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दूसरी नज़र : शरणार्थी, प्रवासी और मानवता

जब तक इंसान का वजूद है, दुख-तकलीफ उसके साथ लगी रहेगी। गरीबी, बीमारी, आपसी झगड़ों, उत्पीड़न और युद्धों ने इंसान पर जाने कितनी अनकही मुसीबतें ढाई हैं..

Author नई दिल्ली | September 20, 2015 10:25 AM

जब तक इंसान का वजूद है, दुख-तकलीफ उसके साथ लगी रहेगी। गरीबी, बीमारी, आपसी झगड़ों, उत्पीड़न और युद्धों ने इंसान पर जाने कितनी अनकही मुसीबतें ढाई हैं। अपना घरबार छोड़ कर भागने और दूसरे मुल्क में- जहां के लोगों की भाषा, धर्म या संस्कृति अलग हो- पनाह तलाशने की मजबूरी से बढ़ कर कोई दूसरी विपत्ति नहीं हो सकती। संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थी उच्चायुक्त (यूएनएचसीआर) के अनुसार, पिछले साल के अंत में, ऐसे विस्थापितों की तादाद 5.95 करोड़ तक पहुंच गई, जिन्हें संघर्ष, युद्ध या अत्याचारों के कारण उजड़ना पड़ा।

विभाजन के बाद भारत और पाकिस्तान ने बड़े पैमाने पर विस्थापन की त्रासदी झेली। लाखों हिंदुओं और सिखों ने भारत के लिए पाकिस्तान छोड़ दिया, वहीं लाखों मुसलमान भारत छोड़ कर पाकिस्तान चले गए। यह हमारे प्रेरक स्वतंत्रता संग्राम का आखिरी और सबसे दुखद अध्याय था। जवाहरलाल नेहरू और वल्लभभाई पटेल के परिपक्व नेतृत्व में भारत ने अपनी सहृदयता दिखाई और सहिष्णुता, उदारता तथा समायोजन का उज्ज्वल उदाहरण पेश किया। पर इस कहानी के लज्जाजनक पहलू भी थे।

न तो मजहबी आधार पर बना पाकिस्तान और न ही सेक्युलर भारत उन हजारों लोगों की हत्याओं को रोक सका, जो एक तरफ से दूसरी तरफ जा रहे थे। हममें से कइयों ने उस वक्त के शरणार्थियों की दास्तान सीधे उनके मुंह से सुनी है, और यह भी कि वे कैसे उन मुश्किलों से जूझे और र्इंट-दर-र्इंट जिंदगी की इमारत नए सिरे से खड़ी की। पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में शरणार्थियों के ऐसे बहुतेरे उदाहरण हैं, जिन्होंने जीवन के हर क्षेत्र में कामयाबी हासिल की। दो शरणार्थी देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे।

कसौटी पर यूरोप की इंसानियत
यूरोप शरणार्थी-परिघटना से अनजान नहीं है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद, यूरोपीय देशों ने शरणार्थियों को स्वीकार किया था। यूरोप समृद्ध बना, और उसकी समृद्धि के प्रमुख कारणों में वह ऊर्जा भी थी, जो शरणार्थियों के साथ आई। वे मेहनती थे, अनुशासित और महत्त्वाकांक्षी थे, और वे उन समुदायों के साथ घुल-मिल गए जिनके बीच उन्होंने अपना नया घर बनाया।

इस इतिहास के बावजूद, पिछले कुछ हफ्तों में इस बात को लेकर निराशा छाई रही कि यूरोप ने अपनी मानवता का परित्याग कर दिया है। निराशा का यह भाव तब तक बना रहा जब तक एक विवेकी नेता, एंजेला मर्केल, की पहल सामने नहीं आई। उन्होंने सहृदयता और राजनीतिज्ञता का परिचय देते हुए साथी नेताओं से अनुरोध किया कि वे इस समस्या का समाधान तलाशें। स्वागतम (विल्कोमेन) की तख्तियां लिए और शरणार्थियों को गले लगाए सैकड़ों जर्मन लोगों की तस्वीरें सामने आने से उन दिलों पर कुछ मरहम लगा होगा, जिन्हें तीन साल के आयलान कुर्दी की तुर्की के समुद्र तट पर पानी में पड़ी बेजान देह का फोटो देख कर गहरी चोट पहुंची थी। कुछ हफ्तों की बेचैनी के बाद यूरोप ने अपनी मानवता का इजहार किया। हालांकि तब भी हंगरी जैसे कुछ देशों का रवैया अलग था।

अक्सर लोग शरणार्थियों को प्रवासी मान लेने की गफलत कर बैठते हैं। शरणार्थी ऐसे पीड़ित लोग हैं, जो अपने देश में जुल्म या मारे जाने के डर, या दोनों का सामना करते हैं। अपना वतन छोड़ कर भागने के सिवा उनके सामने कोई दूसरा चारा नहीं होता।

