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बाखबर: विश्वसनीयता की हतक

ऐसी हारी हुई मानसिकता वाली टिप्पणियों के लिए इनको ठोकना आसान था, लेकिन ‘पाक कुप्रचार’ से लड़ने वाले चैनलों की एक बड़ी चुनौती जम्मू-कश्मीर के ‘यथार्थ’ को दिखाने की भी थी।

Author Published on: August 18, 2019 1:32 AM
संविधान के अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधान खत्म होने के बाद जम्मू-कश्मीर अब राज्य नहीं है। यह दो केंद्र शासित प्रदेशों (जम्मू-कश्मीर और लद्दाख) में बांट दिया गया है। (फाइल फोटो)

एक दिन एक अंग्रेजी एंकर ताल ठोकते हुए चीखता है : मीडिया का सबसे बड़ा अभियान! सभी चैनल हमको फॉलो कर रहे हैं। इसके बाद चैनल पूरे स्क्रीन भर में लिख कर बताने लगता कि किस तरह पाक अपनी ट्विटर-फौज से झूठा ‘प्रोपेगेंडा’ फैला कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब करने में लगा है, ऐसे में हमने तय किया है कि हम चौबीस घंटे इसका मुंहतोड़ जवाब देंगे। अपना हैशटैग है : हैशटैग ‘इंडियारिजेक्टप्रोपेगेंडा’!

स्पर्धी चैनल के ऐसी ‘सेल्फ सेल’ को देख दूसरा भक्त एंकर क्यों पीछे रहता? इसलिए एक शाम पहले ही उसने अपनी ‘हैशटेग’ वाली बहस में भाजपा के ही एक नामी प्रवक्ता को झाड़ दिया कि तुम जैसों से कुछ नहीं होने का। इधर तुम अपने ट्विटर में मगन रहो। उधर पाकिस्तान अपनी सोशल मीडिया फौज और टीवी के जरिए हमको ठोकता रहेगा।

इस ठोका-ठोकी के चक्कर में अपने चैनलों को पाकिस्तानी मीडिया के प्रचार के भी कुछ नमूने दिखाने पड़े। और वहां देखा, तो पाया कि अपनी ही कुछ तोपोें के मुंह उन्होंने इधर मोड़ दिए हंै। एक पाक सीनेटर कहे जाते थे कि हमारे साथ कई हिंदू हैं। अरुंधति राय हैं, चिदंबरम हैं, मणिशंकर हैं, ममता हैं… ये सब हमारे साथ हैं।

इसके बाद अपने वीर चैनल इन लोगों के बयान दिखाने लगते, ताकि इनको पाक के हाथों में खेलने वाला कह कर ठोक सकें। कांग्रेस की लाइन दोचित्ता है, कुछ बड़े नेता तीन सौ सत्तर हटाने को सही मानते हैं, लेकिन गलत। एक ने कह दिया कि मुसलिम स्टेट (कश्मीर) कोे ‘मेजोरिटी स्टेट’ द्वारा दबा दिया गया। बाकी दल डर गए। एक और विवादप्रिय नेता लिख दिए कि उत्तरी सीमा पर ‘पैलेस्टाइन’ बना दिया गया है।…

ऐसी हारी हुई मानसिकता वाली टिप्पणियों के लिए इनको ठोकना आसान था, लेकिन ‘पाक कुप्रचार’ से लड़ने वाले चैनलों की एक बड़ी चुनौती जम्मू-कश्मीर के ‘यथार्थ’ को दिखाने की भी थी।  सुरक्षा सलाहकार डोभाल की ‘विजिट’ के फुटेज सब चैनलों में एक से दिखते रहे। ईद के रोज जम्मू में काफी लोग ईद मनाते दिखे। लद्दाख के बाजार भी खुले दिखे, लेकिन श्रीनगर में बहुत लोग नहीं दिखे। एक एंकर ने स्पष्ट किया कि शांति-सुरक्षा की खातिर, नमाज अता करने के लिए छोटी-छोटी मस्जिदों को ही खोला गया। बड़ी मस्जिदों को नहीं खोला गया। एक चैनल ने पुलवामा और गंदरबल जैसे संवेदनशील इलाकों में कुछ लोगों को नमाज अता करते और ईद मनाते दिखाया। फिर भी रिपोर्टर ने ‘पीस टू कैमरा’ यही कह कर किया कि हालात सामान्य हैं!

