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मुद्दा: सीखने-सिखाने की हकीकत

पढ़ना सीखने का मामला पढ़ने के अभ्यास से जुड़ा है। पढ़ना कोई यांत्रिक प्रक्रिया नहीं है। हमारे यहां जिस तरह पढ़ने पर शिक्षक द्वारा काम किया जाता है वह पाठ्यपुस्तक ही आधार बनती है। जबकि पाठ्यपुस्तक पढ़ना सिखाने में योगदान कम ही कर पाती है। दरअसल, पाठ्यपुस्तक का जोर प्रश्नों के हल करने आदि पर अधिक होता है।

Author Published on: January 20, 2019 3:58 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

कालूराम शर्मा

असर यानी एन्युअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट स्कूली शिक्षा से जुड़े और इसमें दिलचस्पी रखने वाले या कहें कि चिंता करने वालों के लिए एक झटका कही जा सकती है। रिपोर्ट बताती है कि भारत जैसे देश में प्रारंभिक कक्षाओं के बच्चे पढ़ना और बुनियादी गणित भी नहीं सीख पा रहे हैं। यह असर की तेरहवीं रिपोर्ट है, जो स्कूलों में सीखने-सिखाने की स्थिति बयान करती है। पढ़ना शिक्षित होने की पहली सीढ़ी कही जा सकती है। अगर बच्चे ‘पढ़’ नहीं पाते तो शिक्षा पाने का आगे का रास्ता समस्याओं से लदा होगा। इसी प्रकार गणित में मूलभूत संक्रियाओं की समझ जीवन के लिए भी अपरिहार्य है। यों शिक्षा के उद्देश्य व्यापक हैं, जिनमें शामिल है संवैधानिक मूल्यों को भारतीय समाज में पोषित करना। बच्चे न केवल साक्षर बनें, बल्कि उनमें संवैधानिक मूल्यों को पोषित करने में स्कूल अहम भूमिका अदा करें। लिहाजा, असर ने अपने अध्ययन में भाषा और गणित के बुनियादी मसलों पर अध्ययन किया है। इसमें कक्षा तीसरी, पांचवीं और आठवीं स्तर के लगभग साढ़े पांच लाख बच्चों का देशव्यापी अध्ययन किया गया, जिसमें तीन से सोलह बरस के बच्चों के नामांकन और पांच से सोलह बरस के बच्चों में पढ़ने और अंकगणीतीय क्षमताओं को जांचा गया। यह अध्ययन देश के ग्रामीण क्षेत्रों से ताल्लुक रखता है। अध्ययन में दूसरी कक्षा के स्तर का पाठ तीसरी, पांचवी और आठवीं के बच्चों को दिया गया। तीसरी कक्षा के पचीस फीसद बच्चे पढ़ पाए, जबकि कक्षा पांचवी के पचास फीसद और कक्षा आठवीं के तिहत्तर फीसद बच्चे पढ़ पाए।

गणित में पांच से सोलह बरस के बच्चों से गिनती, घटाव और भाग वगैरह के सवाल पूछे गए। गणित में तीसरी कक्षा के 20.9 फीसद बच्चे सरल घटाव के सवाल हल नहीं कर पाते। पिछले अध्ययन की बनिस्बत पांचवी कक्षा में भाग के सवालों को हल करने वाले बच्चों का प्रतिशत थोड़ा बढ़ा है, जो छब्बीस से बढ़ कर 27.8 फीसद हो गया। कक्षा आठवीं के बच्चों के सकल प्रतिशत में कोई बदलाव नहीं आया है। अध्ययन के मुताबिक चौवालीस फीसद बच्चे ही तीन अंकों में एक अंक की संख्या से भाग के सवाल हल कर पाते हैं। पढ़ना सीखने का मामला पढ़ने के अभ्यास से जुड़ा है। पढ़ना कोई यांत्रिक प्रक्रिया नहीं है। हमारे यहां जिस तरह पढ़ने पर शिक्षक द्वारा काम किया जाता है वह पाठ्यपुस्तक ही आधार बनती है। जबकि पाठ्यपुस्तक पढ़ना सिखाने में योगदान कम ही कर पाती है। दरअसल, पाठ्यपुस्तक का जोर प्रश्नों के हल करने आदि पर अधिक होता है। भाषा शिक्षण के तमाम दस्तावेज कहते हैं कि पढ़ने के लिए बच्चों को बाल साहित्य उपलब्ध कराने की जरूरत है। स्कूलों में लाइब्रेरी की जरूरत है। लिहाजा़, हम पढ़ने से केवल सतही अर्थ निकालने के आदी हैं। यों अक्षरों और शब्दों को पहचानना पढ़ना तो नहीं। पढ़ने का अर्थ है समझ कर पढ़ना। इस लिहाज से असर की रिपोर्ट से यह समझ में नहीं आता कि जो बच्चे पढ़ पा रहे हैं वे समझ भी पा रहे हैं। असर के इस अध्ययन में स्कूलों से संबंधित और भी पहलुओं को टटोलने की कोशिश की गई है। इसमें बच्चों का नामांकन, चारदीवारी, बिजली, शौचालय, लाइब्रेरी, मिड-डे मिल आदि शामिल हैं। ये तमाम कारक हैं जो स्कूली शिक्षा को प्रभावित करते हैं। 2018 में 25.8 फीसद ऐसे स्कूल पाए गए जहां लाइब्रेरी नहीं है। 37.3 फीसद ऐसे स्कूल हैं जहां बच्चे लाइब्रेरी की पुस्तकों का इस्तेमाल नहीं करते। 36.9 फीसद स्कूलों में देखा गया कि बच्चे लाइब्रेरी की पुस्तकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। कहा जा सकता है कि पढ़ने-लिखने की संस्कृति के लिए लाइब्रेरी को औजार के रूप में देखना अभी कोसों दूर लगता है।

