अपने को दोहरा सकता है। वहीं विचारधारा सामाजिक टकरावों का स्वरूप बदलने पर रूपांतरित हो जाती है या कई बार उसका असर कम-ज्यादा हो जाता है।

विकसित समाजों में चले आ रहे मिथक वैज्ञानिक प्रगति की प्रक्रिया में धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे हैं और जहां कहीं सुरक्षित हैं, तो उनका परिमार्जित, संशोधित और परिवर्तित रूप ही मिलता है। मौलिक स्वरूप कहीं न कहीं अपभ्रष्ट होता दिखाई देता है। इससे इतर आदिवासी समाजों के मिथकों में अधिकतर मौखिक परंपरा का हिस्सा बने हुए हैं, हालांकि इनके व्यवस्थित लिपिबद्ध प्रयास अपेक्षित स्तर पर नहीं हुए। यही वजह है कि समूह और अंचल के स्तर पर इन मिथकों में काफी विविधताएं पाई जाती हैं।

यह निर्विवाद रूप से स्वीकार किया जा सकता है कि आदिवासी समाजों में चले आ रहे मिथक और गणचिह्न जैसे विश्वासों का मूल आधार मानव समाज की आदिकालीन समझ है। इसलिए आदिवासी मिथक संपूर्ण मानवता से संबंधित हैं, न कि केवल आज के आदिवासी समाज से।

सृष्टि की उत्पत्ति के संबंध में जो मिथकीय मान्यताएं हैं, वे भौतिक दृष्टि से विकसित समाजों और आदिम समाजों में समान मिलती हैं। दोनों ने ही जल और अग्नि को मूल तत्त्व माना है। ब्रह्मांडवेत्ता वैज्ञानिकों ने अग्निपिंड में हुए महाविस्फोट से सृष्टि की उत्पत्ति को मान्यता दी है। हिंदू मिथकों के अनुसार प्रारंभ में सर्वत्र जल ही जल था। उसके बाद पृथ्वी और अन्य सजीव-निर्जीव तत्त्वों का जन्म हुआ। बाइबिल में भी ‘सर्वत्र जल’ सिद्धांत को स्वीकार किया गया है। इस्लाम में आकाश में ‘सर्वत्र धूम्र’ यानी कि गैस की अवधारणा है। कुल मिलाकर सृष्टि-सर्जक ईश्वर की अवधारणा को सबने स्वीकार किया है। प्रश्न है कि सृष्टि का वह मूल तत्त्व क्या है, जिसके द्वारा इसकी रचना संभव हुई। यही पहेली हमें आदिवासी मिथकों की तरफ आकृष्ट करती है।

सृष्टि की उत्पत्ति को लेकर आदिवासी मिथकों में आधारभूत तत्त्वों का जिक्र मिलता है। सृष्टि से पहले की अवस्था के बारे में पूर्वोत्तर भारत के आदिवासियों की मान्यता रही है कि पृथ्वी पर सर्वत्र जल ही जल था। सृष्टि की उत्पत्ति के संबंध में कमोबेश सभी आदिवासी समुदायों में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जल की महिमा बताई गई है। हमारा विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि प्रमुख तत्त्व जल ही है। आदिवासी समाजों में जल के साथ जंगल और जमीन को उच्च स्थान दिया गया है। जंगल से तात्पर्य नदी, नाले, झील, सरोवर, पर्वत, वनस्पतियां, वन्यप्राणी सबसे है। आदिवासी मिथक-मान्यताएं हमें जीवन का यह सूत्र समझाने में सक्षम होती हैं कि जल और जंगल के बिना पृथ्वी सुरक्षित नहीं।

आदिम समाजों की तुलना में हम कितने सभ्य हैं यह देखना है, तो अंडमानी द्वीप समूहों के आदिवासियों के पास जाइए। वहां अनेक प्रजाति के समुद्री प्राणी हैं। आदिवासी लोग उनका सेवन करते हैं। स्टार फिश प्रजाति में नीले रंग की मछली विरल है। उन लोगों की मान्यतानुसार ब्लू स्टार फिश के भीतर उन आदिवासियों की आदिपरी मां की आत्मा का वास रहता है। इसलिए वे लोग उसे नहीं खाते, उसकी रक्षा करते हैं। हरिण और हरियल (हरा कबूतर) कम मिलते हैं। हरिणों में मर चुके वृद्धों की आत्मा का और हरियल पक्षी में होने वाले शिशुओं की आत्मा का वास मानते हुए उन्हें संरक्षित करते हैं। ऐसे मिथकों की उत्पत्ति के पीछे जो भी कारण रहे हों, यह स्पष्ट है कि ये विश्वास सृष्टि के तत्त्वों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक और उपयोगी हैं।

