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विमर्शः ओड़िया दलित साहित्य का दायरा

ओड़िया का दलित साहित्य, भारतीय दलित साहित्य आंदोलन का उल्लेखनीय पक्ष है। हिंदी क्षेत्र में अभी उसकी ठीक से चर्चा नहीं हुई है। बंगाल के दलित आंदोलन से ओड़िया की दलित सक्रियता कई मायनों में भिन्न है। ये दोनों ही पूर्वी भारत की जाति व्यवस्था और उसके प्रति भुक्तभोगियों की विशिष्ट प्रतिक्रिया के साक्ष्य हैं।

ओड़िया का दलित साहित्य, भारतीय दलित साहित्य आंदोलन का उल्लेखनीय पक्ष है। हिंदी क्षेत्र में अभी उसकी ठीक से चर्चा नहीं हुई है। बंगाल के दलित आंदोलन से ओड़िया की दलित सक्रियता कई मायनों में भिन्न है। ये दोनों ही पूर्वी भारत की जाति व्यवस्था और उसके प्रति भुक्तभोगियों की विशिष्ट प्रतिक्रिया के साक्ष्य हैं। ओड़िशा की तुलना में बंगाल का दलित आंदोलन अपेक्षाकृत अधिक संगठित, आक्रामक, व्यापक और राजनीतिक रहा है। दरअसल, ओड़िया समाज में जाति आधारित हिंसा का वह रूप देखने को नहीं मिलता जो बंगाल या अन्य प्रांतों में रहा है। आलोचक इसके पीछे दो कारणों को चिह्नित करते हैं। एक, जगन्नाथ संस्कृति इस प्रांत की मूलाधार है। यह उदार संस्कृति है। वर्णगत विभेद को पनपने से रोकने वाली। इसके चलते ओड़िशा के दैनंदिन जीवन में सामाजिक हिंसा कभी उग्र रूप में नहीं आ सकी। दूसरा, इस प्रांत में आदिवासियों की बहुलता के कारण अनुसूचित जाति समुदाय सीधे निशाने पर कभी नहीं रहा। बेगारी का काम आदिवासियों से करवाया जाता रहा और उन्हें ही सबसे अधिक सताया गया।

समकालीन ओड़िया दलित साहित्य की पृष्ठभूमि पर नजर डालने से इसकी विकास यात्रा के तीन पड़ाव दिखाई देते हैं। पहला सहजयानी बौद्ध सिद्धों का युग है। सातवीं से दसवीं शताब्दी के बीच। ओड़िया भाषा का पूर्वरूप इसी युग में पहली बार दिखता है। चौरासी सिद्धों में ओड़िशा की दलित जाति के साधक-सिद्ध-कवि भी हैं। भुसुकपाद इसी सूची के हैं और ओड़िया के पहले कवि माने जाते हैं। शबर यहां की प्रमुख दलित-आदिवासी जाति है। सरह के शिष्य और प्रमुख सिद्ध शबरपा का ताल्लुक इसी जाति से है। तंतीपाद, कान्हूपाद और डोम्बिपाद ने प्रतिवाद की भाषा में चयार्गीत लिखे हैं। ये गीत बोलचाल की शब्दावली में हैं। डोम, चंडाल, शबर जैसी अस्पृश्य जातियों से आए इन सिद्धाचार्यों ने अपने चर्यागीतों से तत्कालीन जनसमाज को वाणी दी है। इस वाणी में शबर भाषा के शब्द घुले-मिले हैं। यह भाषा इस प्रदेश की आदिम ज्ञात भाषा है। बासुदेव सुनानी जैसे दलित विचारक इसे द्रविड़ भाषा परिवार से संबद्ध करके देखते हैं।

ओड़िया साहित्य का प्रथम प्रामाणिक इतिहास लिखने वाले मायाधर मानसिंह का कथन है कि द्रविड़ संस्कृति पर आर्य संस्कृति का पतला लेप चढ़ा देने से ओड़िया संस्कृति बनती है। मायाधर मानसिंह यह दावा भी करते हैं कि आधुनिक भारतीय भाषाओं में ओड़िया सर्वाधिक गणतांत्रिक भाषा है। ओड़िशा के प्रमुख दलित जाति समुदायों में- गण, डोम, पाण, चमार, भुंजिया, बिंझाल, पहरिया, गउड़, भत्रा, कंध, परजा आदि हैं। इन जातियों के प्रथम ज्ञात रचनाकार सिद्धाचार्यों की सूची में मौजूद हैं। आठवीं शताब्दी में शंकराचार्य यहां आए और पुरी में एक धाम स्थापित किया। इसके बाद गंगवंश और सोमवंशी राजाओं के शासनकाल में यहां ब्राह्मण मत प्रतिष्ठित हुआ और बौद्ध धम्म उच्छिन्न होने लगा।

दलित अभिव्यक्ति का दूसरा चरण चौदहवीं शताब्दी के बाद उभरे भक्ति आंदोलन में दिखाई देता है। भुसुकपाद ने जिस ओड़िया साहित्य की नींव डाली थी उसे प्रतिष्ठित करने का काम भक्त कवि सरलादास ने किया। सरलादास को शूद्र मुनि कहा जाता है। उन्हें बावरी जाति का बताया गया है। वे यहां के शासक कपिलेंद्र देव के शासनकाल (1435-1466) के समय विद्यमान थे। उन्होंने आम जनता की भाषा में महाभारत की रचना की। सरलादास के बाद पंच सखा भक्त कवियों का नाम आता है। ये पंच सखा हैं- बलरामदास, जगन्नाथदास, अनंतदास, यशवंतदास और अच्युतानंद दास। ये सब वैष्णव कवि थे लेकिन चेतना के स्तर पर बुद्ध के तत्त्वज्ञान से परिचालित थे। ये सिर्फ कवि नहीं, समाज सुधारक भी थे। 1473 में उत्पन्न बलरामदास पुरोहितवाद के विरुद्ध थे। उनका प्रतिमा पूजा में विश्वास नहीं था। इष्टदेव के समक्ष समर्पण को ही वे मान्यता देते थे। बाह्य आचार-विचार के प्रति उनका दृष्टिकोण खंडनात्मक था।

