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शिक्षाः अनुसंधान और आर्थिकी

ऐसे शोध कार्यों का क्या औचित्य, जो मानव उत्थान और आर्थिक विकास में सहायक न हों। इससे केवल समय, जनशक्ति और धन की बर्बादी होती है। अनुसंधान ऐसा हो, जो आर्थिकी को मजबूती दे, साथ ही बहुआयामी और जनोपयोगी हो।

NEW EDUCATON POLICY 2020देश में गुणवत्तापूर्ण शोध और अनुसंधान नहीं होने से बड़ी मात्रा में बौद्धिक ऊर्जा अनावश्यक जानकारी एकत्र करने में नष्ट हो रही है।

दर्शिनी प्रिय

किसी भी राष्ट्र की आधारशिला शिक्षा पर टिकी होती है। यही उसके सर्वांगीण विकास के मूल में है। गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा हर विकसित राष्ट्र की परिकल्पना होती है और इसे हासिल किए बगैर न तो वह सार्वभौमिक रूप से विकास के मानदंडों पर खरा उतर सकता है, न ही वैश्विक शक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। मगर विडंबना है कि विकास की धुरी मानी जाने वाली शिक्षा आज देश में सबसे अधिक उपेक्षित है। एक विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में अग्रसर भारत आज अपने यहां उच्च शैक्षणिक संस्थानों और प्राध्यापकों की भारी कमी झेल रहा है। नए शोध और अनुसंधान लगभग बंद हैं। ऐसे में शोध का लगातार गिरता स्तर सोचने पर बाध्य करता है।

यह किसी से छिपा नहीं है कि हमारे ज्यादातर विश्वविद्ययालयों में पुराने और घिसे-पीटे विषयों पर शोधकार्य कराया जाता है, जिसमें न तो शोधार्थी की कोई विशेष रुचि होती है और न ही शिक्षकों का नमोन्वेष आधारित कोई गंभीर योगदान। रटे-रटाए विषयों पर शोध से कुछ नए निष्कर्षों की उम्मीद बेमानी है। ऐसा लगता है जैसे अभिनव विषयों का शोध के क्षेत्र में नितांत आभाव हो। पारंपरिक शोध विषयों पर शोध का यह सिलसिला पीढ़ी-दर-पीढ़ी जारी है।

इसी नीरसता से बचने और नएपन की तलाश में छात्र दुनिया के अन्य विश्वविद्यालयों की ओर रुख कर रहे हैं। आल इंडिया सर्वे आफ हायर एजुकेशन के आकड़ों के अनुसार देश में अभी नौ सौ केंद्रीय विश्वविद्यालय, सौ राष्ट्रीय महत्त्व के संस्थान, तैंतीस डीम्ड यूनिवर्सिटी, तीन सौ इक्यावन राज्य विश्वविद्यालय और तीन सौ चालीस निजी विश्वविद्यालयों का भारी-भरकम तंत्र मौजूद है। इतना ही नहीं, वर्तमान में कुल चालीस हजार कॉलेज देश के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति बनाए हुए हैं। उच्च शिक्षण संस्थानों में फैकल्टी, शोध कार्यों की नवीनता का अभाव और आधारभूत आवश्यक सुविधाओं की कमी के चलते हाल के वर्षों में आस्ट्रेलिया, अमेरिका, कनाडा, न्यूजीलैंड, ब्रिटेन सरीखे देशों में भारतीय छात्रों का पलायन तेजी से हुआ है। एसोचैम के मुताबिक देश की लगभग पंद्रह अरब मुद्रा हर साल विभिन्न माध्यमों से विदेशी खातों में जा रही है। इतने बड़े स्तर पर पलायन भारतीय शैक्षिक संस्थानों की शोध क्षमता और गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

विश्व की सबसे बड़ी शैक्षिक आधारभूत अवसंरचना वाले देश में अस्सी प्रतिशत से अधिक शोध निष्फल हो रहे हैं। दुनिया की सबसे ज्यादा युवा आबादी वाले देश में प्रतिभाएं गुणवत्तापूर्ण शोध निष्कर्ष दे पाने में असमर्थ हैं, यह आश्यर्य का विषय है। शिक्षा के उच्च संस्थानों की जर्जरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यहां के सत्तर प्रतिशत से ज्यादा कॉलेज गुणवतता के मानकों पर खरे नहीं उतरते। यहां शोध के नाम पर महज खानापूर्ति के लिए अनाप-शनाप विषयों पर शोध कराए जाते हैं।

एक तरफ शोधार्थी शोध के नाम पर बड़ी छात्रवृत्ति प्राप्त कर रहे हैं, दूसरी ओर शोधनिर्देशक निमित्त कार्यों की अनदेखी कर व्यक्तिगत कार्यों के लिए शोधार्थियों का इस्तेमाल कर रहे हैं। सालों तक शोधकार्य सिर्फ इसलिए खींचे जाते हैं ताकि छात्रवृत्ति और छात्रावास की दौड़ में शामिल रहा जा सके। सिर्फ उच्च शिक्षण संस्थानों की नहीं, बल्कि व्यावसायिक शिक्षण संस्थानों में भी कमोबेश यही स्थिति है। छात्र शोध के दौरान शोध पर ध्यान न देकर अन्य कार्यों में व्यस्त रहते हैं या फिर अकारण समय व्यतीत करते हैं।

सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा हमारे आईटी पेशेवरों में रोजगार की योग्यता संबंधी कमी और आईएमडी बिजनेस स्कूल स्विट्जरलैंड द्वारा प्रकाशित ग्लोबल टैलेंट रैंकिग 2018 की रिपोर्ट से चिंताजनक संकेत मिले हैं। आईएमडी बिजनेस स्कूल की रिपोर्ट में भारत तिरसठ देशों की सूची में पिछले वर्ष के मुकाबले इक्यावनवें से फिसल कर दो पायदान नीचे तिरपनवें स्थान पर पहुंच गया है। परेशानी की बात यह है कि शैक्षणिक प्रणाली की गुणवत्ता और विकास के मामले में भारत इस सूची में काफी पीछे है। केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट इस बात की तस्दीक करती है कि भारत में इक्यानबे फीसद आईटी पेशेवर नौकरी संबंधी योग्यता के मापदंड पर खरे नहीं उतरते।

शोध निष्कर्षों का सीधा प्रभाव नवाचार और उन्नयन से है। ऐसे शोध कार्यों का क्या औचित्य, जो मानव उत्थान और आर्थिक विकास में सहायक न हों। इससे केवल समय, जनशक्ति और धन की बर्बादी होती है। दरअसल, अनुसंधान ऐसा हो जो आर्थिकी को मजबूती दे, साथ ही बहुआयामी और जनोपयोगी हो। श्रेष्ठ विश्वविद्ययालयों में शोध की ऐसी हालत है, तो अन्य विश्वविद्यालयों की हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है।

पिछले चार सालों में सात आईआईटी, सात आईआईएम, चौदह एम्स बनाने की घोषणा हो चुकी। इनमें से ज्यादातर संस्थान अभी तक शुरू नहीं हुए हैं। जो शुरू भी हो गए हैं उनमें फैकल्टी की भारी कमी है। यद्यपि आईआईटी जैसे उच्च संस्थानों के लिए साठ प्रतिशत और आईआईएम के लिए चार गुना बजट वृद्धि की गई है। इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस, इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस एंड एजुकेशन एंड रिसर्च को पिछले कुछ सालों में सबसे ज्यादा सरकारी सहायता निधि का आबंटन हुआ है, लेकिन भारी-भरकम बजट अनुदान प्राप्त करने वाले ये संस्थान सफेद हाथी साबित हो रहे हैं।

भले ही उच्च शिक्षा की वर्तमान स्थिति के क्रमिक विकास हेतु सरकार ने कई सकारात्मक पहल मसलन- शिक्षा बजट में दस फीसद की वृद्धि, शैक्षिक आधारभूत ढांचा विकास के लिए एक लाख करोड़ रुपए की राशि का आबंटन और प्रधानमंत्री शोध फेलोशिप योजना की शुरुआत की गई हो, पर सफल क्रियान्वयन और उचित निगरानी प्रक्रिया के आभाव के चलते हालात जस के तस हैं।

परंपरागत मानविकी विषयों से इतर भारत को उन सभी तकनीकी क्षेत्रों में शोध के जरिए बढ़त लेने का प्रयास करना चाहिए, जो वर्तमान में तेजी से विकसित हो रहे हैं, जैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता, 3-डी तकनीक, तकनीकी शिक्षा में बड़े डेटा का एनालिसिस और मशीनों से सीखना, जीनोमिक स्टडीज, बायो-टेक्नोलॉजी, नैनो टेक्नोलॉजी, न्यूरोसाइंस और विज्ञान के ऐसे ही कई क्षेत्र। ऐसे नवीन और अलहदा किस्म के शोधों से नए निष्कर्षों के सामने आने की पूरी संभावना है, जो लोकहित में अपनी प्रभावोत्पादकता बनाए रख सकती है। इससे उच्च शिक्षण संस्थानों में शोध विषयों की नीरसता से बचा जा सकेगा। इसके लिए कार्यरत और सेवा निवृत्त वैज्ञानिकों, प्राध्यापकों और अभियंताओं को इन तकनीकी विश्वविद्यालयों में अध्यापन के लिए नियुक्त कर इस दिशा में एक कदम आगे बढ़ाया जा सकेगा।

एक अच्छी शिक्षा व्यवस्था नए भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य को साकार करने के लिए जरूरी है। दुनिया भर में देखें तो भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों को शुरू करने की सबसे कठिन शर्तें हैं, हालांकि यह काफी हद तक संसाधन और निवेश जुटाने, भूमि मानदंड एवं अन्य शर्तों से संबंधित है। समुचित वातावरण, उन्नत संसाधन तथा योग्य प्राध्यापकों की उपस्थिति में ही छात्रों का चहुंमुखी विकास संभव है।

अधिकांश विश्वविद्यालयों में शोध की नवीनता और विभिन्न अनुशासनों में पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी-समीक्षा शोध निधियों का घोर आभाव है, जिससे छात्र सहित शोध की गुणवत्ता पर काफी फर्क पड़ रहा है। संबंधित ऐजेसियों को इस पर ध्यान देना होगा। भारत अगर उच्च शिक्षण शोध के क्षेत्र में अपना दबदबा कायम करना चाहता है, तो उसे शोध शिक्षण संस्थानों का कायापलट करना ही होगा। साथ ही बहुप्रतिष्ठित और मानक संस्थानों को पुनर्जीवित कर उन्हें नए तेवर के साथ प्रतिष्ठापित करना होगा।

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