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किताबें मिलीं: चुनी हुई कहानियां, सहेला रे, नर-नारीश्वर और लाल श्याम शाह

हरीश पाठक बिना किसी लाग-लपेट, दबाव, विचारधारा तथा पक्षधरता के, सिर्फ कहानी लिखने में विश्वास करते हैं। उनकी कहानियों में जीवन की छोटी-बड़ी, देखी-अनदेखी घटनाएं गहरा प्रभाव लेकर आती हैं।

Author February 18, 2018 3:03 AM
किताह लाल श्याम शाह का कवर पेज।

सहेला रे

भारतीय संगीत का एक दौर रहा है जब संगीत के प्रस्तोता नहीं, साधक हुआ करते थे। वे अपने लिए गाते थे और सुनने वाले उनके स्वरों को प्रसाद की तरह ग्रहण करते थे। ऐसा नहीं कि आज के गायकों-कलाकारों की तरह वे सेलेब्रिटी नहीं थे, वे शायद उससे भी ज्यादा कुछ थे, लेकिन कुरुचि के आक्रमणों से वे इतने दूर हुआ करते थे जैसे पापाचारी देहधारियों से दूर कहीं देवता रहें। बाजार के इशारों पर उनके अपने पैमाने झुकते थे, न उनकी वह स्वर-शुचिता, जिसे वे अपने लिए तय करते थे। उनका बाजार भी गलियों-कूचों में फैला आज-सा सीमाहीन बाजार नहीं था, वह सुरुचि का एक किला था, जिसमें अच्छे कान वाले ही प्रवेश पा सकते थे। मृणाल पाण्डे का यह उपन्यास टुकड़ों-टुकड़ों में उसी दुनिया का एक पूरा चित्र खींचता है। केंद्र में हैं पहाड़ पर अंग्रेज बाप से जन्मी अंजलिबाई और उसकी मां हीरा। दोनों अपने वक्तों की बड़ी और मशहूर गानेवालियां। न सिर्फ गानेवालियां, बल्कि खूबसूरती और सभ्याचार में अपनी मिसाल आप। पहाड़ की बेटी हीरा एक अंग्रेज अफसर एडवर्ड के. हिवेट की नजर को भाई, तो उसने उस समय के अंग्रेज अफसरों की अपनी ताकत का इस्तेमाल करते हुए उसे अपने घर बिठा लिया और एक बेटी को जन्म दिया, नाम रखा विक्टोरिया मसीह। हिवेट की लाश एक दिन जंगलों में पाई गई और नाज-नखरों में पल रही विक्टोरिया अनाथ हो गई। शरण मिली बनारस में, जो संगीत का और संगीत के पारखियों का गढ़ था। लेकिन यह कहानी उपन्यासकार को कहीं लिखी हुई नहीं मिली, इसे उसने अपने उद्यम से, यात्राएं करके, लोगों से मिल कर, बातें करके, यहां-वहां बिखरी लिखित-मौखिक जानकारियों को इकट्ठा करके पूरा किया है। इस तरह पत्र-शैली में लिखा गया यह उपन्यास कुछ-कुछ जासूसी उपन्यास जैसा भी सुख देता है।

सहेला रे : मृणाल पाण्डे; राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, 7/31, अंसारी मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 199 रुपए।

लाल श्याम शाह

जीवनी लेखन हमारे देश में एक अविकसित विधा है। हम भारतीय जीवित लोगों का गुणगान करना तो जानते हैं, लेकिन किसी दिवंगत शख्सियत के बारे में गहराई और अधिकारपूर्वक लिखना नहीं जानते। वैसे हमारे अनेक राष्ट्रीय नेताओं पर किताबें उपलब्ध हैं, उनमें से कुछ ही विद्वता या साहित्य के लिहाज से खरा उतरती हैं। हालांकि महात्मा गांधी और स्वामी विवेकानंद जैसे नायकों पर ऐसी किताबें लिखी गई हैं। दूसरी ओर, ऐसे अनेक उल्लेखनीय व्यक्ति भी हैं, जिनके बारे में मान लिया गया कि उनकी अखिल भारतीय पहचान नहीं है और उनके जीवन के बारे में पर्याप्त ढंग से नहीं लिखा गया। ईएमएस नंबूदरीपाद, मास्टर तारा सिंह, वाईएस परमार, ज्योति बसु, एनटी रामाराव और शेख अब्दुल्ला, इनमें से प्रत्येक ने अपने राज्य क्रमश: केरल, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के इतिहास को आकार देने में गंभीर योगदान दिया। इसके बावजूद इन बड़ी हस्तियों में से किसी के बारे में भी शोधपरक या अच्छी तरह से लिखी गई जीवनी अब तक उपलब्ध नहीं है। यह कमी सिर्फ राजनीति या सार्वजनिक जीवन तक सीमित नहीं है। हमारा साहित्यिक और सांस्कृतिक इतिहास भी इतना ही विपन्न है। भारत में काफी समय से ऐसी सुघड़ जीवनियों के अभाव पर अफसोस होने के बाद लाल श्याम लाल शाह पर सुदीप ठाकुर की लिखी जीवनी एक सुखद अनुभव है। यह किताब कुशलतापूर्वक व्यक्ति को उसके समय के साथ जोड़ती है। धाराप्रवाह और सुगम्य गद्य में, ठाकुर आदिवासियों के इस असाधारण नायक की कहानी बताते हैं। वे एक ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें उनके गोंडवाना क्षेत्र में अच्छी तरह से जाना जाता है, मगर उनके काम और उन्होंने जो उदाहरण प्रस्तुत किए उसकी गूंज हमारी पूरी भूमि में महसूस की जा सकती है।