वेद-वांग्मय पढ़ना शूद्रों का भी अधिकार है, ऐसी उनकी दृढ़ मान्यता थी। चैतन्य महाप्रभु के पुरी आने से पहले बलरामदास प्रतिष्ठित हो चुके थे। जाति-विरोधी तीव्र भावधारा का ह्रास चैतन्य के आने के बाद होता है। बलरामदास (जगन्नाथ) पुरी के निवासी थे। पंडों की छीना-झपटी को वे आए दिन देखते थे और खीझते थे। अपनी खीझ को उन्होंने तरह-तरह से व्यक्त किया है। ‘लक्ष्मीपुराण’ बलरामदास की चर्चित कृति है। इसे एक साथ जाति-विरोधी और लैंगिक वर्चस्व विरोधी रचना माना जाता है। जगन्नाथ की जीवनसंगिनी का बहनापा एक चंडाल स्त्री से था। वे गाहे-बगाहे अपनी सखी के घर जाती थीं। जगन्नाथ के अनुज बलभद्र को यह पता चला। उन्होंने अपने भ्राता के कान भरे। आहत लक्ष्मी चंडाल के घर ही चली गर्इं और वहीं रहने लगीं। उनके चले जाने से जगन्नाथ और बलभद्र विपन्न होने लगे और आखिरकार भीख मांगने पर मजबूर हो गए। अन्य पंच सखा कवियों ने भी जातिप्रथा के विरुद्ध उद््गार व्यक्त किए हैं।
ओड़िया दलित इतिहास का तीसरा दौर आधुनिक काल में आता है। इस तीसरे चरण के भी तीन पड़ाव हैं। पहले पड़ाव में भीम भोई (1855-1895) और उनके द्वारा चलाया गया महिमा धर्म है। भीम भोई जातिप्रथा के विरोधी थे। वे सामाजिक वास्तविकता पर लिखने वाले विचारक थे। कंध जाति के भीम प्रज्ञाचक्षु थे। वे मानते थे कि सृष्टि में दो ही स्वरूप हैं- स्त्री और पुरुष। तीसरी जाति है ही नहीं। जाति-व्यवस्था मनुष्यकृत है इसलिए वह एक न एक दिन खत्म होगी। भीम भोई के अनुयायी ओड़िशा के अलावा छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, मुंबई, अयोध्या, नेपाल में भी हैं। भीम ने जातिप्रथा पर सीधा हमला बोला था। वे औपचारिक शिक्षा से रहित लेकिन समता के भाव से परिपूर्ण लोकनायक थे।
दूसरा पड़ाव 1950-1980 का है। इसमें ओड़िशा में आंबेडकर की विचारधारा फैलाने का काम किया गया। रामकृष्ण महानंद, गोविंद सेठी आदि लेखकों ने बाबासाहेब की जीवनी लिख कर उनकी चेतना को दलित जन समुदाय तक ले जाने का प्रयास किया। इस पड़ाव में रचनात्मक लेखन में कोई विशेष उपलब्धि नजर नहीं आती है। हां, वाम विचारधारा से जुड़े और दलित पृष्ठभूमि से आए कवि विचित्रानंद नायक ने बेशक सामाजिक परिवर्तन की क्रांतिकारी कविताएं लिखी हैं। उनका संग्रह ‘अनिर्वाण’ 1973 में आया था। यह महाराष्ट्र में दलित पैंथर के आक्रामक उभार का समय था।
ओड़िया में दलित रचनाओं का एक संकलन ‘अस्पृश्य’ शीर्षक से वर्ष 2001 में प्रकाशित हुआ। उसके बाद यहां दलित रचनाशीलता में अपूर्व तेजी आती है। ओड़िशा में कोई दलित साहित्यांदोलन नहीं आया। इसकी जगह यहां के दलित रचनाकार अन्य प्रांतों के दलित आंदोलन और रचनाकारों के संपर्क में आए। कुछ उनके अनुकरण पर और कुछ अपनी परिस्थितिगत, अनुभवगत रचनात्मक दबावों के कारण धड़ाधड़ लेखन और प्रकाशन का सिलसिला शुरू हो गया। अभी ओड़िया दलित साहित्य का सृजन कई विधाओं में हो रहा है। कविता इनमें सबसे आगे है। इसके बाद कहानी और फिर निबंध का नंबर आता है। दो-तीन उपन्यास भी लिखे जा चुके हैं। आत्मकथा लेखन पर अभी जोर नहीं है। यह बात ओड़िया दलित साहित्य को अन्य भारतीय भाषाओं में लिखे जा रहे दलित साहित्य से अलग करती है। प्रमुख ओड़िया दलित रचनाकारों में बासुदेव सुनानी, समीर रंजन, संजय बाघ, सुप्रिया मल्लिक, संध्यारानी भोई, मोहन जेना, कुमारमणि तंती, शंकर महानंद, डोलामणि कंधेर और ज्योत्स्ना रानी भोई उल्लेखनीय हैं।

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