देशांतरण अलग मसला है
प्रवासियों की श्रेणी अलग है। उनके पास विकल्प होता है और वे अमूमन बेहतर आर्थिक अवसरों की तलाश के लिए अपना वतन छोड़ते हैं। बहुत-से लोग परदेस का रुख इसीलिए करते हैं क्योंकि वे बड़ी गरीबी में जीते हैं या उनके पास रोजगार नहीं होता। अलबत्ता कई सुशिक्षित या संपन्न लोग भी अपना देश छोड़ कर कहीं और ठिकाना तलाशते हैं। बेहतर शिक्षा, बेहतर रोजगार, रहने और परिवार के भरण-पोषण के लिए बेहतर परिवेश या बेहतर राजनीतिक व्यवस्था की चाहत में हर साल भारत से जाकर अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया या न्यूजीलैंड में बसने वालों की तादाद इस बात का प्रमाण है।

अमेरिका प्रवासियों का देश है, लेकिन वहां मैक्सिको और अन्य दक्षिण अमेरिकी देशों के (कथित) प्रवासियों के प्रति जबर्दस्त विरोध-भाव है। यूरोप को अपनी अर्थव्यवस्था टिकाए रखने और अपनी बूढ़ी होती आबादी के सहारे के लिए प्रवासियों की दरकार है। अनुमान लगाया गया है कि अगले पांच साल में यूरोप को ऐसे चार करोड़ लोगों की जरूरत पड़ेगी। फिर भी कई सरकारें और राजनीतिक दल प्रवासियों के विरोध की मुहिम चलाते रहते हैं।

इतिहास का सबक यह है कि देशांतरण को रोका नहीं जा सकता, इसे सिर्फ नियोजित किया जा सकता है। तमाम देश एक ऐसा मॉडल विकसित करने की जद्दोजहद में हैं, जो प्रवासी मसले को इस ढंग से सुलझाए जो उनकी अपनी खास स्थिति के मुआफिक हो।

पूर्वाग्रह की गुंजाइश नहीं
भारत ने समय-समय पर शरणार्थी समस्या का सामना किया है। इस सिलसिले की सबसे नई कड़ी श्रीलंका से आए कुछ हजार शरणार्थियों की थी। अत्याचारों के चलते या जान बचाने की खातिर भागे लोगों का इस्तकबाल किया ही जाना चाहिए, वे चाहे जिस कौम के या चाहे जिस धर्म को मानने वाले हों। पिछले दिनों तब बहुत नाराजगी फैली जब कुछ देशों (हंगरी, आस्ट्रेलिया) ने ईसाई शरणार्थियों को तरजीह देना चाहा, और इस तरह अपना धार्मिक और सांस्कृतिक पूर्वाग्रह प्रदर्शित किया।

लेकिन तब आलोचना का स्वर क्यों नहीं उठा, जब भारत सरकार ने पाकिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यक समुदाय से ताल्लुक रखने वाले नागरिकों को अपने पासपोर्ट अधिनियम और विदेशी नागरिक अधिनियम के खास प्रावधानों से छूट देने की नीति बनाई? सरकार की प्रेस विज्ञप्ति कहती है कि यह नीति केवल हिंदुओं, सिखों, ईसाइयों, जैनों, पारसियों और बौद्धों के मद््देनजर लागू होगी। शिया और अहमदिया समुदायों तथा निरीश्वरवादियों और बुद्धिवादियों की बाबत क्यों नहीं?

भारत-बांग्लादेश सीमा के अपने पहले दौरे के वक्त जो खयाल मुझे कुरेद रहा था, वह यह कि ‘‘यह भूभाग एक देश था, जिसे विभाजन ने दो देश बनाया और ‘मुक्ति’ ने तीसरा हिस्सा किया।’’ भारत की सीमाएं काफी हद तक खुली हुई हैं। भारत इस बात की इजाजत नहीं दे सकता कि रोजी-रोटी की तलाश में गरीब प्रवासी यहां भर जाएं, जबकि खुद भारतीयों की एक बड़ी तादाद काफी गरीब है। प्रवासी समस्या से निपटने के लिए सरहद पर बाड़बंदी और कारगर नियंत्रण जरूरी है। स्थायी रिहाइश की छूट या लंबे समय के वीजा के बजाय निश्चित अवधि के वर्क परमिट उदारता से जारी किए जा सकते हैं, पर समय-सीमा का सख्ती से पालन होना चाहिए। सबसे अहम बात यह कि हम अपने पड़ोसी को खुशहाल होने में मदद कर सकते हैं: एक खुशहाल क्षेत्र अपने आप में प्रवासी समस्या की सबसे बड़ी काट है।

हरेक राष्ट्र को यह बात हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि शरणार्थी और प्रवासी में फर्क है। अगर वे ऐसा करेंगे, तो दोनों समस्याओं के तर्कसंगत समाधान निकाले जा सकते हैं।

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