बच्चों के सीखने का रिश्ता शिक्षकों की पेशेवर तैयारी से है। शिक्षकों की पेशेवर तैयारी के लिए शिक्षक-शिक्षा का ताना-बाना तो हमारे शिक्षा तंत्र द्वारा बुना गया है, मगर यह काफी लचर है। शिक्षक बनने के लिए पूर्व सेवाकालीन शिक्षक प्रशिक्षण मौजूद है। जो शिक्षक स्कूलों में अध्यापन करते हैं उनके लिए सेवाकालीन शिक्षक प्रशिक्षण का प्रावधान किया गया है। पर शिक्षकों की पेशेवर तैयारी- पूर्व सेवाकालीन और सेवाकालीन शिक्षक प्रशिक्षण- का मामला जोर नहीं पकड़ पा रहा है। शिक्षकों की तैयारी से पहले शिक्षक प्रशिक्षकों की तैयारी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। पर शिक्षक प्रशिक्षकों और शिक्षकों के बीच बराबरी स्थापित करने के संजीदा प्रयास नहीं होते। अगर शिक्षक प्रशिक्षक शिक्षकों को व्यावहारिक ज्ञान भाषणों से पढ़ाता है तो शिक्षक भी अपनी कक्षाओं में वैसा ही करेंगे और यही हो भी रहा है। खासकर विज्ञान जैसे विषय में मात्र यह कहते रहना कि यह करके सीखने का विषय है, मगर पढ़ाया भाषण देकर जाता है। यही हाल भाषा को लेकर है। खासकर प्राथमिक कक्षाओं में, जहां बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाना एक महत्त्वपूर्ण कौशल है। मगर प्रशिक्षण संस्थानों में बच्चों को स्वतंत्र ढंग से कैसे पढ़ना-लिखना सिखाया जाए इसके मौके नहीं मिलते। शिक्षा जगत में बच्चों में सृजनशीलता विकसित करने की बातें तो काफी होती हैं, मगर शिक्षकों की सृजनशीलता को बढ़ाने के प्रयास न के बराबर होते हैं। यही वजह है कि जिस भावना से शिक्षक प्रशिक्षक शिक्षकों को प्रशिक्षित करता है उसी भावना के साथ शिक्षक स्कूल में अपने बच्चों के साथ पेश आते हैं।

यशपाल समिति टिप्पणी करती है कि प्रशिक्षण की खामियों की वजह से विद्यालयों में गुणात्मक ढंग से सीखना-सिखाना कमजोर होता है। समिति सिफारिश करती है ‘विद्यालयी शिक्षा की प्रासंगिकता को सुनिश्चित करने के लिए शिक्षकों की पेशेवर तैयारी की सामग्री नए सिरे से बनानी चाहिए। वर्तमान स्कूली शिक्षा की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह संवैधानिक मूल्यों को भारतीय समाज में पोषित करने में कामयाब नहीं रही है। बल्कि शिक्षा ने हमारे समाज में विषमता को बढ़ाया ही है। बच्चे, सूचनाओं के बोझ तले दबे हुए हैं। शिक्षकों को दकियानूसी तौर-तरीकों से बाहर निकलने के अवसर कम ही मिल पा रहे हैं कि वे बच्चों को सूचनाओं की घुट्टी पिलाने के बजाय उन्हें अर्थपूर्ण सीखने की ओर प्रेरित कर सकें। स्कूलों में गुणात्मक सुधार तभी हो पाएगा, जब शिक्षकों में उन दक्षताओं का विकास किया जाए, जो बच्चों को सिखाने के लिए जरूरी होती है। शिक्षक प्रशिक्षणों की सबसे बड़ी समस्या है इनका एकरेखीय होना। अनुभव बताते हैं कि एक जैसे प्रशिक्षण पाकर शिक्षक ऊब जाते हैं। अधिकतर शिक्षक प्रशिक्षणों का आयोजन यह समझे बिना ही किया जाता है कि शिक्षकों की आवश्यकता क्या है? अगर इसे समझ भी लिया जाता है तो इसके वे पहलू नजरंदाज हो जाते हैं, जो शिक्षक को बच्चों के साथ आजमाने होते हैं। शिक्षकों की तैयारी के पूर्व शिक्षक प्रशिक्षकों की तैयारी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। शिक्षक प्रशिक्षकों व शिक्षकों के बीच गहरी खाई बनी हुई है। यहां बराबरी स्थापित करने के संजीदा प्रयास करने की जरूरत है। शिक्षा जगत में बच्चों में सृजनशीलता विकसित करने की बातें तो काफी होती हैं, मगर शिक्षकों की सृजनशीलता बढ़ाने के प्रयास न के बराबर होते हैं। यही वजह है कि जिस भावना से शिक्षक प्रशिक्षक शिक्षकों को प्रशिक्षित करता है उसी भावना के साथ शिक्षक स्कूल में अपने बच्चों के साथ पेश आते हैं।

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