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वक्त की नब्जः राह कठिन है

मोदी की लोकप्रियता कम हुई है पिछले महीनों में। ऐसा कई वर्गों में हुआ है। छोटे कारोबारी और किसान अगर दुखी हैं तो मुंबई के बड़े उद्योगपति भी खुश नहीं हैं। कारोबार करने के माहौल में जिस परिवर्तन की उम्मीद से उन्होंने मोदी का समर्थन किया था वह परिवर्तन आया नहीं है।

Author June 24, 2018 4:42 AM
नरेंद्र मोदी के काल में लोन को बट्टे खाते में डालने की प्रक्रिया तेज हुई है। (फाइल फोटो)

कुछ महीने पहले अगर मेरे जैसे किसी राजनीतिक पंडित ने कहा होता कि नरेंद्र मोदी अगला आम चुनाव हार सकते हैं, तो आरोप या तो पूर्वाग्रह का लगता या पक्षपात का। लेकिन जैसे किसी ज्ञानी ने अंग्रेजी मुहावरे में कहा है- राजनीति में एक सप्ताह बहुत लंबा अरसा होता है। यानी एक हफ्ते में जमाना बदल सकता है। पिछले कुछ दिनों से ऐसा ही होता लगने लगा है। जगह-जगह आसार दिखने लगे हैं मोदी की घटती लोकप्रियता के, शायद पहली बार पिछले चार सालों में। अभी तक परिवर्तन और विकास के न आने की शिकायतें जरूर मिलती थीं लोगों से और नोटबंदी और जीएसटी के खिलाफ लोग दुखड़ा रोते थे, लेकिन साथ-साथ यह भी कहते थे कि सिर्फ मोदी हैं वर्तमान राजनेताओं में, जिनको प्रधानमंत्री बनने का अधिकार है।

अब उत्तर भारत में ऐसा नहीं रहा। पिछले महीनों में मैंने दौरे किए राजस्थान और मध्यप्रदेश के, जहां इस साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं और इन दोनों राज्यों में मोदी की लोकप्रियता कम होने के आसार दिखे हैं मुझे। खासकर उन वर्गों में, जिन्होंने नोटबंदी की ज्यादा मार झेली है- छोटे कारोबारी और छोटे किसान। सो, जब मेरे एक दोस्त ने मुझे लोकनीति-सीएसडीएस का सर्वेक्षण भेजा पिछले हफ्ते, जिसमें स्पष्ट है कि मोदी की लोकप्रियता अब इतनी कम हो गई है कि उनकी और राहुल गांधी की लोकप्रियता के बीच जो फासला हुआ करता था वह कम हो गया है, तो यकीन करना मुश्किल नहीं था मेरे लिए। सर्वेक्षण पूरे देश में किया गया था पिछले महीने और पाया यह भी गया कि अब हिंदू मतदाताओं में भी मोदी की छवि बिगड़ गई है। अल्पसंख्यकों में वैसे भी अच्छी नहीं थी।

सवाल है कि मोदी नहीं, तो कौन बनेगा भारत का अगला प्रधानमंत्री? कांग्रेस चूंकि राष्ट्रीय स्तर पर इकलौती पार्टी है, जो भारतीय जनता पार्टी को चुनौती दे सकती है, तो पहला नाम राहुल गांधी का आता है। राजस्थान और मध्यप्रदेश में अगर कांग्रेस जीत जाती है तो शायद उनकी बारी आ भी सकती है। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष अपने ही सबसे बड़े दुश्मन हैं। उनके राजनीतिक विचार इतने उलझे हुए हैं कि कभी-कभी ऐसा लगता है कि खुद नहीं सोचते हैं, कोई और सोच कर उनको पाठ पढ़ाता है, जिसे दोहराने में वे गलतियां कर बैठते हैं। मसलन, उनका वह भाषण ही देख लें, जो उन्होंने हाल में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को दिल्ली में दिया था।

