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बाखबर: हिंदी की टांग तोड़ते हुए

सीबीआइ टीम की जैसी किरकिरी कोलकाता की सरकार और पुलिस ने की, वह अभूतपूर्व थी। कोलकाता के बड़े पुलिस अफसर को ‘पकड़ने’ गए सीबीआइ वालों को जिस तरह से कोलकाता पुलिस ने हिरासत में लिया और जवाबी हमले में ममता खुद तुरंत धरने पर बैठ गर्इं, वह देखते बनता था।

Author February 10, 2019 5:47 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: pixabay)

हम सड़क छाप हैं, गली छाप हैं। एक चैनल पर एक बंधु इसी पर फैल गए कि ये सड़क छाप तो आम आदमी ही है, आप उसकी खिल्ली उड़ाने वाले कौन हैं? बहस में शामिल सब इतने उत्तेजित होते हैं कि यह भी भूल जाते हैं कि मुद्दा बहस के शिष्टाचार का था, शिष्ट भाषा की बात थी, नागरिक शिष्टाचार की दरकार थी और इसीलिए सड़क छाप भाषा का आरोप लगाया गया! लेकिन इस अशिष्ट भाषा को सुनने के हम न जाने कब से आदी हो चले हैं कि अगर किसी बहस में यह भाषा न सुनाई दे, तो लगता है कि गलत चैनल लग गया है। दिन में संसद से सड़क तक कुछ हो, शाम को जब दस विचारक बैठते हैं तो घटिया से घटिया स्तर पर आकर बहस करने लगते हैं। एंकर भी यही चाहते होते हैं। जब तक कोई किसी को दो-चार मोटी-मोटी गाली न दे ले, झूठा, मक्कार, चोर, उचक्का, भ्रष्ट-महाभ्रष्ट न कह ले, तब तक बहस ‘उठती’ ही नहीं।

जब तक किसी बहस में दो-चार झपटने वाले न हों, गाली देने वाले न हों, तब तक बहस का ‘पीक टाइम’ नहीं आता। आरोप लगा और भूल जा! गाली दे और भूल जा!एंकर फिर बुलएंगे, क्योंकि तेरी गालियां ही उसको रोटी-रोजी देती हैं! वइस दिनों का सबसे अधिक बोला जाने वाला शब्द है ‘चोर’!

‘चौकीदार चोर है।’ ‘चोर चौकीदार से डरते हैं’। ऐसे जुमले में बहुत कुछ मजाहिया है, लेकिन हमारी फूहड़ बहसें एक मस्त मजाक तक पैदा नहीं कर पातीं। इस बीच कोलकाता वाला धरना ड्रामा निपट चुका था! कोलकाता के ड्रामे ने साफ कर दिया कि ममता से पार पाना केंद्र सरकार के लिए फिलहाल टेढ़ी खीर है! सीबीआइ टीम की जैसी किरकिरी कोलकाता की सरकार और पुलिस ने की, वह अभूतपूर्व थी। कोलकाता के बड़े पुलिस अफसर को ‘पकड़ने’ गए सीबीआइ वालों को जिस तरह से कोलकाता पुलिस ने हिरासत में लिया और जवाबी हमले में ममता खुद तुरंत धरने पर बैठ गर्इं, वह देखते बनता था। देर तक यह सब न केंद्र की समझ में आया, न सीबीआइ की समझ में आया, न एंकरों की समझ में आया कि ये क्या हो रहा है? ममता एक बार फिर अपने ‘स्ट्रीट फाइटर’ के अवतार में सामने आर्इं। उनके इस छिन्नमस्ता रूप ने सीबीआइ का सारा रुतबा हवा कर दिया।

