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बाखबर: तू डाल डाल मैं पात पात

एक चैनल ने हवा में कुल आठ किस्म के जहरीले पदार्थ घुले होने का दावा कर हमारे जैसों को तो एकदम डरा दिया कि अब गए बेटा! मगर ज्यों ही हमने हवा विशेषज्ञों, एंकरों और रिपोर्टरों के स्वस्थ चेहरों को देखा, त्यों ही तसल्ली हुई कि यह सब एनजीओबाजी है।

Author Published on: November 10, 2019 2:00 AM
तीस हजारी कोर्ट परिसर में शनिवार को आमने-सामने आए थे वकील और पुलिसकर्मी। (पीटीआई फोटो)

सुधीश पचौरी

जब समाज लंपटाय जाता है तो वही होता है, जो तीस हजारी में हुआ। चैनलों ने जो सीन लाइव दिखाए, वे साफ बताते थे कि जरा-सी बात पर वकीलों और पुलिस में मारा-मारी हो गई। वकील दौड़ा-दौड़ा कर पुलिस कर्मियों को मारते दिखते थे। एक व्यक्ति सीसीटीवी का तार खींचता दिखा। कुछ वकील एक पुलिस अफसर को मारते, धक्का देते दिखे। पुलिस भी ‘एक्शन’ में दिखी, लेकिन ज्यादातर चैनलों की प्रसारित कहानी में पुलिस पर वकील हावी नजर आए।

दिन भर सब कुछ लाइव आता रहा। सब खबर चैनलों पर एक से सीन रहे। पढ़े-लिखे सभ्रांत लोग आपस में गुंथे दिखते थे! ऐसी गुंडई को देख दर्शक अफसोस और डर महसूस करते थे कि यह क्या हो रहा है? जो हमारी रक्षा के लिए नियुक्त है, वही सरेआम पिट रही है। जब पुलिस असुरक्षित है, तो बाकी की क्या औकात? हम सोचते कि क्या वकील ऐसे ही होते हैं? क्या पुलिस इतनी दयनीय है? क्या आम आदमी का अदालत जाना सुरक्षित है?

चैनलों ने जम के इस तरह की गुंडई की निंदा की। चर्चाओं में रिटायर्ड पुलिस अफसर अफसोस जताते और कहते रहे कि जो जिम्मेदार हैं उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई हो। एक एंकर कहता रहा कि यह बहुत दिनों की दमित भावना है, जो अचानक बाहर आ गई है।

पुलिस की बेचारगी अगले दिन और साफ हुई, जब दिल्ली पुलिस के अधिकांश सिपाही ड्यूटी छोड़ पुलिस मुख्यालय के सामने बारह घंटे तक न्याय की गुहार लगाते रहे। ये दृश्य अभूतपूर्व किंतु भीषण थे। आइटीओ की सड़कें पुलिस वालों से भरी थीं उनके बीवी बच्चे तक न्याय की मांग की पट्टी लिए नारे लगाते थे। चैनलों में पूरे दिन बार-बार प्रसारित उनकी पिटाई ने उनको अपमानबोध और क्षोभ से भर दिया था। यह इतना अधिक था कि जब पुलिस आयुक्त उनको शांत करने आए। पुलिसवालों ने उन तक को ‘हूट’ किया। फिर एक के बाद एक कई जूनियर अफसरों ने पुलिसवालों को समझाना चाहा। वे तब भी न माने। उनका कहना था कि जो सबकी रक्षा के लिए हैं, अगर वही असुरक्षित हैं, तो उनकी सुरक्षा कौन करेगा? हमारे कई अफसरों को मारा गया, उनको चोटें आर्इं। पुलिस की गाड़ियां जलाई गर्इं। उनकी बंदूकें छीनने की कोशिश की गई। वे अपने दो अफसरों के सस्पेन्शन से नाराज थे। उनके बड़े अधिकारी उनको न्याय दिलाने के लिए बड़ी अदालत में अपील नहीं किए, इस पर वे बहुत नाराज थे।

शाम को सारे सीन इंडिया गेट से आए। देर तक वहां भी प्रदर्शन किया, उनकी नाराजी बनी रही। मुश्किल से वे वहां से टले। इस बीच साकेत कोर्ट के वीडियो ने बहुत कुछ प्रमाणित कर दिया। सीन में आन ड्यूटी, अपनी मोटर साइकिल पर सवार एक पुलिस अफसर की पीठ पर सफेद कमीज पहने एक तगड़े से आदमी ने पहले दो बार कोहनी मारी, फिर गाल पर दो तमाचे मारे, फिर उसे हेलमेट मारा। जवाब में उसने मोटर सइकिल भगा कर अपनी जान बचाई!

