बाख़बर : किसी अभिशप्त कविता की तरह - Jansatta
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बाख़बर : किसी अभिशप्त कविता की तरह

रोहित की खुदकुशी ने सबको अचानक पकड़ लिया। कहीं अपराधबोध महसूस हुआ, कहीं पक्षधरता ने निर्ल्लज हो अपना दामन बचाया। कुछ-कुछ ऐसे प्रवक्ता भी दिखे, जो मरने वाले के साथ सचमुच की हमदर्दी तक जताने में असमर्थ थे।

Author नई दिल्ली | January 24, 2016 12:11 AM
अलायंस फॉर सोशल जस्टिस दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक छात्रों के साथ-साथ लेफ्ट संगठनों का एक गठबंधन है।

ऐसा विकट विमर्श खड़ा हुआ कि किसी के कंट्रोल में न रहा। उसका प्रबंधन करने की कोशिश में एक अंगरेजी चैनल और एक मंत्री विफल रहे। दर्दनाक विमर्श कंट्रोल में नहीं रहते और टीवी पर प्रसारित विमर्श इतने तरल और तीक्ष्ण होते हैं कि उनकी मार से कोई बच नहीं पाता। टीवी विमर्श का ही माध्यम है। रोज की रस्मी बहसों को फाड़ कर जो विमर्श सबके दिल को छू लेता है वही देर तक टिकता है। रोहित की खुदकुशी ने ऐसा ऐतिहासिक विमर्श कायम कर दिया, जो बरसों तक एक महत्त्वपूर्ण ‘संदर्भ’ बना रहेगा।

रोहित की खुदकुशी ने सबको अचानक पकड़ लिया। कहीं अपराधबोध महसूस हुआ, कहीं पक्षधरता ने निर्ल्लज हो अपना दामन बचाया। कुछ-कुछ ऐसे प्रवक्ता भी दिखे, जो मरने वाले के साथ सचमुच की हमदर्दी तक जताने में असमर्थ थे। वे रस्मी तौर पर पहले वाक्य में कुछ इस तरह अफसोस जताते जैसे मरने वाले पर अहसान कर रहे हों! रोहित ने मर कर सबको अपराधबोध से ग्रस्त कर दिया। उसके नोट ने कुछ को समाज-मनोविज्ञानी, कुछ को दार्शनिक और कुछ को अस्तित्ववादी बना दिया। कुछ प्रवक्ता उसके नोट की ओट में शिकार खेलते रहे। नेता हैदराबाद की ओर चल पड़े।

कुछ प्रवक्ता खुदकुशी तक आने वाली कहानी को तोड़-मरोड़ कर पेश करते रहे और कुछ ऐसे दलित भी रहे, जो कथा के सही तथ्यों को बार-बार सामने रखते रहे। बड़े-बड़े सत्यवादी झूठे दिखे। और विमर्श की मार से अपराधबोध जगा। डैमेज कंट्रोल की खातिर हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय को बाकी बचे छात्रों का सस्पेंशन वापस लेना पड़ा!

उच्च शिक्षा में बाहरी दबावों और उसके शिकारों की लंबी फेहरिस्त बताई जाती रही। इंडिया टुडे ने बताया कि कब-कब किस-किस ने क्यों-क्यों आत्महत्या की। इसी केंद्रीय विश्वविद्यालय में अब तक नौ छात्रों ने आत्महत्या की, लेकिन यह आत्महत्या कुछ अलग रही, क्योंकि रोहित ने मरने से ऐन पहले जो नोट लिखा वह इस कदर मार्मिक रहा कि एंकरों, समाज-मनोविज्ञानियों को उसकी व्याख्या करने के लिए देर तक शब्द नहीं मिल सके। वे जब बोले हकबकाते हुए ही बोले कि उस नोट के माने क्या हैं?

