पी चिदंबरम का कॉलम दूसरी नज़र : मेरा जन्म ही मेरी त्रासदी है - Jansatta
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पी चिदंबरम का कॉलम दूसरी नज़र : मेरा जन्म ही मेरी त्रासदी है

रोहित और उसके मित्रों ने मत्युदंड के खिलाफ और दिल्ली में ‘मुजफ्फरनगर बाकी है’ वृत्तचित्र दिखाए जाने के आयोजन पर किए गए हमले के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन किए थे। विद्यार्थी परिषद (आरएसएस-भाजपा की छात्र शाखा) ने उनके विरोध-प्रदर्शन की मुखालफत की।

Author नई दिल्ली | January 24, 2016 4:26 PM
हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के शोध छात्र वी. रोहित ने रविवार (17 जनवरी) को खुदकुशी कर ली थी। (फाइल फोटो)

सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ों के लिए तय ‘आरक्षण’ रोहित वेमुला को हैदराबाद विश्वविद्यालय तक ले आया, जहां वह जीवन विज्ञान (लाइफ साइंसेज) के शोधार्थी के तौर पर सामान्य कोटे के तहत स्थान पाने में कामयाब हुआ। पुरानी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था का ‘संरक्षण’ उसकी मौत का कारण बना।

यह हमारे युग का एक चमत्कार है कि एक दलित, जो कि एक सुरक्षा गार्ड और एक सिलाई करने तथा सिखाने वाली का बेटा था, शिक्षा की सीढ़ियां चढ़ सका और एक केंद्रीय विश्वविद्यालय में शोधार्थी के रूप में दाखिल हुआ। उसने बीच में कभी पढ़ाई छोड़ी नहीं। उसके माता-पिता ने कभी उसे इस बात के लिए उलाहना नहीं दिया कि परिवार के गुजारे में मदद के लिए जो काम उसने तलाशा है उसमें मामूली पैसे मिलते हैं। वह स्कूल या कॉलेज में कभी फेल नहीं हुआ। उसे कभी किसी तरह की अस्पष्ट बुरी हरकत के लिए निकाला नहीं गया था। उस पर किसी अपराध का आरोप नहीं था जो उसे जेल पहुंचा दे। लेकिन वह आखिरी बाधा पार नहीं कर सका।

रोहित और उसके मित्रों ने मत्युदंड के खिलाफ और दिल्ली में ‘मुजफ्फरनगर बाकी है’ वृत्तचित्र दिखाए जाने के आयोजन पर किए गए हमले के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन किए थे। विद्यार्थी परिषद (आरएसएस-भाजपा की छात्र शाखा) ने उनके विरोध-प्रदर्शन की मुखालफत की। दोनों समूहों को अपनी बात कहने का अधिकार था, जब तक कि वे एक दूसरे से सुरक्षित दूरी बनाए रखें। खुले समाज में आजादी और लोकतंत्र का यही मर्म है।

लेकिन जो हुआ वह इसके उलट था। विद्यार्थी परिषद के एक नेता ने अपने फेसबुक-पोस्ट में कहा कि आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के सदस्य गुंडे हैं। उसने आरोप लगाया कि एएसए के कुछ सदस्यों ने उसे मारा-पीटा है और फिर विद्यार्थी परिषद ने उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की। यह दो छात्र-समूहों के बीच मामूली झगड़ा था जिसे सुलझा लिया जाना चाहिए था, जिस तरह ऐसे छोटे-मोटे टंटे सुलझा लिये जाते हैं। पर ऐसा नहीं हुआ।

पटकथा कइयों ने लिखी: विश्वविद्यालय के प्राक्टोरियल बोर्ड का प्रवेश। मंत्री का प्रवेश, जो स्थानीय सांसद भी हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय का प्रवेश। नए कुलपति का प्रवेश। विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद का प्रवेश। पुलिस का प्रवेश।

विद्यार्थी परिषद ने मंत्री/स्थानीय सांसद से शिकायत की। मंत्री ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय को लिखा। फिर मंत्रालय ने विश्वविद्यालय को लिखा और पांच बार स्मरण-पत्र (रिमाइंडर) भेजे! विश्वविद्यालय ने तेजी दिखाते हुए एक जांच बिठा दी, रोहित समेत पांच छात्रों (सभी दलित) को निलंबित कर दिया; कुलपति ने अस्थायी तौर पर निलंबन रद््द कर दिया और दूसरी जांच के लिए नई समिति बनाने का आदेश जारी कर दिया; अगले कुलपति ने वह जांच समिति भंग कर दी और कार्यपरिषद की एक उप-समिति के जरिए नई जांच का हुक्म सुनाया; कार्यपरिषद ने निलंबन को सही ठहराया और उन छात्रों को होस्टल छोड़ देने के निर्देश दिए गए। त्रासदी की पटकथा कइयों के द्वारा लिखी जा रही थी, पर किसी ने ठिठक कर यह नहीं सोचा कि उस कार्रवाई का क्या परिणाम होगा जिसके लिए उन पर दबाव डाला गया है। त्रासदी सत्रह जनवरी को घटित हुई, जब रोहित ने खुद को फांसी लगा ली।

