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बाखबर: युद्ध और शांति

बहस से यह भी साफ हुआ कि कुछ एंकरों को ‘खान मार्केट गैंग’ का डर कुछ ज्यादा ही सताता है, जबकि एंकर खुद कहते रहते हैं कि ये गिनती में मुठ्ठी भर हैं। भैये! जब ये मुठ्ठी भर ही हैं तो काहे घंटों तक अपना रक्तचाप बढ़ाते हो?

Author Published on: September 1, 2019 1:49 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर (इंडियन एक्सप्रेस)

सुधीश पचौरी

हर चैनल अपना-अपना कश्मीर दिखाता है। भक्त चैनल कश्मीर को सामान्य दिखाते हैं। भक्त चैनल कुछ सामान्य गतिविधि वाला कश्मीर दिखाते हैं, तो एकाध अभक्त चैनल कुछ सुनसान-सा कश्मीर दिखाते हैं। ‘सामान्य कश्मीर’ में सुनसान सड़कों पर कुछ निजी वाहन आते-जाते दिखते हैं। कुछ लोग ‘लांग शॉट’ में आते-जाते दिखते हैं, लेकिन ये चैनल लाल चौक के अलावा अन्य जगहों को दिखाते हैं। ‘सुनसान’ दिखाने वाला चैनल अक्सर लाल चौक को दिखाता है, जिसमें दुकानें अब भी बंद दिखती हैं, यद्यपि कुछ गाड़ियां आती-जाती अवश्य दिखती हैं। लेकिन रिपोर्टर जब भी ‘पीस टू कैमरा’ करते हैं, तो आखिरी वाक्य यही कहते हैं कि प्रशासन कहता है कि धीरे-धीरे सब सामान्य हो रहा है।

कुछ चैनल पुराने फुटेजों को दुहरा कर काम चलाते हैं, लेकिन कुछ चैनल ऐसे फुटेज भी दिखाते हैं, जिनमें एक दो युवा बड़े कायदे से बताते रहते हैं कि पहले के मुकाबले इन दिनों अच्छे हालात हैं और ज्यों-ज्यों दिन बीतेंगे स्थिति अच्छी होती जाएगी। हमें नौकरियां मिलेंगी, सब ठीक हो जाएगा।… एक भक्त चैनल दिखाता रहा कि पीडीपी की चीफ किस बड़े भव्य बंगले में नजरबंद हैं। मानो नजरबंदी प्रमुख खबर न हो, बल्कि वह बड़ा पुराना भव्य बंगला ही सबसे बड़ी खबर हो। एक चैनल दिखाता रहा कि पाकिस्तान गोले बरसा रहा है और देखिए ये बच्चे जान बचा कर भाग रहे हैं। एक कश्मीर जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल का भी है, जिसका कुछ भरोसा किया जा सकता है।

ऐसे ही ‘कश्मीर’ के बारे में राज्यपाल महोदय ने एक प्रेस कॉन्फें्रस करके बताया कि सामान्य जीवन धीरे-धीरे लौट रहा है, कि एक भी गोली नहीं चली है, कि रबर बुलेटों से जितने चोटिल हैं वे कमर से नीचे हैं, कि इतने फोन खुले हैं, कि धीरे-धीरे स्थिति और भी सामान्य होगी, कि अस्पतालों में दवाओं की कमी नहीं है, कि जम्मू-कश्मीर की जनता के कल्याण के लिए सरकार क्या-क्या योजनाएं लेकर आ रही है, कि कब तक नेता बंद रहेंगे।

शायद ऐसे ही सवाल के जवाब में राज्यपाल मजाहिया भाव से बोल उठे कि जो जितना जेल में रहता है, उतना ही बड़ा नेता बन कर निकलता है। मैं स्वयं इतनी बार जेल गया हूं… पत्रकार हंसने लगे। एक बेहद तनाव भरे माहौल में भी राज्यपाल जी की ऐसी परिहास वृत्ति मजेदार लगी। उनके आलोचक कुछ भी कहें, बात तो वे सही कह रहे थे!

