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मुद्दाः आरक्षण का जिन्न

इस अनदेखी की वजह से सरकारी सेवाओं या शैक्षणिक संस्थाओं में एससी/एसटी वर्ग की कुछ ही जातियों का वर्चस्व नजर आता है। राजनीतिक रूप से प्रभावशाली ये जातियां स्वार्थ समूह और दबाव समूह की तरह कार्य करते हुए किसी भी परिवर्तन का विरोध करती हैं।

Author September 16, 2018 3:39 AM
आरक्षण का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर है। पिछले कुछ समय से अनुसूचित जाति/जनजाति आरक्षण की मौजूदा स्थिति से असंतुष्ट इस समुदाय की तरफ से इस पर पुनर्विचार की मांग उठ रही है।

निरंजन कुमार

आरक्षण का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर है। पिछले कुछ समय से अनुसूचित जाति/जनजाति आरक्षण की मौजूदा स्थिति से असंतुष्ट इस समुदाय की तरफ से इस पर पुनर्विचार की मांग उठ रही है। इस संदर्भ में पिछले साल से सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई शुरू की, जिसमें सरकारी सेवाओं और शैक्षणिक संस्थानों में एससी/एसटी के लिए आरक्षण-कोटा में क्रीमी लेयर की अवधारणा को लागू करने मांग की गई है। एससी/एसटी में भी अत्यंत निम्न स्तर पर अवस्थित समुदायों के एक संगठन की इस याचिका में कहा गया है कि एससी/एसटी को मिलने वाले आरक्षण का फायदा निचले स्तर तक नहीं पहुंच पा रहा है। पंचानबे फीसद लोग अभी तक आरक्षण का लाभ ले ही नहीं सके हैं। एक खास वर्ग ही आरक्षण का फायदा उठा रहा है। इसमें यहां तक कहा गया है कि ये पांच फीसद लोग ‘नव-शोषक’ हैं, जो शेष लोगों का हक मार रहे हैं। कमजोर तबके हमेशा कमजोर ही बने रहते हैं। यह भी दलील दी गई है कि इस स्थिति ने शाश्वत गरीबी, सामाजिक अशांति और नक्सली आंदोलनों को बढ़ावा दिया है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि आज भारत में कोई भी जातीय समुदाय समान रूप से पिछड़ा नहीं है, यानी एक ही जाति के अंदर कुछ लोग पिछड़े हैं तो कुछ अन्य सशक्त हैं। उनकी मांग है कि एससी/एसटी में केवल कमजोर लोगों को आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए। अपने तर्क में वे केंद्र सरकार की लोकुर समिति की रिपोर्ट (1965) का भी हवाला देते हैं, जिसमें एससी/एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर की अवधारणा को शामिल करने की अनुशंसा है। इस संदर्भ में केंद्र सरकार की उषा मेहरा आयोग रिपोर्ट की भी अनुशंसाएं हैं।

एससी/एसटी आरक्षण में ‘मलाईदार परत’ की अवधारणा का विरोध मुख्यत: दो स्तरों पर होता रहा है- सरकार द्वारा और एससी/एसटी के प्रभावशाली तबकों द्वारा। वर्तमान मामले में ही न्यायमूर्ति जोसेफ की टिप्पणी के विरोध में केंद्र सरकार का तर्क था कि ‘‘एक बार पिछड़े के रूप में चिह्नित कर लिए जाने के बाद उन्हें लाभों से इसलिए नहीं वंचित किया जा सकता कि उन्होंने उस सीमा को पार कर लिया है। इस पर कोई पुनर्विचार नहीं किया जा सकता।… ’’ सरकार का अन्य तर्क है कि मंडल आयोग की सिफारिशों में अदालत ने सिर्फ ओबीसी आरक्षण में क्रीमी लेयर को बाहर किया था, इसलिए सरकार एससी/एसटी के संदर्भ में कुछ नहीं करेगी।

दरअसल, सरकार का तर्क राजनीतिक है। कोई भी सरकार ऐसा कुछ करना नहीं चाहती, जो दलित समुदायों, विशेष रूप से उनके प्रभावशाली तबकों को नाराज कर दे, क्योंकि चुनाव की दृष्टि से यह घाटे का सौदा हो सकता है। अदालत ने भी इस जिम्मेदारी से पहले मुंह मोड़ लिया था। कहा था कि यह मुद्दा संसद के कार्यक्षेत्र में आता है। जबकि ओबीसी आरक्षण में क्रीमी लेयर जैसी प्रगतिशील तथा यथोचित अवधारणा को विकसित और प्रयुक्त करने का महत्त्वपूर्ण एवं न्यायसंगत कार्य हमारी सुप्रीम कोर्ट ने ही किया था।

एससी/एसटी में प्रभावशाली हो चुके हिस्से अपने निहित स्वार्थों की वजह से क्रीमी लेयर का विरोध करते हैं, ताकि पूरे समुदाय को उपलब्ध सकारात्मक लाभों पर वे ही एकाधिकार जमाए रखें। विडंबना यह है कि इसे वे संपूर्ण एससी/एसटी समुदाय के हितों पर हमले के रूप में प्रचारित करते हैं। गौरतलब है कि यह तबका ऐसी जगहों पर काबिज है कि मीडिया और नीति निर्माताओं को प्रभावित कर ले जाता है। बुनियादी रूप से एससी/एसटी आरक्षण समस्या के दो आयाम हैं। पहला, वैयक्तिक स्तर पर; यानी एक बार आरक्षण पाकर उच्च पदों पर आसीन लोगों के बच्चों का फिर आरक्षण का लाभ लेना, और फिर उनकी अगली पीढ़ी द्वारा भी फायदा लेना।

