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मुद्दा: जेल सुधार की दरकार

किसी व्यक्ति को उसके अपराध की सजा देना और असंवेदनशील होकर जेल में उसके मानवाधिकारों की रक्षा न कर पाना, दो अलग बातें हैं। जेल के अंदर सजा काट रहा व्यक्ति एक सजीव प्राणी है और उसे भी जीने का अधिकार है, इस बात को कभी नहीं भुलाया जाना चाहिए।

Author July 8, 2018 4:03 AM
सुप्रीम कोर्ट

देवेंद्र जोशी

पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने जेलों में क्षमता से अधिक कैदी रखे जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए उच्च न्यायालयों को इस पर विचार करने को कहा। सर्वोच्च न्यायालय का मानना है कि जेलों में कैदियों को ठूंस कर रखना मानवाधिकारों का उल्लंघन है। इससे पहले भी वह कह चुका है कि कैदियों को जानवरों की तरह नहीं रखा जा सकता। अगर आप उन्हें नहीं रख सकते तो बाहर कर दीजिए। अदालत ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि देश की चौदह सौ जेलों में निर्धारित संख्या से डेढ़ सौ से छह सौ प्रतिशत तक अधिक कैदियों को रखा जा रहा है।

हाल के दिनों में पटना में कैदियों के भागने की घटना हो, करीब दो साल पहले भोपाल केंद्रीय कारागार के आठ कैदियों के मुठभेड़ में मारे जाने की घटना या इस साल जनवरी में मेरठ में कैदी द्वारा आत्महत्या कर लेने की घटना, ये सब इस ओर इशारा करते हैं कि भारत की जेलों में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है। जेल में बंद कैदी दोहरी प्रताड़ना का शिकार हो रहे हैं। अपने अपराध की सजा तो वे भुगत ही रहे हैं, दूसरी तरफ व्यवस्था में विसंगतियों और जेल सुधार में कमियों का खमियाजा भी उन्हें भुगतना पड़ रहा है। जेल के अंदर की खबरें प्राय: ज्यादातर बाहर आ नहीं पातीं। ऐसे में जब कोई दुर्घटना होती या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्देश जारी किए जाते हैं तभी जेल सुधार चर्चा में आता है। इसका यह अर्थ कतई नहीं समझा जाना चाहिए कि बाकी दिनों में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देश इस मामले में देश के आम कैदियों की अभिव्यक्ति हैं।

विडंबना है कि एक तरफ जेलों में क्षमता से अधिक कैदी रखे जा रहे हैं, तो दूसरी ओर इनमें से अधिकतर जेलें कर्मचारियों की कमी से जूझ रही हैं। राष्ट्रीय विधिक सेवा अधिकरण (नालसा) की ओर से प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार देश भर की जेलों में कर्मचारियों की अनुमोदित क्षमता 77,230 है, लेकिन इसमें से तकरीबन 24,588 यानी तीस प्रतिशत से अधिक पद खाली पड़े हुए हैं। संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत जेलों का रखरखाव और प्रबंधन पूरी तरह राज्य सरकारों का विषय है। मगर अफसोस कि कैदियों का मामला अब भी प्रशासन की प्राथमिकता सूची में नहीं है। जेलों के अंदर की अमानवीय स्थिति का ही नतीजा है कि आए दिन जेलों में कैदियों के संदिग्ध स्थिति में मारे जाने, उत्पात मचाने, मारपीट करने की खबरें आती रहती हैं। 2015 में हर रोज औसतन चार कैदियों की जेल में मौत हुई।

