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वक्त की नब्ज: हिंदुत्व की पतवार

चाहे मतदाता हिंदू हों या मुसलिम, उनके सपने अब एक जैसे हो गए हैं। उनका सपना है अपने जीवन में ऐसा परिवर्तन देखना, जिससे उनके आर्थिक हालात इतने बदल जाएं कि वे इज्जत से जी सकें। न राम मंदिर नर्माण से उनका कोई लेना-देना है और न ही विशाल प्रतिमाओं से।

Author November 11, 2018 5:13 AM
प्रतीकात्मक फोटो

अक्तूबर के आखिरी दिन प्रधानमंत्री ने नर्मदा नदी के किनारे सरदार पटेल की एक विशाल मूर्ति का उद्घाटन किया। सरयू नदी के किनारे दिवाली मनाते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने ऐलान किया कि भगवान राम की विशाल प्रतिमा के निर्माण की योजना बन रही है। उधर महाराष्ट्र में समुद्र में एक द्वीप बना कर छत्रपति शिवाजी की एक विशाल प्रतिमा बनाने की योजना बन रही है। ऊपर से संघ परिवार और हिंदू संतों का इतना दबाव पड़ रहा है मोदी सरकार पर कि संभव है, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण भी शुरू हो जाएगा अगले आम चुनावों से पहले। यानी हिंदुत्व के बल पर जीतना चाहते हैं फिर से नरेंद्र मोदी। सवाल है कि क्या हिंदुत्व के सहारे जीत सकते हैं एक बार फिर? पिछले दिनों मैंने राजस्थान और मध्यप्रदेश के देहातों के दौरे किए। पश्चिमी राजस्थान के दूर-दराज अंदरूनी गांवों में मैंने पाया कि एक ही मुद्दा है वहां के लोगों के लिए। चाहे गांव मुसलमानों का था, जाटों का, राजपूतों का या दलितों का, वहां सबसे बड़ा मुद्दा था पानी। बारिश इस साल न के बराबर हुई है, सो इन गांवों में सूखा ऐसा पड़ने लगा है कि जानवरों के प्यास से मरने की नौबत आ गई है कई गांवों में। एक गांव में तो पीने के पानी का रंग मटमैला था, लेकिन उसी को लोग बोतलों में भर कर घर ले जा रहे थे। दूसरा अहम मुद्दा था बेरोजगारी। नई नौकरियां इतनी कम पैदा हुई हैं, पिछले चार वर्षों में कि लोगों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जिस परिवर्तन और विकास के वे सपने देख रहे थे 2014 में, वे सपने टूट गए हैं। सो, क्या नरेंद्र मोदी के लिए फिर से वोट डालेंगे? अक्सर इस सवाल का जवाब था : शायद, लेकिन राजस्थान की सरकार बदलेंगे।

मध्यप्रदेश में मैंने उन गांवों का दौरा किया, जहां मोदी सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के मुताबिक प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बहुत काम हुआ है। वास्तव में हुआ है कई गांवों में। जहां कच्ची बस्तियां हुआ करती थीं आज पक्के मकान दिखते हैं, जो असली मकान हैं जिनमें बिजली और गैस की सुविधाएं दी गई हैं। ऐसी योजनाओं के तहत कुछ साल पहले जो मकान बनते थे वे मकान न होकर चारदीवारी डिब्बे हुआ करते थे, जो इंसानों के लायक नहीं थे। मध्यप्रदेश में मैंने ग्रामीण सड़कें भी देखीं, जहां पहले कभी नहीं थीं, और स्कूल देखे, जिनकी कक्षाओं में बच्चों के लिए मेज-कुर्सियां थीं और शौचलाय भी अलग थे लड़कियों के लिए। सो, ऐसा नहीं है कि परिवर्तन नहीं आया है, लेकिन इसके बावजूद एक अजीब मायूसी देखने को मिली, क्योंकि बेरोजगारी आज भी उतनी ही बड़ी समस्या है जो 2014 में थी।

जहां भी गई, मुझे पढ़े-लिखे नौजवान मिले, जिनकी एक ही शिकायत थी कि नौकरी ढूंढ़ने जब निकलते हैं तो निराश होकर लौटते हैं, क्योंकि न सरकारी नौकरियां मिलती हैं और न प्राईवेट। खेती पर निर्भर रहना पड़ता है ऐसे घरों में, जहां खेती से इतनी थोड़ी कमाई है कि केवल एक भाई का परिवार उस पर निर्भर रह सकता है और वह भी मुश्किल से। सो, जब उन्होंने परिवर्तन और विकास के नाम पर मोदी को वोट दिया था, तो इस उम्मीद से कि रोजगार के इतने अवसर पैदा हो जाएंगे कि उनके जीवन में असली बदलाव आ जाएगा। सो, क्या मोदी को वोट देंगे मध्यप्रदेश के मतदाता? शायद। शायद शिवराज सिंह चौहान को भी, लेकिन विकास और परिवर्तन के नाम पर। हिंदुत्व के नाम पर नहीं।

मेरा शुरू से मानना है कि 2014 में भी मोदी को न राम मंदिर के नाम पर पूर्ण बहुमत मिला था और न हिंदुत्व के नाम पर। इस बार भी मुझे एक भी गांव के लोगों ने नहीं कहा कि उनके लिए राम मंदिर बहुत बड़ा मुद्दा है। सो, ऐसा क्यों हो रहा है कि मोदी और उनके मुख्यमंत्री हिंदुत्व से जुड़े मुद्दों को इतनी अहमियत दे रहे हैं कि शहरों और रेलवे स्टेशनों के नाम बदले जा रहे हैं, अगर उनमें इस्लाम का थोड़ा-सा भी असर दिखता है। इलाहाबाद अब प्रयागराज बन गया है, फैजाबाद जिले का नाम अयोध्या हो गया है और मुगलसराय का नाम बदल कर अब ऐसे राजनेता के नाम पर रखा गया है, जिन्हें पहचानते हैं सिर्फ वे लोग, जो भारतीय जनता पार्टी में रहे हैं।

ये सारे प्रयास अगर किए जा रहे हैं 2019 के आम चुनाव जीतने की उम्मीद से तो बेकार हैं ये प्रयास। मोदी की जीत 2014 में हुई थी परिवर्तन और विकास के नारे के कारण और अगले साल अगर उनको भारत के मतदाता एक मौका और देते हैं, तो इस आधार पर देंगे कि उनको विश्वास है कि मोदी ईमानदारी से कोशिश कर रहे हैं उनके जीवन में परिवर्तन लाने की। बेरोजगारी चार साल पहले अगर सबसे बड़ा मुद्दा था, तो इस बार उससे भी ज्यादा होगा।

असली परिवर्तन अगर आया है इस देश में तो आया है मतदाताओं की मानसिकता में। कभी आसान हुआ करता था उनको मंदिर-मस्जिद के नाम पर बहकाना, अब नहीं रहा है। चाहे मतदाता हिंदू हों या मुसलिम, उनके सपने अब एक जैसे हो गए हैं। उनका सपना है अपने जीवन में ऐसा परिवर्तन देखना, जिससे उनके आर्थिक हालात इतने बदल जाएं कि वे इज्जत से जी सकें। न राम मंदिर नर्माण से उनका कोई लेना-देना है और न ही विशाल प्रतिमाओं से। मोदी अगर इस हकीकत से बेखबर हैं, तो सिर्फ इसलिए कि दिल्ली बहुत दूर है इस देश के यथार्थ से। मोदी इस दूरी का शिकार बन गए हैं।

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