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समाज: एकता और अस्मिताएं

भारत के बारे में होने वाली वैचारिक बहसें किसी भी विचारधारा से क्यों न उत्पन्न हों, इस बात पर अवश्य सहमत होती हैं कि यहां सांस्कृतिक रीति-रिवाजों, आचार-व्यवहारों और प्रतीकों की विविधता है।

Author November 11, 2018 5:25 AM
प्रतीकात्मक फोटो

ऋषभ कुमार मिश्र

भारत के बारे में होने वाली वैचारिक बहसें किसी भी विचारधारा से क्यों न उत्पन्न हों, इस बात पर अवश्य सहमत होती हैं कि यहां सांस्कृतिक रीति-रिवाजों, आचार-व्यवहारों और प्रतीकों की विविधता है। पर एक राष्ट्र-राज्य के रूप में ‘विविधता में एकता’ भारत की अद्वितीय विशेषता है। इस विशेषता को विरासत मानते हुए हम अपनी ‘परंपरा’ से जोड़ते और एक ऐसी आदर्श स्थिति की कल्पना करते हैं जहां विभिन्न सांस्कृतिक समूहों में कोई संघर्ष या द्वंद्व नहीं है और हर समूह को फलने-फूलने की सकारात्मक स्थिति उपलब्ध है। जबकि यथार्थ में यह परिकल्पना साकार होती नजर नहीं आती। ‘विविधता में एकता’ भारतीय समाज के जिन सांस्कृतिक प्रतीकों पर निर्मित है, वे इन समूहों के सामाजिक-आर्थिक संबंध को ऐतिहासिक ढंग से नहीं प्रस्तुत करते हैं। वे भारत के राजनीतिक मानचित्र पर संस्कृति के बेलबूटों के समान हैं, जिनका होना एक-दूसरे के प्रभाव से मुक्त है। जबकि समूहों के पारस्परिक संबंध और अस्मिता एक भिन्न कहानी कहते हैं। इस कहानी में सहअस्तित्व के साथ संघर्ष की भी संभावनाएं हैं।

भारत की परिकल्पना करने वालों का एक धड़ा ऐसा है जो एक धर्म, एक विश्वास, एक भाषा और एक निष्ठा के नाम पर हर विविधता को एकरूपता में बदल कर ‘वृहद् भारत’ की रचना करना चाहता है। भला कोई व्यक्ति या समूह क्यों अपनी पहचान की कीमत पर किसी ‘अन्य’ द्वारा दी गई पहचान को अपनाएगा? और अगर दबाव में अपनाएगा तो भावानात्मक संबंध स्थापित नहीं कर पाएगा। स्वाभाविक है कि यह तरीका प्रतिरोध को जन्म देगा। इससे कमजोर समूहों में न केवल डर पैदा होगा, बल्कि घृणा और हिंसात्मक प्रतिरोध की प्रवृत्तियों को बल मिलेगा। कुछ समूह अपनी विशिष्ट पहचान में भारत-बोध को अस्वीकार करना चाहते हैं। वे अपने सांस्कृतिक इतिहास के उन किस्सों-कहानियों को सर्वोपरि मानते हैं, जो उन्हें भारत से भिन्न सिद्ध करते हैं। न चाहते हुए भी यह स्वरूप एक धर्म, एक विश्वास, एक भाषा और एक निष्ठा का पूरक बन जाता है। विडंबना यह है कि ये दोनों धाराएं हर सांस्कृतिक समूह को अपनी तरफ से प्रमाणपत्र देने को उत्सुक हैं। एक तीसरी धारा ‘निरपेक्षता’ की पैरोकार है। यह संविधान सम्मत है, लेकिन इसकी उतनी स्वीकृति नहीं बन पा रही है, क्योंकि अन्य दो धाराओं ने मीडिया जैसे साधनों के प्रयोग द्वारा ऐसी संकटकालीन स्थिति का प्रोपगंडा किया है, जहां बिना मजबूत समूह के अस्तित्व का संकट दिखाया जा रहा है। इसे ही स्टेन कोहेने ने मोरल पैनिक की संज्ञा दी है।

इस तरह दो परस्पर विरोधी आख्यान एक-दूसरे के पूरक बन कर दो भिन्न राजनीतिक धाराओं को ऊर्जा दे रहे हैं। ये संवाद, सौहार्द और सह-अस्तित्व के बदले अलगाव की हर संभावना को खोजने और पुष्ट करने का कार्य कर रहे हैं। इनके प्रभाव में ही कभी क्षेत्रवाद के नाम पर लोगों को एक राज्य से खदेड़ा जाता है, तो कभी धर्म के नाम पर उन्माद फैलाया जाता है। कभी भौगोलिक अवस्थिति को मुद्दा बना कर अलग राज्य की मांग की जाती है, तो कभी भाषायी पहचान को संवैधानिक दर्जा दिलाने के नाम पर एक अलग भाषा समूह के अस्तित्व को सिद्ध किया जाता है। प्रत्येक समूह अपनी पहचान को कानूनी वैधता दिलाना चाहता है। दरअसल, ऐसा करके वे देश के हिस्से में अपना हक बढ़ाना चाहते हैं, जिसके लिए वे अपनी विशिष्ट स्थिति को न्यूनतम शर्त मान रहे हैं। इनका मानना है कि इस शर्त का पूरा होना उन्हें दूसरे सांस्कृतिक समूहों से अधिक ताकतवर बना देगा। यह ताकत देश के लिए कितनी हितकर होगी?

