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बाखबर: बिहार में ई बा

इस बीच ‘अब तक न आ सकी वैक्सीन’ ने एडवांस में कमाल कर दिखाया। बिहार के चुनाव में जैसे ही भाजपा ने अब तक ‘अमूर्त वैक्सीन’ को बिहार के लोगों को मुफ्त में लगाने का संकल्प किया, त्यों ही अब तक की सोई बहसें मूर्त हो उठीं।

Bihar Elections में NDTV के पत्रकार Ravish Kumar ने बिहार के सीएम Nitish Kumar और डिप्टी सीएम Sushil Modi पर तंज कसा है।

उत्तेजक सीन कैसे बनाया जाता है और उससे हल्ला कैसे उगाया जाता है, इसे देखना हो तो एक चैनल के सीन को याद करें, जिसमें एंकर कहता है कि हमारे चैनल के उस साहसी पत्रकार को पंद्रह पुलिसवालों ने घंटों से घेरा हुआ है। अरी पत्रकार, तुम थाने में घुस कर पूछो कि वे उसे कब छोड़ रहे हैं। पत्रकार थाने के रिसेप्शन तक जाती है और बार-बार यही पूछती रहती है कि कब छोड़ रहे हो उनको। कब कब कब… दस मिनट तक यही ‘कब कब’ होता रहता है… एक पुलिसवाला कहता है कि पांच मिनट में छोड़ रहे हैं… पांच मिनट हो जाते हैं, तो फिर वह रिपोर्टर चीखने लगती है कि कब छोड़ोगे? कब छोड़ोगे? इधर एंकर स्टूडियो से चीख रहा है। उधर रिपोर्टर बरामदे से चीख रही है और बाकी पांच-छह रिपोर्टर बाहर से चीख रहे हैं।
सीन में रहस्य-रोमांच भर रहा है कि अब देखें पुलिस क्या करती है… देखो तो, पत्रकारों के आगे पुलिस कितनी असहाय दिखती है कि एक रिपोर्टर से डरती दिखती है।

रिपोर्टर कोई दस निमट तक ऐन सामने दनदनाती रहती है… एंकर चीखता रहता है… बाकी के चार-पांच रिपोर्टर बाहर चीखते रहते हैं कि अचानक वह बांका पत्रकार बाहर आने लगता है… जयकारे का-सा माहौल बन जाता है। हमारे चैनल की जीत हुई… और फिर वही एक ओर छातीकूट विलाप, दूसरी ओर अपनी विजय पताका फहराना कि देखा हमारा पव्वा!इसे कहते हैं शून्य में से एक्शन-सीन बनाना, फिर ‘विक्टिम’ खेलना, शहादत शहादत खेलना, फिर अपनी हीरोइक्स दिखाने लगना!

इन दिनों एंकर को अपने को जमाए रखने के लिए कैसी-कैसी नकली तलवारें नहीं भांजनी पड़तीं!अपने को चौबीस बाई सात की खबर बनाने की यह तरकीब, पत्रकारिता के पाठ्यक्रमों में पढ़ाने योग्य है, क्योंकि टीआरपी बढ़ाने की अब यही एक कला बची है कि पहले हल्ला बोल, फिर विक्टिम खेल, फिर हल्ला बोल, फिर अपनी वीर-मुद्रा को बेच कि देखो! देखो! सारा मीडिया चुप है!

और बकिया मीडिया भी इतना निर्लज्ज हो चला है कि भइया जी के पक्ष में एक लाइन न बोला, जबकि एक आॅनलाइन पत्रकार के लिए एक प्रेस संस्थान ने कुछ आंसू बहाए! लेकिन इस छातीकूट विक्टिम-कथा की ‘उत्तर-कथा’ इस तरह बनी कि सिर्फ तीन दिन पहले एक मीडिया कंपनी बनती है, फिर टीआरपी में हेरा-फेरी को लेकर यूपी में केस किया जाता है और तुरंत केस सीबीआइ को दे दिया जाता है। लेकिन हा हंत! ज्यों ही ऐसी खबर आती है, त्यों ही महाराष्ट्र के गृहमंत्री कह देते हैं कि सीबीआइ कोे जांच करने से पहले राज्य सरकार की अनमुति लेनी जरूरी है!
इसे कहते हैं खुला पंगा कि ‘तू डाल डाल तो मैं पात पात!’

