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बाखबर: शांतम् पापम् शांतम्

बोले हुए शब्द को ‘शांत’ करना टीवी दर्शकों का सारा मजा खराब कर देता है। सड़क की भाषा ही राजनीतिक भाषा है। जमीन पर वही चलती है। उसे जितना ‘शांत’ किया जाता है उतनी ही उत्सुकता बढ़ती है। ‘सेंसर्ड डायलाग’ हमारी कल्पना को और भी उत्तेजित कर देते हैं और हम अपने मन मुताबिक रिक्त स्थान की पूर्ति करने लगते हैं।

Author April 21, 2019 3:07 AM
चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और बसपा प्रमुख मायावती को सांप्रदायिक बयान देने के कारण अलग-अलग अवधि के लिए चुनाव प्रचार करने से रोक दिया है।

कैसा उत्तप्त मौसम है कि जब तक हमारे नेता हिंदू-मुसलमान न करें, जब तक वे धार्मिक ‘हेट स्पीच’ न दें, जब तक आप खुलेआम डराते, धमकाते और गरियाते नहीं, तब तक उनको लगता है कि वोट नहीं मिलने वाले!  इधर हिंदू-मुसमलान किया, एक खास समुदाय को ‘टारगेट’ कर धमकाया-गरियाया और धार्मिक प्रतीकों को लेकर ‘कम्यूनल हेट स्पीच’ मारी और उधर उन एंकरों ने बड़ी खबर बनाई और आप अपनी ‘हेट’ और अपनी दबंगई के लिए दो दिन तक खबर चैनलों की विचारणीय समस्या बने रहे। जितनी देर विचारणीय रहे, उतनी देर आप चर्चा में रहे!

एक दिन मायावती जी ने एक चुनावी रैली में मुसलमानों को लक्षित कर कह दिया कि मुसलमान एकजुट होकर गठबंधन को वोट करें। एंकरों और रकीबों ने धर पकड़ा कि ये तो घोर कम्यूनल बात है। यह जनता को बांटने वाली है। चुनाव आयोग संज्ञान ले। आयोग ने शिकायत का संज्ञान लिया और मायावती को अड़तालीस घंटे के लिए प्रचार करने से मना कर दिया!

इस सप्ताह सप्रमाण सिद्ध हुआ कि हमारे नेताओं को भी कवि हृदय मिला है। एक दिन योगी जी ने अपनी प्रिय तुकांत काव्यपंक्ति को रैली में सुना दिया कि ‘उनके अली, हमारे बजंरग बली’! चैनलों को यह इतनी भाई कि उनने बार-बार बजाया और जैसे ही सुनाई पड़ा वैसे ही अन्य नेताओं का आशुकवि जाग गया और वे भी अपनी तुकों को लेकर आ जुटे!

इस काव्य प्रतियोगिता में सबसे आगे रहे आजम खान। एक रैली में बोले कि चलो झगड़ा ही खत्म करते हैं। बजरंग बली की जगह ‘बजंरग अली’ कर लेते हैं। उनके तुकांत प्रेमियों ने ताली मारी! राष्ट्रीय चुनावों में चलते ये प्रेम-घृणा के विमर्श न हों, तो चुनाव कितने मनहूस हो जाएं! मगर अन्याय तो देखिए कि जलोकड़ों ने योगी जी के खिलाफ शिकायत की और चुनाव आयोग ने उनको बहत्तर घंटे के लिए प्रचार से विरत कर दिया! ‘अली बजरंगबली’ के कंपटीशन में माया जी आर्इं और बोलीं कि ‘अली भी हमारे, बजरंग बली भी हमारे’ लेकिन तब तक तुकबंदी बोर करने लगी थी, इसलिए चैनलों ने भी ध्यान नहीं दिया!

‘हेट स्पीच’ के इस बौखलाए मौसम में भी सबसे उत्तम प्रेमाख्यान कहा एक मंत्री जी ने अपनी एक रैली में। उन्होंने वोटरों को दोटूक शब्दों में समझाया कि वोट नहीं तो काम नहीं। इस हाथ ले, उस हाथ दे, सीधा डील है। वोट दोगे तो तुम्हारा काम होगा। उनका टारगेट रहा एक खास समुदाय! भक्त एंकर तक चीख पड़े कि ये क्या-क्या बोला जा रहा है? लेकिन क्या गलत बोला? सीधी बात : जो वोट देगा उसका काम होगा, जो नहीं दे उसका क्यों हो। एक एंकर ने ताना मारा कि क्या यही है ‘सबका साथ सबका विकास’ कि जो हमारा विकास न करेगा, हम उसका क्यों करें?