दलित चिंतक कांचा इलैया लगभग हर चैनल पर पहले दिन रोहित के नोट की दार्शनिक ऊंचाई और उसके अकथनीय दर्द की व्याख्या करते दिखे। भाजपा प्रवक्ताओं की मुसीबत थी। उनको एक ही वक्त में हमदर्दी भी दिखानी थी और अपने मंत्री और विद्यार्थी परिषद का बचाव भी करना था, क्योंकि लगभग हर टिप्पणीकार और एंकर उनकी ओर अंगुली उठा रहा था। इस चक्कर में उनकी जताई हमदर्दियां भी कारगर न हुर्इं। वे रोहित के नोट में ‘किसी को नामजद न किए जाने’ पर बार-बार जोर देते दिखे। ऐसा पोच तर्क जितनी बार दिया जाता दिखा उतनी ही बार पोला नजर आता दिखा।

उसका सुसाइड नोट एक अभिशप्त कविता की तरह लिखा गया था, जिसे कुछ सपाट लोग सपाट गद्य की तरह पढ़ रहे थे! उसकी तीन लाइनें देर तक कसकती रहीं: ‘(यह) जिंदगी अपने आप में अभिशाप है… मेरा जन्म एक घातक दुर्घटना है… और मैं एकदम रीत गया था…।

ऐसे दर्दनाक और तीखे विमर्श टीवी पर किसी को मुंह छिपाने की जगह तक नहंीं छोड़ते। रोहित के सहपाठी दलित छात्र प्रशांत हर चैनल पर आकर रोहित का पक्ष मजबूती से रखते रहे और सप्रमाण दूसरे झूठों को पकड़ते रहे। रोहित का गरीब होना, मेधावी होना, आंदोलनकारी होना, पहली जांच में आंदोलनकारियों का बेकसूर पाया जाना और फिर मंत्रीजी के शिकायती पत्र पर पांच-पांच रिमाइंडर्स का भेजा जाना और फिर दूसरी जांच समिति का बैठना, उसके द्वारा रोहित समेत कुछ छात्रों को दोषी ठहराना, उनको हॉस्टल से निकाला जाना, उनका पंद्रह दिन से सड़क पर जीना और रोहित का खुदकुशी करना एक क्रमिक कथा की तरह चार दिन प्रमुख समय की चर्चाओं में आता रहा। सारी हमदर्दी आत्महत्या के पक्ष में इकट्ठी होती रही।

इसके बरक्स भाजपा के प्रवक्ताओं ने जब-जब रेखांकित किया कि खुदकुशी के नोट में ‘किसी का नाम नहीं लिया गया’, परिषद के छात्र नेता की आंबेडकर छात्र एसोसिएशन के छात्रों द्वारा पिटाई की गई, उसे इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती होना हुआ और ‘दूसरी जांच में दलित शामिल थे’, इन तीनों में से बाद के दो तर्कों की जो पिटाई हुई वह देखते बनती थी। दलित बताते थे कि अस्पताल जाने का असल कारण परिषद के नेता की पिटाई नहीं, उसके अपेंडिसाइटिस का दर्द था, कि उक्त जांच समिति का इनचार्ज दलित नहीं था, बल्कि एक श्रीवास्तवजी थे! इन झूठोें के बाद कुछ भी नहीं बचता दिखा और टीवी की इन अदालतों के आगे विश्वविद्यालय प्रशासन भी मजबूर दिखाई दिया।

रोहित के दलित विमर्श के ‘रेडिकल राजनीतिक’ होने, याकूब मेमन को फांसी दिए जाने का विरोध करने की उसकी राजनीति को भाजपा के प्रवक्ताओं द्वारा ‘एंटीनेशनल’ कहे जाने पर पत्रकार अजय बोस ने एनडीटीवी पर जो जवाब दिया, वह भाजपा के लिए काबिलेगौर था। अजय ने कहा कि भाजपा का आंबेडकर को लेकर शुरू किया गया नया महिमागान सिर्फ टोकनिज्म है। दलित राजनीति रेडिकल ही हो सकती है। अगर रोहित रेडिकल राजनीति में शामिल हुआ तो यह उसका अपराध नहीं था और याकूब मेमन को फांसी देने के विरोध में तो बहुत से लेखकों ने लिखा और कि दलितों को जो झेलना पड़ता है वह खुद उनको रेडिकल विमर्शों की ओर ले जाता है। इसे घृणास्पद और अपराध समझने की जगह उसके कारणों को समझना चाहिए!

लगातार पांच दिन चला दलित रोहित विमर्श इस कदर मार्मिक रहा कि इस चक्कर में न ‘अमेजिंग इंडिया’ वाला टाइम्स नाउ का कार्यक्रम फोकस में रह पाया, न एनडीटीवी का अमिताभ बच्चन को पूरे बारह घंटे स्टूडियो में बिठा कर क्लीनाथोन वाला स्वच्छ भारत अभियान फोकस में आ पाया और न केजरीवाल पर फेंकी गई स्याही और उनकी सुरक्षा का मुद्दा ही फोकस में रह पाया।

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