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चर्चा: राहत की उम्मीद में छोटे उद्योग

भारत जैसे विशाल देश में लोगों की आय बढ़ा कर ही उनकी जेबों में पैसा पहुंचाया जा सकता है। ऐसे में रोजगार पैदा करने वाले सभी क्षेत्रों की ओर देखा जाना चाहिए, खासतौर पर तब तो और भी ज्यादा जब बड़े उद्योगों को लगातार मोटे राहत पैकेज देकर देखा जा चुका हो।

Author Published on: March 15, 2020 12:51 AM
लघु उद्योग में काम करते कर्मचारी (इंडियन एक्सप्रेस फोटो)

सुविज्ञा जैन

मौजूदा वित्त वर्ष (2019-20) की तीसरी तिमाही के जीडीपी आंकड़े आ चुके हैं। दूसरी तिमाही की तुलना में नाम मात्र का सुधार हुआ है। दावा किया गया था कि अर्थव्यवस्था सुधारने की हर मुमकिन कोशिश हो रही है। लेकिन सब कुछ करने के बाद भी वृद्धि दर 4.5 से बढ़ कर सिर्फ 4.7 फीसद ही हो पाई। यह राहत की बात नहीं है, बल्कि ज्यादा हैरान करने वाली बात समझी जानी चाहिए। अतिआशावादी लोग कह सकते हैं कि सिर्फ एक तिमाही की ही तो बात है। लेकिन ये चिंता की बात इसलिए है क्योंकि अर्थव्यवस्था संभालने की तमाम कोशिशें करके देखी जा चुकी हैं और अभी चौथी तिमाही में भी हालात कोई खास सुधरते नजर नहीं आ रहे हैं। बजट के पूरे एक महीने बाद भी बाजारों में कोई बड़ी हलचल नहीं दिखी है, बल्कि शेयर बाजार गिरता जा रहा है।

अर्थशास्त्रियों और जानकारों ने आर्थिक सुस्ती का बड़ा कारण यह बताया कि लोगों की जेब में पैसा घट गया। इससे देश की घरेलू खपत कम हो गई। बेशक ऐसा ही समझते हुए पिछले छह महीनों में अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के ताबड़तोड़ सरकारी एलान किए गए। कई क्षेत्रों में राहत पैकेज दिए गए। अर्थव्यवस्था में तरलता बढ़ाने की कोशिश की गई। इस साल के बजट का मुख्य मकसद भी लड़खड़ाते बाजारों को संभालना बताया गया था। लेकिन अब किसी को भी यह मान लेने में अड़चन नहीं होनी चाहिए कि अभी तक के सभी उपाय नाकाफी साबित हुए हैं। सरकार और नीतिकारों के सामने चुनौती जस की तस है।

एक बार फिर दोहराने की जरूरत है कि खपत बढ़ाने के लिए लोगों की जेब में पैसा पहुंचाना सबसे जरूरी बताया गया था। काफी कुछ करने का दावा भी किया गया। लेकिन लोगों की जेब तक पैसा पहुंचाने के लिए कर्ज, कारपोरेट करों में छूट और किसानों के लिए विशेष खैराती उपाय कारगर नहीं रहे। इसीलिए यह सवाल पैदा हुआ है कि भारत जैसे बड़े बाजार को उठाने के लिए क्या ये तरीके काफी हैं? एक उपाय नए रोजगार के मौके पैदा करने का हो सकता था। बेरोजगार उपभोक्ताओं को आय के नए साधन मुहैया कराने की जरूरत थी। भारत जैसे विशाल देश में लोगों की आय बढ़ा कर ही उनकी जेबों में पैसा पहुंचाया जा सकता है। ऐसे में रोजगार पैदा करने वाले सभी क्षेत्रों की ओर देखा जाना चाहिए, खासतौर पर तब तो और भी ज्यादा जब बड़े उद्योगों को लगातार मोटे राहत पैकेज देकर देखा जा चुका हो। इसलिए सवाल यह बनता है कि देश का एमएसएमई क्षेत्र यानी सूक्ष्म, लघु और मझौले उद्योग क्या कोई बड़ी भूमिका निभा सकते हैं?

सबसे पहले एमएसएमई क्षेत्र के आकार पर गौर करने की जरूरत है। इस क्षेत्र की पहुंच देश के बहुत बड़े तबके तक है। इसमें लगभग बारह करोड़ लोग लगे हैं। इन करोड़ों परिवारों का गुजर-बसर इन छोटे व्यवसायों से ही होता है। एमएसएमई वह क्षेत्र है जो कम लागत में ज्यादा रोजगार के मौके पैदा करता है। इस क्षेत्र में लगी इकाइयां छोटे-बड़े शहरों, कस्बों से लेकर गांवों तक में मौजूद हैं। जाहिर है, अगर अर्थव्यवस्था में तरलता बढ़ाना है तो बड़े उद्योगों को राहत देने से ज्यादा कारगर इन छोटे उद्यमों पर ध्यान देना हो सकता है। इससे समान वितरण और वित्तीय समावेशन दोनों लक्ष्य सधते हैं।