ऐसे प्यारे वचन और फिर भी रकीबों को शिकायत! कहां तक चुप रहता चुनाव आयोग। मंत्री को अड़तालीस घंटे प्रचार से विरत रहने की सलाह देनी ही पड़ी!
आजम खान एक दिन फिर अपनी फार्म में आए और इस बार आए तो ऐसे आए कि चैनलों को उनके कुछ शब्दों को ‘शांत’ करना पड़ा। फिर भी जो सुनाई पड़ा वह स्त्रीत्ववादी विमर्श को हिलाने के लिए काफी था। आजम खान के एक-एक वाक्य में शुद्ध सेक्सिस्ट मर्दवाद बोला। उनके गर्हित निहितार्थ अश्रुतपूर्व थे।
क्षुब्ध और रुष्ट जयाप्रदा लगभग हर टीवी पर अपने ‘हेरासमेंट’ की कहानी दृढ़ता से कहती रहीं। हर चैनल पर आजम खान की निंदा हुई। लेकिन सपा का भी जवाब नहीं। आजम की रक्षा में उतरे सपा के नेताओं ने तिनके की आड़ ली कि उनने किसी का नाम नहीं लिया!

यानी ‘शांतम् पापम् शांतम्’!

आजम खान के जवाब में जब अमर सिंह जी आए, तो उन्होंने कुछ ऐसा तिक्त बोल दिया कि चैनलों को उस शब्द को भी ‘शांत’ करना पड़ा! उधर, आयोग ने गर्हित और सेक्सिस्ट भाषा के लिए आजम खान को चुनाच प्रचार से अड़तालीस घंटे के लिए विरत कर दिया।
शांतम् पापम् शांतम्!

बोले हुए शब्द को ‘शांत’ करना टीवी दर्शकों का सारा मजा खराब कर देता है। सड़क की भाषा ही राजनीतिक भाषा है। जमीन पर वही चलती है। उसे जितना ‘शांत’ किया जाता है उतनी ही उत्सुकता बढ़ती है। ‘सेंसर्ड डायलाग’ हमारी कल्पना को और भी उत्तेजित कर देते हैं और हम अपने मन मुताबिक रिक्त स्थान की पूर्ति करने लगते हैं। क्रोध और घृणा का अखाड़ा खुला रहता है। फिर भी : शांतम् पापम् शांतम्!

यों इसी ‘हेट सीजन’ में रिपब्लिक टीवी ने दिखाया कि राजस्थान के पूर्व मंत्री कटारिया जी कह रहे हैं कि मुसलमान बारह-बारह बच्चे पैदा करते हैं। ऐसा ही रहा तो दो हजार सत्तर तक भारत का एक और विभाजन हो जाएगा! लेकिन बाकी चैनलों ने इसे लिफ्ट नहीं दी! और यह घृणा-बयान अपनी मौत मर गया!
शांतम् पापम् शांतम्!  एक हेट स्पीच केरल के भाजपा के एक नेता ने दिया कि मुसलमान का कपड़ा उतारो उसकी पहचान हो जाएगी! एक चैनल ने इसे अपने ‘हाउस आफ शेम’ में जगह दी! शांतम् पापम् शांतम्!

चुनाव आयोग भी क्या करे? एक चैनल ने खबर दी कि नमो टीवी जस का तस दिख रहा है। किसे-किसे रोके आयोग! शांतम् पापम् शांतम्!
साध्वी प्रज्ञा सिंह का बोलना कुछ पुरानी साध्वियों के ओजस्वी भाषणों की याद दिला गया! एक चैनल ने उनकी स्पीच दिखाई, जिसमें उन्होंने जेल में लंबे समय तक हुए अत्याचारों का वर्णन किया और फिर अत्याचारों के आगे न झुकने का दावा कर इस चुनाव को ‘धर्मयुद्ध’ बताया! उनकी कहानी श्रोताओं में हमदर्दी पैदा करने वाली थी।
दिग्विजय जी सावधान!

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