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विचारधारा का प्रतिवाद है विचार-दृष्टि

विचारधारा बनाम विचार-दृष्टि: आज विचारधारा से तय होता है कि आप किधर हैं। विचारधारा आमतौर पर राजनीति के लिए इस्तेमाल होती है, पर वैचारिक आग्रहों के चलते यह साहित्य और कलाओं में भी रचना और रचनाकार के मूल्यांकन की कसौटी बनती गई। हालांकि शुरू से यह भी कहा जाता रहा है कि विचारधारा रचना की संवेदना को कुंद करती है। रचना में रचनाकार की जीवन-दृष्टि, उसकी विचार-दृष्टि महत्त्वपूर्ण होती है। आखिर दोनों में बुनियादी अंतर क्या है और विचारधारा का आग्रह कैसे रचनाकार की जीवन-दृष्टि या विचार-दृष्टि को बाधित करता है? इस बार की चर्चा इसी पर। - संपादक

Author Updated: November 18, 2018 6:40 AM
प्रतीकात्मक फोटो

आनंद कुमार सिंह

हिंदी में विचारधारा को आइडियॉलोजी के समांतर ही पहचाना गया है, लेकिन विचार-दृष्टि जैसा पद किसी खास वैचारिक उद्भावना को अलग से प्रकट नहीं करता। फिर भी, उसे विचारधारा के उलट उस उत्तर-आधुनिक विचार-प्रक्रिया का हिस्सा मानकर देखा जा सकता है, जिसमें जीवन-जगत के यथार्थ को पिछले पचासेक वर्षों से नए प्राचल पर रख कर देखने की मुहिम चल रही है। आइडियॉलोजी या विचारधारा अपने प्रारंभ में उस विचार-सरणि की प्रस्तावना करती थी, जिसमें सभी विचारों के विज्ञानों का विश्लेषणात्मक अध्ययन करने का सुभीता बना सकता हो। लेकिन, कालांतर में विचारधारा पद ही एक खास विचार-सरणि के लिए रूढ़ हो गया, जिसका आशय आज उस विचार-संकल्पना से है, जो अनिवार्यत: वामपंथी है। कह सकते हैं कि इसी के बरक्स नवीन उत्तर-आधुनिक विचार-सरणियों में ज्ञान और चिंतन के नए उन्मुक्त विचारपथ को समझने के लिए विचार-दृष्टि जैसे पद का विन्यास प्रचलन में आया है।

दरअसल, विचारधारा की आवश्यकता इसलिए पड़ी कि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जीवन-जगत को समझने और उसे व्याख्यायित करने के विचार को ठीक से देखा जाए। इसके पीछे यह मन्तव्य भी था कि दुनिया को समझने और संचालित करने के लिए जितने विचार आने थे वे सभी आ चुके हैं और उनमें से श्रेष्ठतम मत या विचार का अनुसरण करना ही आधुनिक संसार के लिए उपयोगी होगा। जैसा धर्म के क्षेत्र में इस्लाम ने दावा किया कि जो श्रेष्ठतम है वही इस्लाम है, जिसके बाद दुनिया को और किसी विचार या धर्म की जरूरत नहीं है। इस्लाम के साथ ही मनुष्यता उस निर्णायक मोड़ पर खड़ी हो गई है, जहां से एक रास्ता जाहिलियत या मूर्खता और अज्ञान का है और दूसरा रास्ता परम मुक्ति की ओर ले जाता है, जो मुसलमानों के लिए निश्चित है। यही बात कार्ल मार्क्स और उनके अनुयायियों के बारे में भी कही जा सकती है। उसने भी यही कहा कि इतिहास की श्रेष्ठतम व्याख्या मार्क्सवादी विचारधारा ही कर सकती है और यही हमारी वैचारिक यात्रा का कुल हासिल है। अत: विचारधारा का मतलब ही है कार्ल मार्क्स का चिंतन और दर्शन। पैन इस्लाम और कम्यूनिज्म का विचार इसी की उपज है। इस तरह की विचारधाराओं ने दुनिया को क्या-क्या दिया है यह सर्वज्ञात है। इसलिए नई विचार-दृष्टियों की ओर मनुष्यता स्वत: बढ़ी है, फलस्वरूप मतांधताएं और प्रतिक्रियात्मक विचार भी तेज हुए हैं।