तीस हजारी का एक और वीडियो फुटेज दिखा कर एक एंकर ने बताया कि किस तरह कुछ वकील एक महिला पुलिस अधिकारी का कालर खींचते हुए उसे धकियाते दिखे। प्रतिक्रिया में अगला दिन वकीलों का रहा था। उन्होंने दिल्ली की सभी अदालतों के अंदर पुलिस की ज्यादती के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किए। कैमरों में आकर वकील पुलिस की क्रूरता के बारे में बताते रहे और न्याय की मांग करते रहे। उसके बाद यह कहानी जांच समिति के हवाले हो गई और खबर खामोश हो गई।

लेकिन तीस हजारी कांड ने एक उपकार किया। दिल्ली की हवा के जहरीलेपन के सूचकांक को व्यवसाय बना देने वाले एनजीओज और एंकरों-रिपोर्टरों की सारी हवा निकाल दी। ऐसा लगा कि उस दिन दिल्ली की हवा शुद्ध हो गई हो। तीस हजारी की कहानी ने हवा की कहानी बजाने ही नहीं दी, लेकिन जैसे ही दिन गुजरा दिल्ली की हवा को अति जहरीला सिद्ध करने वाले आ बैठे। एक चैनल ने हवा में कुल आठ किस्म के जहरीले पदार्थ घुले होने का दावा कर हमारे जैसों को तो एकदम डरा दिया कि अब गए बेटा! मगर ज्यों ही हमने हवा विशेषज्ञों, एंकरों और रिपोर्टरों के स्वस्थ चेहरों को देखा, त्यों ही तसल्ली हुई कि यह सब एनजीओबाजी है। अगर हवा इतनी ही जहरीली होती तो उसे रिपोर्ट करने वाले क्या अब तक रिपोर्ट करने लायक होते?

यारो! प्रदूषण को राक्षस बना कर ‘मास्क’ और ‘एअर प्यूरीफायर’ न बेचो। जो क्रिकेटर कल तक धुंए के खतरे बेचता था, आजकल एअरप्यूरीफायर बेचता नजर आता है। आदरणीय मुफ्त में तो कृपा न कर रहे होंगे! यह सब कुछ नखरे वाली नाजुक मिजाज मध्यवर्ग की खातिर और उसी के नजरिए से किया जा रहा है। दिल्ली में जो लाखों मजदूर किसान रिक्शेवाले, आटोवाले, झल्लीवाले खोंमचेवाले आदि को रोज कमाना-खाना है, तुम्हारी खतरनाक कहानी में वह कैसे जिंदा है इसकी तो बात करो!

लेकिन इस बार के अभियान ने भक्त और भगवान तक को डरा दिया और वाराणसी के शिवभक्तों ने जहरीली हवा से बचाने के लिए शिवलिंग को भी मास्क पहना दिया! क्यों न पहनाएं! जब नंदी दूध पी सकते हैं, तो भगवान भी जहरीली हवा की चपेट में आ सकते हैं! इसे कहते हैं भक्ति की भक्ति और मजाक का मजाक! यह सप्ताह महाबली भाजपा की रोज की महाफजीहत देखने में गुजरा। धन्य है शिवसेना कि उसने बिग ब्रदर की सारी अकड़ निकाल दी। संजय राउत रोज सीएम के लिए ‘पूर्व निश्चित’ फिफ्टी-फिफ्टी की शर्त रखते रहे और रोज भाजपा प्रवक्ता चैनलों के जरिए अपनों को तसल्ली देते रहे कि जल्दी ही फडणवीस की सरकार बन जाएगी!

मगर अभी तक सब कुछ अधर में है! एबीपी ने बताया कि शनिवार तक सरकार बन जानी जरूरी है, वरना राष्ट्रपति शासन लग जाना है! इस बीच शिवसेना ने अपने विधायकों को पांच सितारा होटल में टिका कर पोचिंग के रास्ते भी बंद कर दिए। तू डाल डाल मैं पात पात इसी को कहते हैं।

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