भगवान महादेव के प्रति भारत के करीब सभी आदिम समुदायों की आस्था रही है। इसका कारण है कि महादेव आदिदेव हैं, जिनकी जीवन शैली में आदिम लक्षण पाए जाते हैं। वे वन-पर्वतों में वास करते हैं। भौतिक सुख-सुविधाओं को नकारते हैं। मानवेतर प्राणिजगत के साथ उनके आत्मीय संबंध हैं। इसी तरह गोंड आदिम समुदाय ‘बड़ादेव’ को सर्वोच्च स्थान देता है, जिसने सृष्टि की रचना की। यह अन्य कोई न होकर महादेव ही हैं। इस रचना में सहयोगी के रूप में कौआ, केकड़ा, केंचुआ, मकड़ा जैसे जीवों और कई वृक्षों की भूमिका को अहम बताया गया है। इन मिथकों से मानवेतर प्राणिजगत और प्रकृति तत्त्वों के बीच के अपेक्षित संतुलन के दर्शन को सीखा जा सकता है।

निषाद, भील, सवर, सवरा, सओर, सहरा, सौंर और सहरियाओं में प्रचलित एक मिथक कथा के अनुसार सृष्टि के प्रारंभ में महादेव ने धरती पर अन्न उपजाना चाहा। इसके लिए उन्होंने एक हल बनाया और अपने बैल नंदी को उसमें जोता, पर धरती पर घना जंगल था, इसलिए धरती जोती नहीं जा सकी और अन्न नहीं उपजा। फिर महादेव ने मनुष्य की रचना की, जिसका नाम सवर रखा। यही मनुष्य सवर, सवरा, सओर, सहरा, सौंर या सहरिया के नाम से जाना गया। महादेव ने इस मनुष्य से जंगल साफ करवाया। इससे यह निष्कर्ष भी निकाला जा सकता है कि आदिम जीवन जब आखेट और वनोपज पर आश्रित था तब आखेट के स्थान पर वनोपज को प्राथमिकता दी गई। इसी तरह बैगा समुदाय अपने को मानव के अदिपुरखों के वंशज मानते हैं। ईश्वर ने बैगा आदि-मानव युग्म को वरदान दिया कि उसके वंशज पृथ्वी के भौमिया यानी मालिक होंगे, जो अपने वंश का लालन-पालन पृथ्वी से पैदा होने वाले कंद-मूल-फलों से करेंगे।

मिथकों में हम गणचिह्नों को शामिल करते हैं। प्रत्येक आदिम समुदाय का कोई न कोई गणचिह्न होता है, जिसमें वे विश्वास करते हैं। उस गणचिह्न को वे अपने उद्भव से जोड़ कर देखते हैं। आदिम समुदाय विशेष की कुल परंपरा से गणचिह्नों का गहरा रिश्ता होता है। वह गणचिह्न कोई प्रकृति तत्त्व या मानवेतर प्राणी हो सकता है। ऐसा कोई आदिम गणचिह्न नहीं पाया जाता जो अमूर्त, वायवीय या अलौकिक हो। भीलों में महुआ का वृक्ष, नागों में नाग, मीणा समुदाय में मत्स्य, ओरांव की विभिन्न खापों में जंगली सूअर, कछुआ, कौआ, धान और खड़िया लोगों में बाघ आदि के उदाहरण लिए जा सकते हैं।

गणचिह्नों की यह विशेषता है कि समुदाय विशेष अपने गणचिह्न को एक साथ संरक्षित भी करता है और उसका उपभोग भी। कई गणचिह्न जीवनयापन का आधार बनते हैं जैसे भील समुदाय के लिए महुआ का वृक्ष। आज जब हम वैश्विक कॉरपोरेट पूंजी के वर्चस्व के युग में प्राकृतिक संसाधनों की चौतरफा लूट का नजारा देखते हैं, तो पृथ्वी के विनाश के संकेतों को समझना चाहिए और एक खतरनाक भविष्य से बचने के लिए आदिमता के जीवन सूत्रों से सीख लेनी चाहिए, जो इन मिथकीय विश्वासों में हम देख रहे हैं।

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