देश में छह करोड़ से ज्यादा एमएसएमई इकाइयां हैं। हालांकि इनमें से पंजीकृत इकाइयां एक चैथाई भी नहीं हैं। इन इकाइयों में सेवा और विनिर्माण दोनों क्षेत्र शामिल हैं। अलबत्ता इन दोनों क्षेत्रों में लगी इकाइयों के आकार में फर्क है। मसलन विनिर्माण क्षेत्र की जिन इकाइयों की मशीनों और प्लांट की लागत पच्चीस लाख या उससे कम है, उन्हें सूक्ष्म उद्योग की श्रेणी में गिना जाता है। जिन इकाइयों की लागत पच्चीस लाख से पांच करोड़ रुपए के बीच है, वे लघु उद्योग कहलाते हैं। पांच से दस करोड़ रुपए के बीच की लागत वाले उद्यमों को सरकार मध्यम उद्योग मानती है। इसी तरह सेवा क्षेत्र में जिन इकाइयों में उपकरणों की कुल लागत दस लाख या उससे कम है, वे सूक्ष्म उद्यमों में गिने जाते हैं। दस लाख से दो करोड़ लागत वाले लघु सेवा उद्यम हैं और दो करोड़ से पांच करोड़ लागत वालों को मझौले सेवा उद्यम कहा जाता है। गौर करने की बात है कि बड़े उद्योगों के मुकाबले एमएसएमई क्षेत्र के उद्यमों की लागत बहुत ही कम है। सरकार चाहे तो जिस तरह कॉरपोरेट क्षेत्र को लाखों-करोड़ के पैकेज दिए गए, उसी तरह एमएसएमई क्षेत्र पर भी दांव लगा सकती है।

एक सवाल छोटे उद्योगों की क्षमता का भी उठाया जाता है। इसका जवाब यह बनता है कि देश में एमएसएमई क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद में करीब तीस फीसद का योगदान दे रहा है। कुल निर्यात में एमएसएमई की हिस्सेदारी देखें तो इस क्षेत्र का हिस्सा करीब आधा यानी पचास फीसद है। सरकार की तरफ से कई बार जीडीपी में इस क्षेत्र का हिस्सा बढ़ाने की बात कही जा चुकी है। सरकार यह भी कहती रही है कि निर्यात में एमएसएमई क्षेत्र कहीं ज्यादा योगदान दे सकता है। लेकिन इन सभी लक्ष्यों को पाने की कोई व्यवस्थित रूपरेखा अभी तक नजर नहीं आई है। हालांकि इस साल के बजट में एमएसएमई क्षेत्र को 7572 करोड़ दिए गए और इसका प्रचार इस तरह किया गया कि यह इस क्षेत्र को यह अब तक का सबसे बड़ा आवंटन है। लेकिन यहां यह भी देखना पड़ेगा कि हर साल बजट का आकर बढ़ता ही है। इसलिए बजट में किसी मद में दी गई रकम का आकलन समस्या के आकार की जरूरत के हिसाब से किया जाना चाहिए।

ऐसे समय में जब रोजगार सृजन और प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने को प्राथमिकता पर लाने की दरकार है, तब इस क्षेत्र के लिए बड़े बजट प्रावधान की गुंजाइश निकाली जा सकती थी। हालांकि गैर कृषि क्षेत्र में स्वरोजगार सृजन की संभावनाएं बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के तहत ढाई हजार करोड़ रुपए का प्रावधान जरूर किया गया है। इसके तहत पारंपरिक शिल्पकारों, कारीगरों और बेरोजगार युवाओं के लिए सूक्ष्म उद्योग लगाने में मदद दी जाएगी। बेशक इस रकम से दस से बारह हजार नई सूक्ष्म इकाइयां शुरू कराने में मदद दी जा सकती है, लेकिन हर साल दो करोड़ की रफ्तार से बढ़ती बेरोजगारी के बरक्स यह रकम मामूली है।

छोटे उद्यमों पर गौर करने की वकालत में एक तर्क और रखा जा सकता है। तथ्य यह है कि इस क्षेत्र की आधे से ज्यादा इकाइयां गांव-कस्बों में ही चल रही हैं। कुछ महीने पहले खबर आई थी कि देश में रोजमर्रा के सामान की खपत सबसे ज्यादा ग्रामीण इलाकों में घट रही है। इससे एफएमसीजी क्षेत्र यानी त्वरित उपभोग के सामान के उत्पादन में गिरावट आ रही है। इसी के मद्देनजर कृषि और दूसरे ग्रामीण रोजगारों को मजबूत करने के सुझाव दिए जा रहे थे। सुझाव तकर्पूर्ण था, लेकिन यह सुझाव भारी संसाधन खर्च करने वाला था। भारतीय कृषि की समस्या इतनी बड़ी है कि वहां ताबड़तोड़ कोई बड़ी मदद पहुंचाना सरकार के बूते से बाहर का काम है। जबकि छोटे और मझोले व्यवसायों के लिए ग्रामीण भारत में अभी भी गुंजाइश बाकी है।

सभी जानते हैं कि एक एमएसएमई उद्यम शुरू करने के लिए जमीन, मानव संसाधन, कच्चा माल जैसी सभी चीजें ग्रामीण इलाकों में पहले से मौजूद हैं। बस जरूरत है तकनीक और थोड़ा प्रबंधकीय कौशल वहां तक पहुंचाने की। इन व्यवसायों को बढ़ावा मिलने से कृषि का विकल्प ढूंढ़ते ग्रामीण युवाओं के लिए भी नए रोजगार के मौके पैदा किए जा सकते हैं। योजनाकार पूरी दुनिया पर नजर डालेंगे तो उन्हें पता चलेगा कि कई विकसित और विकासशील देशों ने आर्थिक संकट के दौरान औद्योगीकरण को ग्रामीण इलाकों तक पहुंचाने के लिए सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों को बढ़ावा देने का ही विकल्प अपनाया और वे कामयाब रहे। हम ऐसा क्यों नहीं कर सकते?

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