ऐतिहासिक रूप से विचारधारा शब्द का गठन फ्रांसीसी क्रांति के दौरान अंतों देसू दि त्रेसी द्वारा उन विचार-मूल्यों के लिए किया गया था, जो प्रचलित संकीर्णताओं के विरुद्ध व्यक्तिगत आजादी तथा राज्य-तंत्र पर सांवैधानिक अधिकार पर बल देता था। नेपोलियन को तो इस शब्द से ही चिढ़ थी, जो स्वाभाविक ही उसके निरंकुश तंत्र के विरुद्ध गठित विचार था। इनके अनुयायियों को वह घृणापूर्वक ही आइडियॉलोग कहता था। मार्क्स ने इस शब्द का प्रयोग अपने विचार के प्रचारकों और अभिकर्त्ताओं के लिए किया और उन्हें क्रांति होने तक प्रतीक्षित समाज की अगुवाई करने के लिए निर्णायक कारक माना। वामपंथ में इन आइडियॉलोग्स की बहुत बड़ी भूमिका है। अंतत: उदार संकल्पनाओं के लिए त्रेसी द्वारा खोजा गया यह विचार-विज्ञान कार्ल मार्क्स के निकट वर्ग संघर्ष के राजनीतिक दर्शन में प्रयुक्त हुआ और अधिसंरचना के अंतर्गत समाज के विभिन्न हितों की सुरक्षा में विभिन्न प्रकार की विचारधाराओं का प्रयोग-उपयोग मान्य हुआ।

यद्यपि आगे चल कर वह मार्क्सवाद का प्रतिनिधि पद ही बन कर उभरा तथापि अपने मूल रूप में विचारधारा का आशय उन विभिन्न राजनीतिक विचारों से ही है, जिसके माध्यम से कोई भी समाज या समुदाय अपने स्वरूप को व्याख्यायित करता है। यह उन प्रक्रियाओं, विश्वासों और दुनियावी यथार्थ को देखने और स्वीकृत करने के लिए एक वैचारिक आश्रय या प्रस्थान है। मार्क्स के बाहर या मार्क्स के दर्शन के अंदर भी बिना विचारधारा को समझे उन मानसिक संगतियों-असंगतियों की विवेचना नहीं की जा सकती, जिससे हमारा जगत बनता है और अंत:क्रिया करता है। इसीलिए फैं्रकफुर्त स्कूल के चिंतकों ने इसको बहुत महत्त्व दिया और विचारधारा को ज्ञान का समाजशास्त्र ही कहा। टेरी ईगलटन तो इस शब्द से इतने विमोहित जान पड़ते हैं कि उसे स्वरूप-विमर्श से लेकर सामाजिक जीवन की प्रत्येक गतिविधि को जीवन-सत्य तक पहुंचाने वाला दृष्टिकोण तक कहते हैं। एक अत्याधुनिक वामपंथी स्लोवॉय जिजेक विचारधारा को किसी समाज की केवल चेतन विचारगतियों का ही नही, बल्कि, अवचेतन विचार-गतियों का भी समेकित प्रारूप कहते हैं। लेकिन यह उनके पहले लुई अल्थ्यूजर द्वारा तनिक बदले हुए रूप में पहले ही कहा जा चुका है। अल्थ्यूज ने विचारधारा को स्वतंत्र ज्ञान के समक्ष अनैतिहासिक कहा यानी इसका अपना कोई इतिहास नहीं है, क्योंकि यह किसी भी समाज की धारणाओं और उसके सामाजिक व्यवहारों का प्रतिफलन मात्र है इससे स्वत: किसी सामाजिक अवधारणा या व्यवहार का प्रवर्तन नहीं होता।

