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वक्त की नब्ज: यह रास्ता कहीं नहीं जाता

असली सेक्युलरिज्म आज के दौर में बहुत जरूरी हो गया है और असली सेक्युलरिज्म की चमकती मिसाल बॉलीवुड है। कट्टरपंथी हिंदुत्व के रास्ते को रोकने का काम बॉलीवुड जैसी संस्थाएं ही कर सकती हैं। कट्टरपंथी हिंदुत्व को रोकना जरूरी है, इसलिए कि यह विचारधारा देश में सिर्फ अराजकता फैला रही है।

असम सरकार मदरसों को सरकारी पैसा देना बंद करने का निर्णय लिया है।

भारत में सेक्युलरिज्म दो किस्म का है। एक झूठा और एक असली। झूठा सेक्युलरिज्म का उदाहरण पिछले हफ्ते मिला असम से, जब राज्य सरकार ने मदरसों को सरकारी पैसा देना बंद करने की घोषणा की। सेक्युलरिज्म के कई ठेकेदारों ने हल्ला मचाना शुरू किया। सच यह है कि अगर ये लोग असली सेक्युलरिज्म में विश्वास करते, तो उनको पूछना चाहिए था कि इतने दिनों तक मदरसों को पैसा क्यों दे रही थी राज्य सरकार। मदरसों में सिर्फ इस्लाम के बारे में पढ़ाया जाता है और अक्सर मस्जिदों से जुड़े इन स्कूलों से निकलते हैं कट्टरपंथी किस्म के मुसलमान, जिनकी कोई जगह नहीं होनी चाहिए भारत जैसे तथाकथित सेक्युलर देश में।

मैंने जानबूझ कर सेक्युलरिज्म का अनुवाद धर्मनिरपेक्षता नहीं किया है, इसलिए कि अंग्रेजी के इस शब्द का असल में किसी भी भारतीय भाषा में सही अनुवाद करना मुश्किल है। यूरोप से लिया गया यह शब्द हमारे देश में बेमतलब है, क्योंकि हमारे इतिहास में कभी किसी शंकराचार्य ने राज करने की कोशिश नहीं की और न किसी शंकराचार्य के पास सेना कभी थी।

यूरोप में आज भी वैटिकन को एक अलग देश माना जाता है और एक समय था, जब इस देश के पोप इतने शक्तिशाली हुआ करते थे कि इनकी सेनाएं इतनी बड़ी हुआ करती थीं कि राजाओं के साथ युद्ध कर सकते थे ये पोप। हमारे संविधान में सेक्युलर शब्द इंदिरा गांधी ने डाला था इमरजेंसी के दौरान, जब तानाशाही के उस दौर में ऐसे संशोधन लाने के लिए संसद की सहमति की आवश्यकता नहीं थी।

ऐसा कहने के बाद लेकिन यह भी कहना जरूरी है कि कट्टरपंथी हिंदुत्व के वर्तमान दौर में असली सेक्युलरिज्म की सख्त जरूरत है। असली सेक्युलरिज्म का भी उदाहरण पिछले हफ्ते मिला, जब तनिष्क आभूषण कंपनी ने अपने एक इश्तिहार में हिंदू बहू को मुसलिम घर में दिखाया था और यह भी दर्शाया था इस विडियो में कि किस तरह इस मुसलिम घर में गोदभराई की हिंदू रस्म निभाई जा रही थी। हिंदुत्ववादी इतने हावी हैं सोशल मीडिया पर इन दिनों कि इतना शोर मचा कि तनिष्क को अपना इश्तिहार वापस लेना पड़ा, बावजूद इसके कि उसमें असली भारतीय सेक्युलरिज्म को दर्शाया गया था।

असली सेक्युलरिज्म का अगर एक अड्डा है अपने देश में, तो वह है बॉलीवुड। यहां कभी किसी का न धर्म पूछता है कोई, न उसकी जाति। यहां कोई ‘लव जिहाद’ का इल्जाम नहीं लगाता, जब करीना कपूर, सैफ अली खान के साथ शादी करती है या मधुबाला जैसी मुसलिम अभिनेत्री किशोर कुमार के साथ। यहां सेक्युलरिज्म के ठेकेदार नहीं दिखते हैं, क्योंकि शुरू से ‘ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम’ में विश्वास रहा है।