और अब तो यह पंगा इस कदर जहरीला हो चला है कि एक दिन एक अगाड़ी नेता तक एक चैनल के एंकर के संदर्भ में यह तक कह उठते हैं कि एक दिन वह पागल हो जाएगा… वह आत्महत्या कर लेगा, यानी वो भी सुशांत बन जाएगा!सर जी! कुछ तो रहम करें! हमारे प्यारे भइया जी की निराली पत्रकारिता से चिढ़ कर आप ‘शाप’ छाप कुभाखा तो न बोलें!फिर भी, इस छातीकूट खबर को दो दिन के लिए किनारे किया ‘वो क्या आइटम है’ कहने वाले एक पूर्व-सीएम ने।आह! वह आइटमवादी मर्दवादी सीन इस कदर लंपट था कि सारी सभा ने अश्लील-सा ठहाका लगाया हा हा हा हा!
लेकिन जिसका ‘आइटम’ कह कर उपहास किया था, वही दलित महिला बार-बार अपने आंसुओं को अपने पल्लू से पोंछती सब चैनलों पर बोलती दिखती रही कि यही बात सोनिया से कहते तो कैसा लगता?

नकद दो दिन ठुकाई खाने के बाद राहुल जी को होश आया और उन्होंने नेता जी के ‘आइटम’ को नापसंद किया, तब जाकर नेताजी ने अगर-मगर लगा कर माफी मांगी। लेकिन एक दिन, ‘तनिष्क ज्वेलरी ब्रांड’ ने ‘होम करते हाथ जला’ लिया! चाहा तो था कि एक मुसलमान परिवार में एक हिंदू लड़की (बहू) की, हिंदू रीति से ‘गोद भराई’ का समारोह करवा के अपनी ‘ब्रांड ज्वेलरी’ की मार्केटिंग करते हुए, सेक्युलर संदेश देने का पुण्य भी लूटा जाय!
लेकिन जैसे ही पुण्य के लिए ‘पुश’ किया कि कथित ‘हिंदू बाइगोट्स’ ने सारा खेल बिगाड़ दिया और अंतत: इस विज्ञापन को ही वापस लेना पड़ा!
ऐसा होते ही चैनलों में हंगामा था।

हर चैनल अपने ब्रांड एक्सपर्ट और ‘बाइगोट्स’ और ‘सेक्युलरों’ को लेकर भिड़ा रहा कि इस ज्वेलरी ब्रांड को क्या ऐसा विज्ञापन बनवाना चाहिए था? सेक्युलर बोलते कि विज्ञापन सेक्युलर मूल्यों का संदेश देता है, तो दूसरे बोलते कि यह ‘लव जिहाद’ को ‘सेलीबे्रट’ करता है। एक चैनल दो दिन इस विज्ञापन को सेक्युलर आदर्श बता कर दिखाता रहा। बाकी तो पहले ही इसे ‘लव जिहादी’ सिद्ध कर चुके थे। अंत में सेक्युलरों ने उदात्तता दिखाते हुए कहा कि ब्रांड ने अपने कर्मचारियों की सुरक्षा की खातिर इसे वापस लिया!

इस बीच ‘अब तक न आ सकी वैक्सीन’ ने एडवांस में कमाल कर दिखाया। बिहार के चुनाव में जैसे ही भाजपा ने अब तक ‘अमूर्त वैक्सीन’ को बिहार के लोगों को मुफ्त में लगाने का संकल्प किया, त्यों ही अब तक की सोई बहसें मूर्त हो उठीं। शशि थरूर ने तुरंत ट्वीट मारा कि इसका मतलब है कि ‘तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें वैक्सीन दूंगा!’ ये क्या बात हुई? बिहार में का बा? बिहार में तेजस्वी बा! तेजस्वी के पास भीड़ बा! भाजपा का मुफ्त वैक्सीन बा! और, वैक्सीन पर झगड़ा बा! बिहार में ई बा!

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