भाजपा प्रवक्ता रोते रहे कि देखो देखो कानून की धज्जियां उड़ रही हैं। देखिए संविधान तोड़ा जा रहा है। सीबीआइ को पुलिस ने हिरासत में ले लिया है। धक्का-मुक्की हुई है और ममता पुलिस का हौसला बढ़ा रही हैं।… ऐसे कैसे चलेगा? सीन में गरमी बढ़ती रही। गृहमंत्री ने फोन कर बात की कि क्या हो रहा है कि ममता ने पारा ऊपर चढ़ाया और कह दिया कि संविधान की रक्षा में वही धरने पर बैठेंगी। संविधान खतरे में है और सरकार भी वहीं से चलेगी और लीजिए कैबिनेट की मीटिंग वहीं और बजट की फाइल वहीं ओके, और क्या चाहिए? ममता के इस प्रतिरोध ने उनके अब तक के सारे ‘क्रिटीक’ धो डाले। इसके बाद एंकर लगे रहे कि वे पीएम की अपनी दावेदारी बढ़ाने के लिए यह शो कर रही हैं।…
एक निहायत गैर-हमदर्द मीडिया तक ममता का कुछ न कर सका। उनके नारे सामने थे: ‘दो हजार उन्नीस बीजेपी फिनिश’!

पीएम के संसदीय प्रतिउत्तर के बाद के सन्नाटे में अचानक राहुल ने एक त्वरित प्रेस कान्फ्रेंस करके राफेल मुद्दे को एक बार फिर ताजा कर दिया। राहुल जब भी पे्रस कान्फ्रेंस में आते हैं, तो कुछ चुटकी लेते हुए आते हैं। इस बार उनके पास ‘द हिंदू’ में छपा पत्र था, जिसमें रक्षा मंत्रालय द्वारा राफेल डील में पीएमओ के ‘समांतर हस्तक्षेप’ करने पर आपत्ति किए जाने की खबर थी। राहुल आए। पत्र पढ़ा और खेल खत्म, कि सिद्ध है कि ‘चौकीदार चोर है’ ‘ये मैं नहीं बोल रहा हूं ये लेटर बोल रहा है। आप पढ़ लें और उनसे इसका जवाब मांगें।… आप वाड्रा या चिदंबदरम या जो भी हों, उनकी जांच कराएं, लेकिन राफेल के इस पत्र की जांच भी तो करें!

उक्त ‘पत्र’ के आरोप का जवाब देने की जगह भाजपा के प्रवक्ता राहुल को लथेड़ते रहे कि उनका मानिसक संतलुन ठीक नहीं, कि वे प्रलाप करते हैं, कि भ्रष्ट हैं, कि स्वयं बेल पर हैं। लेकिन जब एंकर ने पूछा कि हिंदू में छपे पत्र का जवाब क्या है? तो कहीं जवाब नहीं आया! हां, तू तू मैं मैं जारी रही। संसद में शोर रहा, सब तरफ चोर चोर का शोर रहा! संसद में बहस जारी रही।
बहरहाल, एक नामी अंग्रेजी चैनल ‘हिंदी हो जाए’ कहते-कहते हिंदी में आ चुका है। मुखिया एंकर अंग्रेजी वाले ही हैं। एक बहस में वे बोलने लगे कि मैं ‘मुद्दे’ को ‘परिप्रेक्ष्य’ में रख रहा हूं। फिर बोलते-बोलते बोले कि मैं उसकी ‘धरोहर’ बना रहा हूं!

दिमाग अंग्रेजी वाला और काम करना पड़े हिंदी में तो यही दुर्गत होती है। सर जी हिंदी की ऐसे टांग न तोड़ें! उस पर कुछ रहम करें। उसे ‘घर की मुर्गी दाल बराबर’ न समझें। उसे भी सीखना होता है। सीखने में शर्म कैसी? जग हंसाई से बचना है तो हिंदी का कोई ‘क्रैशकोर्स’ ही कर लें!
और कांग्रेस को चाहिए कि अपने थरूर साहब के ‘हिंदी-बोध’ को भी ‘दुरुस्त’ करा लें!

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