लेकिन ऐसे सभी फुटेजों में वही ‘कमी’ दिखी, जो एक नामी विदेशी चैनल के उस फुटेज में दिखी, जो कहता था कि दस हजार लोगों ने विरोध में प्रदर्शन किया है। ‘कमी’ यह कि इस फुटेज में कहीं भी ‘डेट लाइन और टाइम लाइन’ नहीं दिखी! इसमें कितना फुटेज ‘फेक’ था कितना नहीं, कोई नहीं कह सकता। बिना ‘टाइम लाइन’ का फुटेज और वह भी आज के ‘डिजिटल कैमरों’ के दिनों में, ‘संदिग्ध’ ही कहा जा सकता है।

डिजिटल ‘डेट लाइन और टाइम लाइन’ से रहित फुटेजों को असली मान कर अगर बहसें होंगी, तो तू-तू मैं-मैं होकर रहेंगी। यही हुआ। देश के दुश्मनों की खबर लेने के लिए ज्यों ही एक विश्लेषिका ने नाम लेकर दूसरों को लताड़ा कि ये और ये तोे उस ‘विदेशी मीडिया’ से भी अधिक खतरनाक हैं। पहले पत्रकार ने तो जवाब में हंस कर ‘धन्यवाद’ देकर अपने को इस ‘तू-तू मैं-मैं’ से अलग किया, लेकिन एक अन्य पत्रकार ने ‘खतरनाक’ विशेषण को गंभीरता से ले लिया और खतरनाक कहने वाली पर बरस पडीं कि ‘यू कम्युनल वूमन, गो टू हेल स्कम!’ मुझे खतरनाक कहलाने पर गर्व है।…

पाकिस्तानी कुप्रचार से देश की हिफाजत करने निकला एंकर शरीफों की इस ‘तू-तू मैं-मैं’ से उखड़ गया और अपने ‘हैशटेग’ को दुहराने लगा, लेकिन अपने ही चैनल में दिखाए फुटेज में ‘डेट लाइन और टाइम लाइन’ के न होने पर एक भी टिप्पणी न की। ऐसे तो लड़ लिए आप ‘कुप्रचार’ से। ‘कुप्रचार’ का जवाब ‘कुप्रचार’ नहीं है।

बहरहाल, सरकार चेती। खबर आई कि सरकार ने चार ‘ट्विटर हैंडिलों’ को ‘सस्पेंड’ कर दिया है। एक दिन बाद फिर से खबर आई कि सरकार ने और भी कई ट्विटर हैंडिलों को नोटिस पर रखा है। ऐसे गाढ़े वक्त में भी विघ्न-संतोषी एक्टिविस्ट चैनलों में आकर अपनी बात जम कर कहते हैं फिर भी कहते यही रहते हैं कि आजादी का गला घोंटा जा रहा है! यह कैसा ‘गला’ है जो ‘घोटा जा रहा’ बता रहा है, लेकिन बोल भी बराबर रहा है?

इस विराट मीडिया युद्ध में एक कश्मीर वह है, जो चैनलों में दिखता है और एक वह है जो निंदक दिखाना चाहते हैं। यों दिखते तो दोनों हैं, फिर भी कुछ ‘रह जाता-सा’ लगता है, जो नहीं दिखता। मीडिया युद्ध में आप जिसे छिपाते हैं वही लोगों को ज्यादा ‘दिखता’ है। इस युद्ध में सबसे बड़ी ‘हतक’ (केजुअलिटी) ‘विश्वसनीयता’ की ही है। पंद्रह अगस्त पर हम सब इंतजार करते रहे कि दावे के अनुसार इस बार कश्मीर के गांव-गांव में तिरंगा फहरेगा, लेकिन इसका एक फुटेज न दिखा। राज्यपाल जी के तिरंगा लहराने की खबर अवश्य रही।

इसी तरह प्रधानमंत्री द्वारा लालकिले पर छठी बार तिरंगा लहराना और बानबे मिनट लंबा भाषण अपने आप में एक रिकार्ड रहा, जिसमें एक बार भी पाकिस्तान का जिक्र न आया। टिप्पणीकारों ने ‘भारत का बढ़ता आत्मविश्वास’ बताया!

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