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बाखबर: रंगों की राजनीति

इसी श्रेणी की तीसरी खबर बनाई टीएमसी की नई सांसद नुसरत जहां ने जगन्नाथ रथयात्रा में बिंदी और सिंदूर लगा कर हिंदू विधि से नारियल फोड़ कर पूजा करके। संग में रहीं ममता दीदी। चैनल लाइन लगाने लगे: ‘हार के बाद ममता दीदी की हिंदू वोटरों को रिझाने की कोशिश’!

Author July 7, 2019 2:34 AM
कोलकाता की जगन्नाथ रथ यात्रा में ममता बनर्जी ने भी नुसरत जहां के साथ पूजा अर्चना की।

उस रोज अपने लल्ला जी ने बल्ला घुमा कर जरा-सा ‘निवदेन, आवेदन और दनादन’ ही तो किया था कि जोर की डांट पड़ गई कि किसी का बेटा होने पर कोई मनमानी करे, इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। उसे बर्खास्त कर देना चाहिए। लेकिन चैनलों ने यह भी न बताया कि इसके बाद लल्ला जी को ‘निकाला’ गया कि नहीं!

लेकिन लल्ला जी की इस बल्ला लीला का मुकाबला किया कांग्रेस के नए एमएलए की कीचड़ लीला ने। कांग्रेस के होनहार लल्ला जी ने आव देखा न ताव, कीचड़ से भरी एक बाल्टी एक इंजीनियर पर उड़ेल दी और कहा कि जो इंजीनियर काम नहीं करता उसके साथ ऐसा ही करना चाहिए। कुछ न करने के ‘अपराध’ में जनता एक दिन आपके साथ ऐसा ही करने लगी तो आपका क्या होगा? ऐसी कहानियां अपने एंकरों को शिष्टाचारी बना देती हैं, जबकि ज्यों ही धर्म की खबर आती है, यही शिष्टाचारी अपनी बहसों को ‘धर्मयुद्ध’ में बदल देते हैं।

नए धार्मिक तनाव की पहली खबर दिल्ली के हौजकाजी मोहल्ले से आई। दो पड़ोसियों में एक ने अपना दोपहिया वाहन एक के घर के नीचे खड़ा कर दिया, जिस पर आपत्ति की गई। जब नहीं हटाया गया तो तू-तू मैं-मैं हुई। उसके बाद एक गली से पत्थरबाज निकल पड़े और गली का एक मंदिर तोड़ दिया गया। एक दल की प्रवक्ता उस नेता को बिना जांच के दोषी बताती रही जो शायद मौका-ए-वारदात पर सबसे पहले पहुंचा।

पूरे तीन दिन धार्मिक तनाव की कहानी जमी रही। हर रिपोर्टर उस गली में इस अदा से खड़ा होकर आखों देखा हाल सुनाता, मानो किसी ‘वार जोन’ से खबर दे रहा हो। इन दिनों पत्ता भी खड़कता है तो बहसों में धार्मिक आयाम ले लेता है। बहसों को इतना तुरंता और सरल बना लिया गया है कि जरा-सी खबर को भी एंकर हिंदू-मुसलमान में विभाजित कर देते हैं। जितनी घृणा वास्तविक कहानी में नहीं होती, उससे अधिक बहसों से बरसने लगती है।

इस सप्ताह की ऐसी ही कुछ और खबरों को याद करें:
यों तो भारतीय क्रिकेट की टीम को नारंगी जरसी पहनाने की खबर ने ही रंग की राजनीति शुरू कर दी थी, लेकिन जब टीम हार गई तो मायावती जी ने नारंगी रंग पर चुटकी लेते हुए यह कह दिया कि नारंगी रंग की जरसी की वजह से टीम हारी; यानी जब तक नीले रंग की जरसी रही, तब तक टीम जीतती रही। और चैनलों की बहसों में यह कमेंट तुरंत रंग की राजनीति बन उठा। इसके बाद महबूबा ने भी ऐसा ही कटाक्ष कर दिया कि हार की वजह नांरगी रंग रहा।

शाम तक नांरगी रंग चैनलों में भगवा रंग कहलाने लगा। एक चैनल की बहस में तो रंगों की राजनीति खुल कर खेली। हरे का मतलब इस्लाम और भगवा का मतलब हिंदू हो गया। धार्मिक विभाजन के ‘पुण्यकर्म’ कुछ पहले तक कुछ खास हिंदू और मुसलमान नेता किया करते थे, अब उसी काम को एंकर करते हैं।

एक दिन ऐसी ही एक धार्मिक खबर बनाई जायरा वसीम ने कि बॉलीवुड उसके लिए नहीं है। वह उसके और अल्लाह के बीच बाधा है। हर बहस में दो-तीन हिंदू चेहरों के बरक्स दो-तीन मुसलमान चेहरे होते। सभी को ‘फ्री स्टाइल फाइट’ के लिए अखाड़े में छोड़ दिया जाता। एक कहता कि फिल्मों में काम करना इस्लाम के विरुद्ध है। वह अल्लाह के रास्ते से भटक गई थी। दूसरा कहता कि जब ‘दंगल’ में काम किया, तब आप कहां थे? तब विरोध क्यों नहीं किया। एक चैनल ने बताया कि एक अभिनेता ने ट्वीट कर कहा कि वे समझते हैं कि उस पर बॉलीवुड छोड़ने के लिए दबाव डाला गया है। अंग्रेजी चैनल के एक एंकर ने बहस के शुरू में साफ कर दिया कि जायरा पर इस्लामवादियों का दबाव था कि फिल्में छोड़े। यह दबाव भगवा वालों ने नहीं डाला। उसके बाद तत्त्ववादी कहने लगे कि औरतों का सिनेमा में काम करना इस्लाम के विरुद्ध है।

कल तक जो विचारक लिबरल दिखता था, वह बोला कि औरतों को जिस्म की नुमाइश नहीं करनी चाहिए। इस पर हमेशा भड़का हुआ नजर आने वाला एंकर और भी भड़क उठा और चीखने लगा, मानो जायरा के ट्वीट का चश्मदीद गवाह हो कि जायरा को जबरिया मजबूर किया गया कि वह अपने को ‘अटैक’ करे। धर्मतत्त्ववादियों ने उसे डरा-धमका के लिखवाया। कहां है लिबरल लॉबी? एक चैनल पर खबर रही कि जायरा की नई फिल्म आने वाली है। यह सब उसकी पब्लिसिटी के लिए है।

इस तरह पहले हाय-हाय, फिर वाह-वाह! पहले गुस्सा और धार्मिक घृणा और फिर उसके जरिए मार्केटिंग! हमारा गुस्सा और हमारी घृणा भी एक ‘परफॉमेंस’ है। इसी श्रेणी की तीसरी खबर बनाई टीएमसी की नई सांसद नुसरत जहां ने जगन्नाथ रथयात्रा में बिंदी और सिंदूर लगा कर हिंदू विधि से नारियल फोड़ कर पूजा करके। संग में रहीं ममता दीदी। चैनल लाइन लगाने लगे: ‘हार के बाद ममता दीदी की हिंदू वोटरों को रिझाने की कोशिश’! ‘बीजेपी के डर से ममता हिंदुओं को लुभा रही हैं’।

 

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