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तीरंदाजः सनातन अविरल धारा

सनातन धर्म की भव्य संरचना मूलत: तीन विशिष्ट स्तंभों पर आधारित है। इसका पहला स्तंभ देवता है, दूसरा पितर और तीसरा स्तंभ ऋता है।

पूर्वज सत्ता को स्वीकार करके, उनका अनुकरण करके, हम धर्म सत्ता को बल देते हैं। संतान का माता-पिता के लिए असीम प्रेम, आदर और श्रद्धा सर्वविदित सत्य है।

सनातन धर्म की भव्य संरचना मूलत: तीन विशिष्ट स्तंभों पर आधारित है। इसका पहला स्तंभ देवता है, दूसरा पितर और तीसरा स्तंभ ऋता है। इन सभी स्तंभों की परिकल्पना और रचना का सूत्र चार वेदों में है, जिनमें ऋग्वेद प्राचीनतम ग्रंथ है। आधिकारिक रूप से कहा जा सकता है कि मानव सभ्यता के इतिहास में ऋग्वेद जैसा प्रलेख भारत के आलावा कहीं और उपलब्ध नहीं है। वास्तव में ऋग्वेद में एक नहीं, तीन ‘धर्म’ निहित हैं। यह धर्म प्राकृतिक और वैज्ञानिक है, जो मिल कर, और अलग अलग भी, एक अविरल और पवित्र काव्यात्मक, दर्शनिक और सिद्ध जीवनधारा का निर्माण करते हैं। एक तरह से ऋग्वेद के जरिए हम हजारों साल बाद भी प्रत्यक्ष रूप से देख सकते हैं कि किस तरह से आदि मानव ने अचेत अवस्था से अविनाशकारी चेतना का सृजन किया था। ऋग्वेद की ऋचाएं विस्मय से उत्पन्न होती हैं, पर जल्दी ही तर्क, दर्शन और सिद्धांत को अपने में सम्मलित कर लेती हैं। पहले श्लोक से अंतिम श्लोक के बीच की दूरी में ऋग्वेद ने वह सब कुछ समेट लिया है, जो सर्वत्र व्यापत तो है, पर जिसके निर्माण की कड़ियां अदृश्य हैं। यह तर्कनिष्ठ सृजनता ऋग्वेद की अद्भुत उपलब्धि है, जिसके द्वारा ब्रह्म निर्माण के ब्रह्म सत्यों को मानव मेधा से जोड़ कर मनुष्य जीवन शैली की सशक्त नीव डाली गई है।

ऋग्वेद के तीनों स्तंभों के अपने-अपने विलक्षण गुण हैं। देवता धर्म और ऋता धर्म आम रूप से सनातन धर्म को परिभाषित करते हैं। पर पितर धर्म के बिना यह परिभाषा संभव नहीं है। इसीलिए पितृपक्ष का हिंदू धर्म में बड़ा महत्त्व है और लगभग हर परिवार इसे श्रद्धा से मनाता है। श्रद्धा से ही श्राद्ध शब्द बना है, क्योंकि पितरों के प्रति श्रद्धा वेदों का मूलभूत सिद्धांत है। इस सिद्धांत से अविनाशी आत्मा, आत्म, ब्रह्म, पाप-पुण्य, कर्म और पुनर्जन्म आदि की तर्कयुक्त व्याख्या संभव हो सकी है। पर दर्शन और शास्त्र के आलावा पितरों का महत्त्व स्मरण में है। पितरों का सुमिरन कर के हम अपने पारिवारिक इतिहास और उस इतिहास में हुए आचरण को याद करते और उससे प्रेरणा लेते हैं। यह पारिवारिक श्रद्धा अन्य पारिवारिक प्रेरणाओं से जुड़ कर समाज और समूह को अपने बीते काल से जोड़ती है। यह पुश्त-दर-पुश्त समाज को एक विशेष ऐतिहासिक, वैचारिक और दार्शनिक भाव में पिरो देती है। पितृपक्ष और पितरों का इस वजह से सामाजिक धर्म के निर्वाह में बड़ा योगदान है।