इस तरह अपने ही एससी/एसटी समुदाय के कमजोर तबकों के बच्चों को आगे नहीं आने देना। दरअसल, आरक्षण की बुनियाद है सामाजिक न्याय की अवधारणा, यानी समाज के उन कमजोर तबकों को देश के संसाधनों, शासन और पद-प्रतिष्ठा में एक भागीदारी देना, जो सदियों से इनसे वंचित रहे हों। तब आरक्षण का लाभ एससी/एसटी वर्ग के कुछ ही लोगों तक सीमित रह जाना सामाजिक न्याय की धारणा के विरुद्ध है। तब यह आवश्यक हो जाता है कि एससी/एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर अवधारणा को लागू जाए।
समस्या का दूसरा पहलू सामूहिक है, जिस पर लोगों का ध्यान अभी नहीं गया है।

संविधान में एससी/एसटी को आरक्षण देते समय यह मान लिया गया था कि इन वर्गों में शामिल सभी जातियां/जनजातियां सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, भौगोलिक और अन्य पैमानों पर वंचना के समान धरातल पर अवस्थित हैं, और उनके उत्थान के लिए एक साथ ही आरक्षण तय कर दिया गया। अनजाने या जानबूझ कर यह अनदेखी कर दी गई कि इन समुदायों में शामिल विभिन्न जातियां/जनजातियां विकास और अन्य पैमानों पर अलग-अलग पायदान पर खड़ी हैं। मसलन, एक तरफ ऐसी घुमक्कड़ जनजातियां हैं, जो अब भी जंगल में बेघर नंगे बदन रह कर शिकार आदि करके जीवन यापन करती हैं, तो दूसरी तरफ ऐसी जनजातियां हैं, जो अपेक्षाकृत संपन्न भूस्वामी और मुख्यधारा से जुड़ी हुई हैं। उसी तरह एससी में ऐसी भी जाति है, जो जिंदा रहने के लिए चूहा तक खाने को मजबूर है। दूसरी ओर ऐसी भी जातियां हैं जो व्यवसाय/ उद्यम तक में पैठ बना चुकी हैं।

इसलिए एससी/एसटी आरक्षण की मौजूदा स्थिति न केवल अतार्किक और अनैतिक, बल्कि संविधान की भावनाओं के प्रतिकूल भी है। यह संविधान के अनुच्छेद 14 द्वारा प्रदत्त मूलभूत अधिकार विधि के समक्ष समता और विधियों के समान संरक्षण का भी उल्लंघन है। सेंट स्टीफेंस बनाम दिल्ली यूनिवर्सिटी मामले (1992) में सुप्रीम कोर्ट ने इस अनुच्छेद की व्याख्या करते हुए स्पष्ट कहा है- ‘‘विभिन्न वर्गों के लोगों की भिन्न-भिन्न जरूरतों के अनुसार पृथक-पृथक उपचारों की जरूरत होती है… जो समान नहीं हैं उनके साथ समानता का व्यवहार करना उचित नहीं है। आवश्यक यह है कि उनके साथ उनकी असमान स्थिति को ध्यान में रख कर ही आचरण किया जाए।’’

लेकिन इस अनदेखी की वजह से सरकारी सेवाओं या शैक्षणिक संस्थाओं में एससी/एसटी वर्ग की कुछ ही जातियों का वर्चस्व नजर आता है। राजनीतिक रूप से प्रभावशाली ये जातियां स्वार्थ समूह और दबाव समूह की तरह कार्य करते हुए किसी भी परिवर्तन का विरोध करती हैं। यहीं एससी/एसटी आरक्षण में उपवर्ग की जरूरत सामने आती है। ओबीसी जातियों के आरक्षण में उपवर्ग की संभावना के लिए केंद्र सरकार ने एक आयोग गठित कर रखा है। एससी/एसटी में भी सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक और भौगोलिक स्थिति आदि के आधार पर आरक्षण सीमा में कुछ उपवर्ग बनाए जाने चाहिए।

लेकिन किसी भी आशंका को दूर करने के लिए एससी/एसटी आरक्षण में सुरक्षाबंदी भी जरूरी है। मसलन, यह स्पष्ट उल्लिखित हो कि ये कोटा केवल इन श्रेणी के लोगों द्वारा ही भरे जाएंगे, और कभी भी सामान्य श्रेणी को स्थानांतरित नहीं किए जाएंगे। दूसरे, ओबीसी की तुलना में क्रीमी लेयर को कम से कम दस साल तक संशोधित तरीके से लागू किया जा सकता है; उदाहरण के लिए, अगर पद/ सीट नहीं भरते हैं, तो पचास प्रतिशत रिक्त सीटों को तीन साल बाद क्रीमी लेयर से भरा जा सकता है, तीसरे, गैर-क्रीमी लेयर एससी/एसटी के लिए अतिरिक्त ‘प्रो-एक्टिव’ प्रावधान किए जाएं।

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