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वक्त की नब्ज: समस्या और समाधान

गरीब दिहाड़ी मजदूरों के लिए अगर प्रबंध नहीं कर पाई है सरकार घर वापस जाने की, तो तब क्या कर सकेगी जब इस बीमारी का फैलाव वैसे हो जाएगा जैसे अमेरिका, स्पेन और इटली में हुआ है?

एनएच -24 पर दिल्ली-यूपी की सीमा पर गाजीपुर में एक प्रवासी श्रमिक और उसका परिवार। (Photo: Gajendra Yadav)

सौभाग्य मानती हूं अपना कि जिस शाम प्रधानमंत्री का आदेश आया कि घर से बाहर नहीं निकल सकते हैं हम पूरे इक्कीस दिनों तक, मैं समुद्र तटीय एक गांव में थी। सो, मेरा एकांत काफी अच्छा कट रहा है। यह ऐसा गांव है, जहां मुंबई से आते हैं हजारों पर्यटक। लेकिन ‘जनता कर्फ्यू’ के दिन से गांव खाली होने लगा था। अब यहां कोई नहीं है। सन्नाटा छाया रहता है दिन भर। आवाज आती है सिर्फ परिंदों की और समंदर के लहरों की। मैंने इस एकांत और शांति का लाभ उठा कर एक नई किताब पर काम करना शुरू कर दिया है, लेकिन बाकी देश में जो हो रहा है, उससे ध्यान हटाना मुश्किल है।

मुझे खासकर तब तकलीफ होती है, जब मजदूरों को अपने कोसों दूर गांव तक पैदल चलते देखती हूं टीवी पर। सोशल मीडिया पर भी उनके हाल पर रोने वाले काफी लोग हैं, सो कई तस्वीरें देखने को मिलती हैं जिसमें भूखे-प्यासे, थके-हारे बच्चे दिखते हैं अपने मां-बाप के साथ चलते हुए। मेरे दोस्त शेखर गुप्ता ने ट्वीट करके पूछा है कि भारत सरकार अगर विदेशों से वापस लाने का प्रबंध कर सकती है देशवासियों को, तो हमारे सबसे गरीब नागरिकों के लिए क्यों नहीं कुछ कर सकती है? इस सवाल का जवाब कौन देगा? इन गरीबों की मदद करने कौन आगे आएगा? माना कि हमारे प्रधानमंत्री ने कोरोना को रोकने के लिए इक्कीस दिन का कर्फ्यू लगाया है, लेकिन इस कर्फ्यू में गरीबों के लिए बुनियादी प्रबंध क्यों नहीं कर पा रहे हैं?

सवाल और भी हैं बहुत सारे। विकसित देशों में अभी से सरकारी सहायता दी जा रही है उन लोगों को, जिनका आर्थिक नुकसान हुआ है पूर्ण बंदी के बाद। अमेरिका में वहां की संसद ने दो खरब डॉलर सहायता कोश का ऐलान कर दिया है। जिनकी नौकरियां गई हैं और जो लोग वैसे भी आर्थिक तौर पर कमजोर हैं, उनको एक हजार डॉलर हर महीने पहुंचाया जाएगा, ताकि कम से कम गुजारा तो चल सके। न्यूयॉर्क में सारे रेस्तरां बंद कर दिए गए हैं, सो उनको अभी से मदद दी जा रही है। हमारे वित्तमंत्री ने पिछले हफ्ते जिस ‘पैकेज’ की घोषणा की, उससे जानकार बताते हैं कि गरीबों के जीवन में न के बराबर राहत पहुंचेगी।