लेकिन, आज हम जानते हैं कि किसी सत्ता-तंत्र में वर्तमान या प्रचलित विचार को चुनौती कोई विचारधारा ही देती आई है। अत: उसे केवल वामपंथी आइडियॉलोजी में अपघटित करना ठीक नहीं। वह ऐतिहासिक रूप से अब भी अपनी विचार-दृष्टि को लागू करने का एक औजार है। यहां तक कि वर्तमान प्रजातांत्रिक सत्ताएं भी अपनी विचारधारा को विकसित करती हैं और उसकी घोषणा करती हैं। देखा जाए तो आज विज्ञान भी अपनी विचारधारा का प्रवर्तन कर रहा है और पर्यावरण पर जोर देना उसी विचार-दृष्टि का प्रतिफलन है। यानी कोई प्रयोगात्मक ज्ञान जब किसी निष्पत्ति पर पहुंच कर विचारों का प्रस्थान निर्मित कर लेता है, तो वह अपने आप में शक्ति संचय कर लेता है और कहने की आवश्यकता नहीं कि विचारधारा दरअसल शक्ति-संचय का जरिया है या कि सत्ता-विमर्श है। लेकिन क्या पर्यावरण के क्षेत्र में अर्न नेस द्वारा चलाया गया डीप-इकॉलोजी आंदोलन विज्ञान द्वारा प्रवर्तित सत्ता-विमर्श की कोटि में आएगा या यह मानना होगा कि इस विचारधारा का अंतिम मूल्य मानवता की व्याख्या करते हुए उसे संरक्षित करने का ही हो सकता है। तब हमें इसे प्रचलित शब्दों में विचारधारा नहीं, बल्कि उसे विचार-दृष्टि कहना पड़ेगा, जो कि आधुनिक भौतिकी के नवीन शोधकों द्वारा रेखांकित की गई है।

प्रसिद्ध भौतिकशास्त्री फ्रिजॅफ काप्रा ने अस्सी के दशक में शास्त्रीय भौतिकी की नवीन स्थापनाओं के आधार पर एक नई विचार-दृष्टि की मांग की थी। उसने कहा था कि नवीन अनुसंधानों ने स्पष्ट कर दिया है कि पुरानी दृष्टियों से नए जगत को समझना कठिन है। इसके लिए उसने इतिहास, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, धर्मदृष्टियों और आधुनिक विज्ञानों की प्राप्तियों का तुलनात्मक अध्ययन करके यह बताने की कोशिश की कि पुराने जगत की अवधारणाओं के केंद्र में यूक्लिड की रेखागणित, अरस्तू का चिंतन और देकार्त के प्रस्थान थे। अब जबकि नवीनतम अनुसंधानों के कारण शास्त्रीय विधानों को देखने-समझने के लिए निर्णायक परिवर्तन आ चुके हैं तब हमें अपनी अवधारणाओं के लिए भी नए आश्रय खोजने पड़ेंगे। उसने इसे ‘सिस्टम्स व्यू आॅफ लाइफ’ या नई व्यवस्था की जीवन-दृष्टि कहा। हम देख सकते हैं कि लगभग उसी समय उत्तर-आधुनिकता का विमर्श भी निर्मित होने लगा था। आधुनिकता से घबराए हुए यूरोपीय विचारकों को यह लगने लगा कि आधुनिकता द्वारा प्रवर्तित ज्ञान-सरणि ने मनुष्यता को मुक्त करने के स्थान पर उसे भटकाया है और उसकी ज्ञानात्मक मुक्ति संभव नहीं हो सकी है। इसलिए बजाय एक सांस्कृतिक मनुष्य में विकसित होने के मनुष्य का स्वरूप एकायामी और अधिकाधिक वस्तुगत हुआ है।

हर्बर्ट माकर््यूज ने साठ के दशक में ‘वन डायमेंशनल मैन’ में यही कहा था। इस तरह यह भी कहा जा सकता है कि विचारधारा के प्रतिवाद में आई नई उत्तर-आधुनिक विचारधारा ही वह आधुनिक विचार-दृष्टि है, जो जीवन के आत्मगत और वस्तुगत यथार्थ को एक सामंजस्य में लाना चाहती है और जीवन के ज्वलंत प्रश्नों का हल ढूंढ़ना चहती है। इसके केंद्र में भी विज्ञान के नवीन अनुसंधान ही हैं। इस दृष्टि ने भौतिकी के आलोक में जो पदार्थ का स्वरूप निर्धारित किया है उससे विचारधारा के मानने वालों का संतुलन भी गड़बड़ हो गया है। यह उनके लिए यानी विचारधारा को मानने वालों के लिए एक नई दार्शनिक चुनौती भी है।

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