ऋग्वेद आरंभ में ही ऋता के लक्षण समझ कर उनको परिभाषित कर देता है। ऋता एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो ब्रह्मांड में निहित होने की वजह से उसका संचालन करती है। जैसे सूरज का रोज पूरब से निकलना और पश्चिम में अस्त हो जाना या फिर ऋतुओं का निश्चित समय पर बदलना। ऋग्वेद इस प्रत्यक्ष सत्य से तमस और ज्योति के सत्य को जोड़ता है और फिर मनुष्य जन्म और मृत्यु की विवेचना करता है। देवता प्रकाश पुंज का प्रतीक है, जीवन का प्रतीक है और सूर्य पूरब से उगता है। इसलिए देवता पूरब में वास करते हैं और मनुष्य जीवन की उत्पत्ति देवताओं के संबल से पूरब से होती है। मृत्यु जन्म का अस्त है, यानी सूर्य की तरह पश्चिम में उसका अस्त होना प्राकृतिक है। पश्चिम में यम है, मृत्यु के देवता। ऋग्वेद में माना गया है कि जन्म और मृत्यु दोनों ही प्राकृतिक प्रक्रियाएं हैं, पर व्यक्ति आता कहां से है और जाता कहां है? जन्म से पहले प्राणी की आत्मा जो उसे सचल, सचेतन करती है कहीं जरूर रहती होगी और इसी तरह जीवन लीला समाप्त होने के बाद कहीं जाती होगी, जहां से कर्मों के फलस्वरूप या तो वह ब्रह्म में लीन हो जाती है, वरना दोबारा जन्म लेती है।

वेद यम को पहला पितर मानते हैं। वह प्रथम आदि पूर्वज है, जो पूरब से पश्चिम यानी जन्म से मृत्यु की ओर गए थे। देवताओं की मृत्यु नहीं हो सकती है, क्योंकि वे अमर हैं। यम को देवता माना गया है, पर हमारे पितरों का पूर्वज भी माना गया है। वे अस्त जीवन के देवता हैं और इसलिए खुद पितर नहीं, बल्कि पितरों के नायक हैं। दूसरे शब्दों में, देवता और पितर का सम्मिलित रूप हैं। ऋग्वेद का कहना है कि चूंकि आत्मा अजर, अमर है और शरीर धारण करके वह विभिन्न प्रकार की क्रियाएं करती है, जिसका विशेषकर परिवार पर और साथ में समाज पर प्रभाव पड़ता है, इसलिए मृत्यु के पश्चात भी वंशज उसके प्रभाव से मुक्त नहीं हो सकते हैं। जैसे जीते जी हम अपने बड़े-बुजुर्गो की सत्ता में कार्य करते हैं, उनके प्रभाव से अपने मसले निपटाते हैं, उसी तरह मृत्यु पश्चात भी हाल ही में गुजरे वरिष्ठ और उनसे पहले के पूर्वजों की इच्छा पर चलने से ही सद्मार्ग की प्राप्ति हो सकती है।

पूर्वज सत्ता को स्वीकार करके, उनका अनुकरण करके, हम धर्म सत्ता को बल देते हैं। संतान का माता-पिता के लिए असीम प्रेम, आदर और श्रद्धा सर्वविदित सत्य है। परिजनों की मृत्यु के बाद भी उनका स्नेह और प्रभाव हमारे जीवन पर कम नहीं होता है। वह हमेशा अदृश्य रूप से हमारे साथ रहता है। इस अटूट संबंध की सत्यता को ऋग्वेद ने पितर अवधारणा से जोड़ कर आत्मा के अमर और प्रभावी होने की संकल्पना स्थापित की है। पितर अगर हमारे पूर्वज हैं, तो वे कैसे थे? वेद के अनुसार वे सत्य थे, सुविदात्र थे, ऋतावत थे, कवि थे, पथिक्रित और सौम्य थे। उनमें ये सब गुण निहित थे और इसीलिए पितरों का अनुसरण हमें श्रेष्ठता के पथ पर अग्रसर करता है। ऋग्वेद की ऋचाओं में पितरों से बार-बार याचना की गई है कि वे वंशजों के साथ बने रहें, उनको आशीर्वाद दें और उनका मार्गदर्शन करें।

वर्तमान समय में पितृपक्ष में कोई नया या शुभ कार्य नहीं किया जाता है। पर यह मान्यता वैदिक मान्यता के विरुद्ध है, जिसमें शुभ अवसरों पर भी पितरों का श्राद्ध किया जाता है। यह पूर्वजों के नाम पर दान है, उनके प्रति अपनी श्रद्धा की अभिव्यक्ति है, जिसको शादी-ब्याह जैसे मौकों पर करना श्रेयस्कर बताया गया है। ऋग्वेद और उसके बाद के तीन अन्य वेदों ने देवता, पितर और ऋता के तीन स्तंभों को खड़ा करके सनातन धर्म के महामंदिर को वह संरचना दी है, जो लौकिक से पारलौकिक, धरती से नभ, अणु से ब्रह्मांड और मनुष्य को ब्रह्म से एक सूत्र में पिरोती है। पितरों का पूजन और उनसे अनुग्रह इस संरचना की आधारशिला है। इसकी महत्ता को पूरी तरह से समझने के बाद ही हम सनातन अविरल धर्मधारा से सिंचित हिंदू अपने को कह सकते हैं।

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