मैं जिस गांव में हूं, वहां जो लोग बाहर निकलने की कोशिश करते हैं उनको पुलिस पकड़ रही है। सारी दुकानें बंद हैं। ऐसा लगने लगा है कि नरेंद्र मोदी ने इतना बड़ा कदम उठाया है, बिना अगले कदम के बारे में सोचे। यानी उसी तरह यह कदम उठाया गया है जिस तरह उन्होंने नोटबंदी वाला कदम उठाया था। जैसे उस समय यह भी नहीं देखा गया था कि एटीएम काफी उपलब्ध थे, बिलकुल वैसे इस कर्फ्यू से कितनी तकलीफ होने वाली है गरीब लोगों को, उसके बारे में जैसे सोचा ही न गया हो।
न ही अभी तक प्रबंध दिखता है इस बीमारी को मेडिकल तौर पर रोकने के लिए। इतनी बेहाल हैं हमारी स्वास्थ्य सेवाएं कि डॉक्टर बिना सुरक्षित लिबास पहने इलाज कर रहे हैं कोरोना मरीजों का। इन मरीजों के लिए खास अस्पताल होने चाहिए, जो अभी तक बनने भी नहीं शुरू हुए हैं। क्या कम से कम इनके निर्माण के लिए सेना की सहायता नहीं ले सकते हैं प्रधानमंत्री?

अभी तक अन्य देशों के मुकाबले भारत में कोरोना का फैलना इतना नहीं दिखता है, लेकिन क्या यह सिर्फ इसलिए नहीं है कि यहां हमने अभी तक सिर्फ बीस हजार के करीब लोगों की जांच की है? जांच का प्रबंध इतना कम है हमारे अस्पतालों में कि जिन अस्पतालों में प्रबंध है वहां लग रही हैं लंबी-लंबी कतारें मरीजों की, सो कहां से होगी ‘सोशल-डिस्टेंसिंग’? मुंबई की बस्तियों में जहां छोटी-छोटी झुग्गियों में रहते हैं दस-दस लोगों के परिवार, वहां कैसे रहेंगे एक-दूसरे से दूर? रही बात हाथ बार-बार धोने की, तो उन गांवों में यह कैसे करेंगे लोग, जहां पानी तक नहीं मिलता है घरों में?

मोदी के नेतृत्व का यह सबसे बड़ा इम्तिहान है, लेकिन अफसोस कि अभी तक असली नेतृत्व की झलक नहीं दिखी है। प्रधानमंत्री ने जैसे देश के लोगों पर सारी जिम्मेदारी थोप डाली है इस बीमारी को रोकने की। पहले हमसे जनता कर्फ्यू करवाया और उस शाम आदेश दिया कि पांच बजे हम सबको मिल कर तालियां, घंटियां और थालियां बजा कर धन्यवाद देना चाहिए उन लोगों को जो अस्पतालों में अपनी जान को खतरे में डाल कर काम कर रहे हैं और उन पुलिस वालों को हमारी सुरक्षा के लिए तैनात हैं। ऐसा सबने खुशी से किया। फिर दो दिन बाद आदेश आया कि रात के बारह बजे के बाद इक्कीस दिन तक कोई नहीं अपने घर के बाहर निकल सकता है। प्रधानमंत्री ने हमको आदेश दिए हैं, लेकिन यह नहीं बताया है कि वे हमारे लिए क्या कर रहे हैं।

गरीब दिहाड़ी मजदूरों के लिए अगर प्रबंध नहीं कर पाई है सरकार घर वापस जाने की, तो तब क्या कर सकेगी जब इस बीमारी का फैलाव वैसे हो जाएगा जैसे अमेरिका, स्पेन और इटली में हुआ है? सो, विनम्रता से अर्ज करना चाहती हूं प्रधानमंत्री जी, कि इन इक्कीस दिनों में आप न सिर्फ स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने का प्रयास करें, साथ-साथ आर्थिक सहायता भी पहुंचाने का काम करें उन तक जो बीमारी से नहीं, भूख से मरने वाले हैं इन इक्कीस दिनों में। पहले इतना तो कर दीजिए कि उनके लिए घर जाने का सरकारी प्रबंध कर दें, जो पैदल चलते दिख रहे हैं अपने गांवों की तरफ हमारे महानगरों से। ठीक कहा आपने कि ‘जान है तो जहान है’, लेकिन जान बचाने के लिए मदद चाहिए।

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