लाल श्याम शाह : सुदीप ठाकुर; यश पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, 1/10753, सुभाष पार्क, नवीन शाहदरा, दिल्ली; 350 रुपए।

नर-नारीश्वर

पेरूमाल मुरुगन हमारे समय और समाज की अनदेखी-अनपहचानी ट्रैजेडी के गाथाकार हैं। उन्होंने हिम्मत और हिकमत से अनेक विडंबनाओं और अंतर्विरोधों में फंसी मनुष्य की हालत का बेबाक बखान किया है। मुरुगन तमिल के माध्यम से भारतीय साहित्य में एक उजली उपस्थिति हैं।
पेरुमाल मुरुगन का यह उपन्यास एक संतान की अनुपस्तिति के इर्दगिर्द बुनी गई सुंदर और भीषण, कोमल और कठोर, ऐंद्रिक और करुण कथा है, जो एक पारंपरिक समाज की रूढ़ियों, अंधश्रद्धाओं, अभिशापों और पूर्वाग्रहों की पड़ताल भी करती है। मोहन वर्मा द्वारा किया गया यह सुंदर अनुवाद भी इस अर्थ में एक घटना है कि ऐसी मार्मिक विषय-वस्तु और उसकी ऐसी गहरी चीरफाड़ पहले हमारी भाषा में मौजूद नहीं थी। पूरे गांव में काली और पोन्ना का एक-दूसरे के लिए अगाध प्रेम किसी भी दंपति के लिए ईर्ष्या का विषय था। वे अत्यंत संतुष्ट और सुखी थे, पर एक ही अभाव था, उनकी अपनी संतान का न होना। इसके लिए वे लगातार उपहास और कटाक्ष के पात्र भी बनते थे। संतान पाने के लिए उन्होंने क्या नहीं किया- विभिन्न धर्मस्थलों की यात्रा, मन्नतें मानना, टोने-टोटके, दवा-दारू और न जाने क्या-क्या। काली और पोन्ना के परिवार वालों की भी मात्र यही कामना थी कि किसी तरह उन दोनों को संतान प्राप्त हो। अंत में वे सब पोन्ना को अर्धनारीश्वर की रथयात्रा के विशेष उत्सव में भेजने में सफल हो जाते हैं। इस उत्सव की विशिष्टता थी कि उस रात्रि संतान पाने के लिए कोई भी स्त्री अपनी स्वेच्छा से किसी भी पुरुष के साथ संभोग कर सकती थी। वह रात जहां काली और पोन्ना की एकमात्र कमी को दूर कर सकती थी, वहीं उसने उनके वैवाहिक जीवन को एक परम कसौटी पर लाकर खड़ा कर दिया था। इस तरह यह उपन्यास न सिर्फ सामाजिक कुरीतियों पर से परदा उठाता, बल्कि मानव मन की गहराइयों को भी थाहने का प्रयास करता है।

नर-नारीश्वर : पेरुमाल मुरुगन, अनुवाद : मोहन वर्मा; हार्परकॉलिंस पब्लिशर्स इंडिया, ए-75, सेक्टर-57, नोएडा; 299 रुपए।

चुनी हुई कहानियां

हरीश पाठक बिना किसी लाग-लपेट, दबाव, विचारधारा तथा पक्षधरता के, सिर्फ कहानी लिखने में विश्वास करते हैं। उनकी कहानियों में जीवन की छोटी-बड़ी, देखी-अनदेखी घटनाएं गहरा प्रभाव लेकर आती हैं। मनुष्यता और मनुष्यता से जुड़े सरोकार उनके लिए मायने रखते हैं, न कि कोई विशेष विचार या विचारधारा। उनकी कहानियां मानव जीवन और मानवीय संबंधों की नैसर्गिक प्रवृत्तियों, सूक्ष्मताओं और जटिलताओं को गहरे से उकेरती हैं। समकालीन जीवन जिन संत्रासों, महत्त्वाकांक्षाओं को पूर्ण करने की तृष्णाओं और दबावों से गुजर रहा है, उसमें कोई भी घटना या परिस्थिति न तो चौंकाती है, न विचलित करती है। हां, पढ़ने वालों को उस यथार्थ के भीतर जरूर ले जाती हैं, जिसके भागीदार हम सब कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में होते हैं।

चुनी हुई कहानियां : हरीश पाठक; अमन प्रकाशन, 104-ए/80 सी, रामबाग, कानपुर; 195 रुपए।

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