कांग्रेस के दुर्दिन खत्म नहीं होते दिखते। कुछ कसर रह जाती है तो कुछ एंकर पूरी कर देते हैं। एक दिन राहुल ने ट्वीट कर कहा कि कश्मीर भारत का अांतरिक मामला है और कि कश्मीर में आतंकवाद के पीछे पाकिस्तान की बड़ी भूमिका है… तो यह बात भी कई एंकरों को हजम नहीं हुई। माना कि राहुल ने यह ‘करेक्शन’, इमरान के यूएन को लिखे पत्र में राहुल को अपने पक्ष में उद्धृत करने के बाद, किया लेकिन ‘करेक्शन’ तो था!

एंकर चाहे तो यह कह सकते थे कि चलो ‘देर आयद दुरुस्त आयद’, लेकिन कुछ एंकरों को राहुल का ‘सही’ होना भी नहीं भाता। अगर राहुल को वे ‘सही’ मान लेंगे तो रोज का ‘पंचिंग बैग’ किसे बनाएंगे? किसी मुद्दे पर राजनीतिक ‘लाइन’ को बदलने पर भाजपा प्रवक्ता अगर राहुल का मजाक उड़ाएं तो समझ में आता है, लेकिन एंकर भी अगर भाजपा के प्रवक्ताओं जैसे बन जाएं तो आश्चर्य होता है। अगर कोई अपनी गलत लाइन को सुधारना चाहता है तो आपको मिर्ची क्यों लगती है?

इस बीच, एक नया ‘मीडिया युद्ध’ छिड़ गया। इस मीडिया युद्ध की शुरुआत कुछ-कुछ ‘नरो वा कुंजरो’ की तरह हुई। बहुत देर तक यही समझ न आया कि मुंबई के जज महोदय ने किस वाले ‘वार ऐंड पीस’ (युद्ध और शांति) की बात की है? एक सुबह एक अंग्रेजी एंकर ने ‘खबर बे्रक’ कर बताया कि मुंबई के एक जज महोदय ने अपनी सुनवाई में जिस ‘वार ऐंड पीस’ का जिक्र किया वह टाल्स्टाय वाला ‘क्लासिक उपन्यास’ नहीं, बल्कि किन्हीं ‘बिस्वजीत राय’ द्वारा संपादित किताब है, जिसका जिक्र पुलिस के ‘पंचनामा’ में है और जिसका नाम ‘वार ऐंड पीस इन जंगल महल’ है। सुनवाई के दौरान जज महोदय इसी ‘जंगल महल’ वाले ‘वार ऐंड पीस’ की बात कर रहे थे, लेकिन ‘खान मार्केट’ गैंग वालों ने अपने ट्वीटों के जरिए अपनी ‘फेकरी विद्या’ का इस्तेमाल करके उसे टाल्स्टाय का ‘वार ऐंड पीस’ बना दिया और इस तरह न्यायपालिका को अनपढ़ बता कर उसका उपहास उड़ाने का अभियान चलाया! हालांकि, बहसों में ‘खान मारर्केट गैंग’ वाला तो एक न आया, लेकिन उनके कई सहोदर रहे जो कहते रहे कि हम न्यायालय की अवमानना नहीं कर रहे, लेकिन फैसले की आलोचना करना हमारा हक है।
एंकर पूछते रहे कि जज ने जिस ‘वार ऐंड पीस’ की बात की, क्या वह टालस्टाय की ‘वार ऐंड पीस’ की बात थी या कि ‘वार ऐंड पीस इन जंगल महल’ की बात थी…
अंत में एक एंकर ने ही अपना कन्फ्यूजन क्लीअर किया और ‘सच’ बताया कि न्यायालय ने स्वयं साफ किया है कि जिक्र में आई रचना टाल्स्टाय वाली ‘वार ऐंड पीस’ नहीं थी…
बहस से यह भी साफ हुआ कि कुछ एंकरों को ‘खान मार्केट गैंग’ का डर कुछ ज्यादा ही सताता है, जबकि एंकर खुद कहते रहते हैं कि ये गिनती में मुठ्ठी भर हैं। भैये! जब ये मुठ्ठी भर ही हैं तो काहे घंटों तक अपना रक्तचाप बढ़ाते हो? और, अगर ये इतने ही ‘खल’ हैं, तो इनको इतना ‘मीडिया कवरेज’ क्यों देते हो?

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