जेलों की दुर्दशा के कारणों पर नजर डालें तो इस बदहाली की एक बड़ी वजह देश में जेलों की संख्या में कमी, लंबित मामले और जेलों के आधुनिकीकरण की धीमी रफ्तार भी है। इसी को ध्यान में रखते हुए 2002-03 में गृह मंत्रालय ने जेलों के आधुनिकीकरण की योजना शुरू की थी, जिसमें बहुत से पक्षों को शामिल किया गया था, जिनमें विभिन्न निर्माणों के साथ-साथ अतिरिक्त बैरकों के निर्माण की भी योजना थी। सताईस राज्यों के लिए इस योजना के लिए शुरुआती पांच सालों का परिव्यय अठारह सौ करोड़ रुपए था। गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक सितंबर, 2011 तक एक सौ उन्नीस नई जेलें और पंद्रह सौ बहत्तर बैरकों का निर्माण किया गया। इसमें इस योजना के लिए आबंटित धनराशि का करीब अठानबे प्रतिशत इस्तेमाल हुआ। 13 मार्च, 2018 को लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में सरकार ने स्वीकार किया कि जेलों में कैदियों की भीड़ का अहम कारण लंबित मामलों की अधिक संख्या होना है। इससे निपटने के लिए त्वरित अदालतों, खुली जेलों की स्थापना, न्याय वितरण और कानूनी सुधार के लिए राष्ट्रीय मिशन, किसी कैदी को हिरासत में रखने की अधिकतम अवधि का निर्धारण, राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण द्वारा सीआरपीसी मापदंडों के तहत याचिका सौदेबाजी प्रचारित करना और सभी अभियुक्त कैदियों को निश्शुल्क कानूनी सेवाएं उपलब्ध कराने जैसे कदम उठाए जाने की आवश्यकता है।

आज देश की जेलों में निर्धारित क्षमता से एक सौ चौदह प्रतिशत कैदी अधिक हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 2015 के मुकाबले 2016-17 में कैदियों की संख्या लगातार बढ़ी है, पर जेलों की संख्या ज्यों की त्यों बनी हुई है। 31 मार्च, 2016 तक के आंकड़ों के अनुसार देश के विभिन्न न्यायालयों में तीन करोड़ से अधिक मामले लंबित पाए गए हैं। देश की प्रत्येक जेल में तीन में से दो कैदी ऐसे हैं, जिनके प्रकरण विचाराधीन हैं। 2015 में राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार सड़सठ प्रतिशत कैदियों के मामले विचाराधीन थे।

जेलों की स्थिति में सुधार न हो पाने की एक वजह पैसे की कमी भी रही है। कारण चाहे जो हो, लेकिन जेलों के सुधार से सिर्फ इसलिए मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि यहां गुनहगार रहते हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जेलों का मकसद अपराधियों को सुधार कर एक बेहतर नागरिक बनाना है। उन्हें अमानवीय हालात में रख कर हम उनमें सुधार की अपेक्षा नहीं कर सकते। आज आवश्यकता जेलों के प्रति संवेदनशील होने की है। किसी व्यक्ति को उसके अपराध की सजा देना और असंवेदनशील होकर जेलों में उसके मानवाधिकारों की रक्षा न कर पाना, दो अलग बातें हैं।

जेल के अंदर सजा काट रहा व्यक्ति एक सजीव प्राणी है और उसे भी जीने का अधिकार है, इस बात को कभी नहीं भुलाया जाना चाहिए। जेलों में बंद कैदियों से पापड़, अगरबत्ती, दरी चटाई जैसे उत्पाद बनवाने के बजाय अन्य सामयिक जरूरत के कार्य करवाए जाने पर भी विचार किया जाना चाहिए। ताकि कैदियों के पुनर्वास और सुधार के लिए भी उपयोगी कदम उठाए जा सकें। ऐसा नहीं कि सर्वोच्च न्यायालय जेलों की कमी पर सिर्फ सुनवाई करता है, बल्कि पहले के अपने एक फैसले में सर्वोच्च न्यायालय जेल सुधार हेतु आठ सूत्रीय दिशा-निर्देश भी जारी कर चुका है। इसमें हर जिले में विचाराधीन कैदी समीक्षा समिति की प्रत्येक तीन माह में बैठक आयोजित करना, समिति को सीआरपीसी की धारा 436 और 436 ए का प्रभावी क्रियान्वयन करना, गरीबी के कारण जमानत नहीं ले पाने वाले कैदियों को कानूनी सहायता प्रदान करना, जिला विधिक सेवा समिति सचिव द्वारा संयोजनीय अपराध में विचाराधीन कैदियों की रिहाई के मुद्दे पर विचार करने जैसे सुधार शामिल हैं। अगर इन सब सुधारों को लागू करने की दिशा में कारगर कदम उठाए जाएं, तो भारत में जेलों को सुधारगृह में तब्दील करने की कल्पना को साकार कर कैदियों को अमानवीय यातनाओं से मुक्ति दिलाई जा सकती है।

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