पात्र और अपात्र: किसे यह हक है कि उसके अनुरोध पर एक मंत्री/सांसद मानव संसाधन विकास मंत्रालय को पत्र लिखें, (एकदम सुनी-सुनाई बातों के आधार पर) आरोप लगाते हुए, कि आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन ‘जातिवादी और राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों’ में लिप्त है? किसे यह अधिकार है कि उसके कहने पर मंत्रालय विश्वविद्यालय को पत्र लिखे और फिर कुछ हफ्तों के भीतर पांच बार स्मरण-पत्र भेजे। यह वही कर सकता है जो ‘सुपात्र’ है।

भारत का इतिहास, ‘पात्र’ और ‘अपात्र’ के बीच संघर्ष का इतिहास है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जो हिंदू समाज के प्रतिनिधित्व का दावा करती है, पात्र है। दलित अपात्र हैं। हिंदू समाज की चातुर्वर्ण्य व्यवस्था दलितों को समाहित नहीं करती। अगर कोई चातुर्वर्ण्य व्यवस्था या इसके नियमों की अवज्ञा करता है, तो तुरंत दंड का भागी बनता है: बहिष्कार और निष्कासन।

नए कुलपति के मातहत हैदराबाद विश्वविद्यालय ने हिंदू समाज की तरह बर्ताव किया। उसने ‘परिसर की सभी गैर-अकादमिक और राजनीतिक गतिविधियों’ में उन छात्रों के शामिल होने पर रोक लगा दी (बहिष्करण), और उन्हें निर्देश दिया कि वे ‘छात्रावास छोड़ कर बाहर चले जाएं’ (निष्कासन)। एक संकाय प्रमुख ने कहा कि विश्वविद्यालय ने ‘उदार रुख’ अपनाया था। अगर विश्वविद्यालय ने ‘सख्त रुख’ अपनाने का फैसला किया होता, तो क्या दलित छात्रों के विरोध की आवाज बंद करने के लिए कहा जाता कि वे अपनी जुबान काट कर दे दें (जैसे कि द्रोणाचार्य ने एकलव्य से उसका दाहिना अंगूठा मांग लिया था)?

तूफान के संकेत: एक राष्ट्र के रूप में लगता है हमें अभी उस तूफान की व्यापकता के बारे में कोई अंदाजा नहीं है जिसके आने के संकेत इस भूभाग में सब तरफ हैं। वंचित भयग्रस्त हैं, सरकारों को लेकर सशंकित हैं, अपने को असहाय और अलग-थलग पाते हैं। उन्हें प्रभावशाली सामाजिक और राजनीतिक संगठनों का समर्थन नहीं मिल पाता है। ऐतिहासिक रूप से अपात्र माने गए समूहों में दलित, धार्मिक अल्पसंख्यक, अनुसूचित जनजातियां, औरतें तथा समलैंगिक शामिल हैं।

ऐसा लगता है कि रोहित इस संकट के केंद्र में आ गया, जो उसके मामले में वजूद का संकट था। इसे उसने इन शब्दों में व्यक्त किया: ‘मेरा जन्म ही मेरे साथ सबसे बड़ी दुर्घटना है।’

जैसे ‘जेसिका लाल को किसी ने नहीं मारा’, ठीक वैसे ही रोहित की मौत के लिए कोई जवाबदेह नहीं है, या किसी को जवाबदेह नहीं ठहराया जाएगा। न अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, जिसने सात महीनों तक लगातार दबाव बनाए रखा; न मंत्री/सांसद, जिन्होंने आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन की ‘जातिवादी तथा राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों’ की खोज की; न ही मानव संसाधन विकास मंत्रालय, जिसने चार महीनों में पांच स्मरण-पत्र भेजे; और न ही विश्वविद्यालय, जो मामले को एक अधिकारी से दूसरे अधिकारी को तब तक सौंपता रहा जब तक कि ‘अपात्र’ को संतोषजनक सजा नहीं दे दी गई।
रोहित चक्रवर्ती वेमुला ने, जो ‘कार्ल सैगन जैसा’ विज्ञान लेखक बनना चाहता था, हमारे लिए एक पत्र छोड़ा है (उसका एकमात्र पत्र), जो हमारे राष्ट्र की विकट स्थिति का दस्तावेज है। इसे पढ़ें, बारंबार पढ़ें।

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