अचानक पूछ बैठे कि क्या कोई उनको बता सकता है कि कोका कोला कंपनी किसने शुरू की थी? जब कोई बता नहीं सका, तो उन्होंने खुद कहा कि जिस बंदे ने यह कंपनी शुरू की थी वह पहले सड़क पर शिकंजी बेचता था। सच नहीं है यह, लेकिन इसको हजम ही कर रहे थे कार्यकर्ता कि अध्यक्षजी ने पूछा कि क्या कोई जानता है कि मैक्डोनल्ड कंपनी किसने शुरू की थी? खुद ही जवाब दिया कि जिस व्यक्ति ने मैक्डोनल्ड शुरू किया, वह पहले ढाबा चलता था। यह भी सच नहीं, लेकिन आगे पूछा कि ऐसा भारत में क्यों नहीं होता? सोच कर पूछते तो याद आया होता कि लाइसेंस राज उनकी दादी के दौर में हुआ करता था। नियम इतना कठोर था कि कोटा से ज्यादा किसी कारखाने में उत्पादन होता, तो मालिक को सजा मिलती थी। इस तरह की ऊटपटांग बातें राहुल बहुत बार कर चुके हैं।

कांग्रेस अध्यक्ष की इससे भी बड़ी समस्या यह है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का नामो-निशान मिट चुका है और बिना उत्तर प्रदेश को जीते भारत का प्रधानमंत्री बनना मुश्किल है। इस प्रदेश में पिछली बार भाजपा को अस्सी में से तिहत्तर लोकसभा सीटें मिली थीं। इनको आधी कर सकते हैं मायावती और अखिलेश यादव अगर इस बुआ-भतीजे का गठबंधन लोकसभा चुनावों तक कायम रहता है। दोस्ती बनी रहती है इनके बीच तो उत्तर प्रदेश के दलित और मुसलिम मतदाता इकट्ठा होकर वोट इस गठबंधन को दे सकते हैं। दोस्ती टूट जाती है अगर, तो यह वोट बैंक भी टूट सकता है।

इस गठबंधन की असली नेता हैं मायावती और वह इसलिए कि दलितों का वोट उनको अन्य राज्यों में भी मिलने की संभावना रहती है। सो, जब सोनिया गांधी उनको कर्नाटक में, अपनी गठबंधन सरकार बनाने के बाद, उस मंच पर मायावती से गले मिल रही थीं, एक तरह से इशारा भी कर रही थीं कि अगली बारी इस दलितों की बेटी की है। मेरी अपनी राय में भी अगर मोदी नहीं बन सकते हैं 2019 में दुबारा प्रधानमंत्री तो सबसे पहला नंबर मायावती का होगा। वैसे तो राजनीतिक मामलों में भविष्यवाणी करना खतरे से खाली नहीं है, सो अक्सर मैं करती नहीं हूं, लेकिन वर्तमान स्थिति के बारे में जरूर कहा जा सकता है कि मोदी की लोकप्रियता कम हुई है पिछले महीनों में। ऐसा कई वर्गों में हुआ है। छोटे कारोबारी और किसान अगर दुखी हैं तो मुंबई के बड़े उद्योगपति भी खुश नहीं हैं। कारोबार करने के माहौल में जिस परिवर्तन की उम्मीद से उन्होंने मोदी का समर्थन किया था वह परिवर्तन आया नहीं है।

मोदी का ज्यादा ध्यान अपने इस पहले दौर में रहा है काले धन को खोज निकालने पर और इस धन को ढूंढ़ने का काम सौंपा है ऐसे अधिकारियों को, जो खुद इतने भ्रष्ट हैं कि काला धन जब मिलता है किसी छापे में, तो उसको छिपा कर अपनी जेबों में डाल लेते हैं कई बार। यानी मोदी की लोकप्रियता कम होने के कारण अनेक हैं, सो जहां कभी तय था उनका अगले साल प्रधानमंत्री फिर से बनना, अब तय नहीं रहा।

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