समस्या यह है आज कि इस तरह के असली सेक्युलरिज्म को बहुत बुरा मानते हैं वे लोग, जो हिंदुओं और मुसलमानों के बीच नफरत फैलाना चाहते हैं अपने राजनीतिक फायदे के लिए। सो, जो हमले पिछले दिनों आपने देखे होंगे बॉलीवुड पर, वे कोई इत्तेफक नहीं थे। जिन प्रख्यात टीवी हस्तियों ने अपने चैनलों पर बॉलीवुड को नशीले पदार्थों का केंद्र साबित करने की कोशिश की है, ये वही चैनल हैं जो खुल कर कट्टरपंथी हिंदुत्व का प्रचार करते दिखते हैं।

ये वही चैनल हैं, जिन्होंने हाथरस की उस बेटी को झूठी साबित करने की कोशिश की। वही लोग हैं, जिन्होंने यह नहीं देखा कि एक उन्नीस साल की लड़की को तड़प-तड़प कर मरना पड़ा और फिर उसके अंतिम संस्कार भी नहीं होने दिए उत्तर प्रदेश की सरकार ने। रात के अंधेरे में उसे ऐसे जलाया गया, जैसे कूड़ा जलाया जाता है। इन चीजों से इन प्रसिद्ध टीवी एंकरों को कोई मतलब नहीं है। उनका मतलब सिर्फ एक है, यह कि किसी न किसी तरह साबित किया जाए कि उसके साथ बलात्कार नहीं हुआ था।

ये वही लोग हैं, जिन्होंने रिया चक्रवर्ती को विषकन्या साबित करने की कोशिश की और जब हत्या और चोरी के आरोप साबित नहीं हुए तो उसको सुशांत सिंह राजपूत के लिए चरस खरीदने के आरोप में जेल भिजवाने की मुहिम चलाई। ये वही लोग हैं, जिन्होंने कोरोना का सारा दोष तब्लीगी जमात के मौलवियों पर लगाया था महामारी के शुरुआती दिनों में और वही लोग हैं, जो पालघर में साधुओं की हत्या को हिंदू-मुसलिम शक्ल देने का प्रयास किया था।

अब अगर बॉलीवुड को बदनाम करने में लगे हुए हैं हाथ धोकर, तो इसलिए कि बॉलीवुड में जो असली सेक्युलरिज्म का माहौल है, उसकी कोई जगह नहीं है इस नए भारत में, जहां लव जिहाद और घर वापसी जैसी चीजें ऊंची जगह बना चुकी हैं। बॉलीवुड उनको इसलिए भी पसंद नहीं है, क्योंकि उनकी नजर में यहां पर लंबे अरसे से राज किया है तीन मुसलमान सितारों ने। खुल कर तो ये कहेंगे नहीं, लेकिन आपस में जब मेरी कभी बात होती है संघ के किसी विचारक या प्रचारक से, तो स्वीकार करते हैं कि उनको बॉलीवुड पर कब्जा कराना है हिंदुओं का। संघ के एक बुद्धिजीवी के शब्दों में, ‘हम हिंदू लड़के तैयार कर रहे हैं, जिनके सिक्स पैक हों और जो इन खानों की जगह ले सकें।’

कट्टरपंथी अक्सर थोड़े अंधे और थोड़े मूर्ख होते हैं, सो देख नहीं सकते कि बॉलीवुड में कामयाबी जनता तय करती है बॉक्स आॅफिस के जरिए। पिछले हफ्ते जब बॉलीवुड के बड़े-बड़े सितारों, निर्माताओं और निर्देशकों ने चार प्रसिद्ध एंकरों के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दर्ज किया, अच्छा लगा मुझे बहुत, क्योंकि मैं मानती हूं कि असली सेक्युलरिज्म आज के दौर में बहुत जरूरी हो गया है और असली सेक्युलरिज्म की चमकती मिसाल बॉलीवुड है। कट्टरपंथी हिंदुत्व के रास्ते को रोकने का काम बॉलीवुड जैसी संस्थाएं ही कर सकती हैं। कट्टरपंथी हिंदुत्व को रोकना जरूरी है, इसलिए कि यह विचारधारा देश में सिर्फ अराजकता फैला रही है।

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