‘अस्मिता की राजनीति’ का एक ऐसा माहौल बन चुका है कि हर सांस्कृतिक समूह ने समुदाय के कल्याण के सापेक्ष अपने लोगों को लामबंद कर लिया है। ये अपने को समुदाय का रहनुमा घोषित कर उसे ताकतवर बनाने के लक्ष्य से जोड़ते हैं। इस लक्ष्य को वैधता देने के लिए समूह, अपने साथ हुए अन्यायों, उपेक्षा, गैर-बराबरी अवसरों की असमानता के तर्कों और प्रमाणों को प्रस्तुत करते हैं। वे अपनी सामुदायिक पहचान को सबसे ऊपर रखते हैं। वे सिद्ध करते हैं कि इस पहचान को अक्षुण्ण रखने के लिए दूसरे समूहों के हितों से टकराव अनिवार्य है। इस समूह के निर्णय ‘साझा हितों की लड़ाई’ के लिए प्रचारित किए जाते हैं, जबकि ये सत्ता और आर्थिक प्रतिष्ठानों पर वर्चस्व के लिए होते हैं। ऐसे समूह जो सामाजिक-ऐतिहासिक कारणों से पीछे छूट जाते हैं, वे सामाजिक न्याय के नाम पर अपने समूह की मांग को जायज ठहराते हैं और दूसरे समूह से अपने हितों की रक्षा के लिए लड़ने लगते हैं। इससे दूसरे समूह के रीति-रिवाजों, लोकाचारों के प्रति नकारात्मक और हेय दृष्टि पनपती है। प्राय: अस्मिता की राजनीति की शुरुआत सामाजिक आंदोलनों से होते हुए राजनीतिक हस्तक्षेप तक पहुंचती है। बाद में राजनीतिक हस्तक्षेप द्वारा बदलाव का लक्ष्य सत्ता पर कब्जा बनाने की लोलुपता में बदल जाता है। ऐसी स्थिति में अस्मिता की लड़ाई को हवा देना और उसे बनाया रखना एक राजनीतिक मजबूरी बन जाती है। इस राजनीतिक मजबूरी का प्रमाण राजनीतिक दलों की जातीय, भाषायी, धार्मिक और क्षेत्रीय संबद्धता में देख सकते हैं।

हर सांस्कृतिक समूह में यह राजनीतिक चेतना विकसित हो चुकी है कि शक्ति के केंद्रीकरण और अवसरों की असमानता की खाई को राजनीतिक व्यवस्था पर कब्जा करके पाटा जा सकता है। उनके लिए सत्ता पर कब्जा राज्य के हस्तक्षेप के रास्ते उत्पादन के साधनों पर कब्जा करना है। विडंबना यह है कि समूह विशेष में शक्ति का केंद्रीकरण ‘अन्य’ के लिए अवसरों की असमानता और शोषण के रूप में प्रकट होता है। वे इस असमानता के लिए राज्य की व्यवस्था को उत्तरदायी मानने लगते हैं। इस तरह जिस व्यवस्था को सकारात्मक भेदभाव करते हुए उपेक्षितों और शोषितों का पक्ष लेना था वह उनके विरुद्ध खड़ी हो जाती है। एक तरह से हमारी राजनीतिक चेतना प्रतिशोधात्मक बनती जा रही है। हर समूह सत्ता प्रतिष्ठानों पर वैसे ही नियंत्रण करना चाहता है जैसे इनके पूर्ववर्तियों ने किया था। तो फिर राजनीतिक चेतना के प्रसार द्वारा लोकतंत्रात्मक मूल्य व्यवस्था- स्वतंत्रता, उदारता, सहिष्णुता और बंधुत्व का क्या? गरीबी, असमानता, विस्थापन, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की चुनौतियों के समाधान का रास्ता कैसा हो? क्या ये चुनौतियां विविधता के आयाम- धर्म, क्षेत्र, भाषा और जाति के सापेक्ष केवल एक राजनीतिक मुद्दा हैं? क्या इन आयामों पर किसी समूह के पीछे रहने का कारण उनकी सांस्कृतिक अस्मिता है या वे सामाजिक-ऐतिहासिक कारण, जो आर्थिक असमानता और राजनीतिक वर्चस्व के लिए उत्तरादायी हैं? ऐसी स्थिति में एक संभावित और सबसे सरल उत्तर है कि इनका समाधान राज्य द्वारा किया जा सकता है। इस उत्तर से उत्साहवर्धक माहौल तो बनता है, लेकिन हमारे रोजमर्रा के आपसी संबंध, जो अपने समूह से भिन्न समूहों से या तो दूरी बनाए हुए हैं या उनके साथ अंत:क्रिया के दौरान संदेह का भाव रखते हैं, उसका क्या? हमें एक नागरिक बोध विकसित करने की आवश्यकता है, जिसके अनुसार साथ रहने की आवश्यकता केवल एक संप्रभु लोकतंत्रात्मक गणराज्य के नागरिक होने की मजबूरी नहीं, बल्कि यह एक भाव और अभिवृत्ति है, जो ‘भारतीय’ होने के कारण स्वाभाविक रूप से हमें एकजुट रखती है।

हमें एक नागरिक बोध विकसित करने की आवश्यकता है, जिसके अनुसार साथ रहने की आवश्यकता केवल एक संप्रभु लोकतंत्रात्मक गणराज्य के नागरिक होने की मजबूरी नहीं, बल्कि यह एक भाव और अभिवृत्ति है, जो ‘भारतीय’ होने के कारण स्वाभाविक रूप से हमें एकजुट रखती है।

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