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हमने असम का पहिया दूसरी ओर घुमा दिया है

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री व कांग्रेस के असम मामलों के प्रभारी हरीश रावत दावा करते हैं कि कांग्रेस ने असम का पहिया दूसरी ओर घुमा दिया है और हम पूर्वोत्तर की 25 में से कम से कम 12 से 15 सीटें जीतेंगे। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी ने किसानों से लेकर बेरोजगारी तक के मसलों का कथ्य तैयार किया है। आगामी चुनावों में विपक्ष की तैयारी को लेकर बातचीत के कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

हरीश रावत (सोर्स- आरुष चोपड़ा)

हरीश रावत उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में जन्मे हरीश रावत कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में शुमार किए जाते हैं। वे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री और केंद्र सरकार में मंत्री रह चुके हैं। विद्यार्थी जीवन में ही भारतीय युवा कांग्रेस की सदस्यता लेने वाले रावत ने ब्लॉक स्तर से सक्रिय राजनीति की शुरुआत की। इसके बाद वे जिला अध्यक्ष बने। 1973 में कांग्रेस की जिला युवा इकाई के प्रमुख चुने गए। 1980 में श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के कैबिनेट राज्यमंत्री बने। उन्होंने 7वें लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर उत्तराखंड की हरिद्वार लोकसभा सीट से जीत हासिल की। 1990 में वे संचार मंत्री बने। 2001 में उन्हें उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। रावत पांच बार सांसद रह चुके हैं। रावत को 2002 में राज्यसभा के लिए चुना गया और 2009 में एक बार फिर श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के राज्यमंत्री बने। 2011 में उन्हें राज्यमंत्री, कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के साथ संसदीय कार्यमंत्री का कार्यभार सौंपा गया। वे अभी कांग्रेस के महासचिव हैं और उन्हें  असम का प्रभारी बनाया गया है।

मनोज मिश्र : उत्तराखंड की एक बड़ी समस्या पलायन है। गांव के गांव खाली हो रहे हैं। क्या इसका कोई समाधान हो सकता है?
हरीश रावत : पलायन केवल एक जगह नहीं हो रहा। ग्रामीण से शहरी क्षेत्र, हर जगह पलायन देखने को मिल रहा है। जब तक ग्रामीण सुविधाओं का विस्तार नहीं होता, गांवों में रोजगार के साधन नहीं विकसित होते और इससे आगे बढ़कर जब तक आप साधनों को आमदनीपरक नहीं बनाएंगे तब तक यह पलायन जारी रहेगा। उत्तराखंड में दो प्रकार का पलायन है। एक वर्ग अच्छे अवसर की तलाश में, बच्चों की अच्छी पढ़ाई के लिए, चिकित्सा के लिए निकलता है। दूसरे वे लोग हैं जिनके पास कोई और विकल्प नहीं है। मुख्यमंत्री रहते हुए मैंने ऐसे लोगों की आमदनी पांच गुना बढ़ाई। वहां सबसे ज्यादा पैदा होने वाला अनाज है मडुआ (रागी)। इसे हमने आंगनबाड़ी, अस्पतालों, पुलिस लाइन और जेल की खाद्य व्यवस्था के साथ जोड़ अर्थव्यवस्था में शामिल किया। नतीजतन मडुए की एकदम से मांग बढ़ी और इसकी कीमत पांच-छह रुपए किलो से बढ़कर 20-25 रुपए किलो हो गई। आज वही मडुआ वहां पर न्यूनतम 40 रुपए किलो बिक रहा है।

अजय पांडेय : भाजपा ने पूर्वोत्तर की 25 संसदीय सीटों में से 21 सीटें जीतने का लक्ष्य तय किया है। इसके जवाब में कांग्रेस की क्या रणनीति है?
’देखिए, उनको बड़ी निराशा हाथ लगने वाली है। असम में वे तीन से ऊपर नहीं जाएंगे। पूर्वोत्तर में भी ज्यादातर सीटें या तो हमारे पास आएंगी या दूसरे दलों के पास जाएंगी। अभी वहां दिल्ली की सत्ता का गठबंधन है। अब जैसे ही भाजपा कमजोर दिखेगी तो पूर्वोत्तर आपको पूरा यू टर्न करता हुआ दिखाई देगा। हमने असम का पहिया दूसरी ओर घुमा दिया है। हम पूर्वोत्तर की 25 में से कम से कम 12 से 15 सीटें जीतेंगे।

अनिल बंसल : लेकिन उत्तराखंड में कांग्रेस के सारे नेता पार्टी छोड़कर भाजपा में जा रहे हैं?
’ इधर तो कोई नेता नहीं गया है। पूर्वोत्तर में अब तो उधर से इधर की ओर लोग आ रहे हैं।
अजय पांडेय : बदरुद्दीन अजमल कह रहे हैं कि कांग्रेस से गठबंधन का कोई ठिकाना नहीं है। वे यह भी कह रहे हैं कि कांग्रेस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। आप क्या कहेंगे?
’देखिए, हम उनके साथ गठबंधन नहीं कर रहे हैं। लेकिन उनसे हमारा कोई वैमनस्य भी नहीं है। वे राष्टीय स्तर पर हमारे यूपीए का हिस्सा हैं। हमें एक-दूसरे का मान-सम्मान बनाकर रखना चाहिए।

आर्येंद्र उपाध्याय : लेकिन 2009 में आप लोग मिलकर लड़े थे तो परिणाम अच्छा हुआ था?
’देखिए भाजपा ने पूरे समाज का जिस तरीके से बंटवारा कर दिया है, उसमें आपको कभी-कभी तय फार्मूले से अलग हटकर भी काम करना पड़ता है। हमारी नीतियां कभी तुष्टिकरण की रही भी नहीं। हम तो अपने संविधान के अनुरूप आचरण कर रहे हैं। अब भाजपा हम पर तरह-तरह के तुष्टिकरण का ठप्पा लगाती रहती है तो यह उसका अपना ठप्पा है। हम उससे कतई सहमत नहीं हैं।

दीपक रस्तोगी: असम व समूचे पूर्वोत्तर में एनआरसी के मुद्दे पर भाजपा सकते में हैं और कांग्रेस असमंजस में क्यों है ?
’हम एनआरसी को लेकर बिल्कुल भी असमंजस में नहीं हैं। एनआरसी कांग्रेस की सोच के बाद सामने आया है। 80 फीसद काम हमारे कार्यकाल में हुआ। कांग्रेस का स्पष्ट कहना है कि जो भारत का नागरिक है, वह इसमें सम्मिलित होगा और पहचान के लिए कानून अपना काम करेगा। लेकिन यह सुनिश्चित किया जाएगा कि जो भारत का नागरिक है उसे किसी भी प्रकार परेशान नहीं किया जाए। चाहे वह किसी भी धर्म का हो। हम आपको यह भी बता दें कि कांग्रेस कभी भी भावनात्मक मुद्दों को प्रश्रय नहीं देती। और जब-जब इस देश में भावनात्मक मुद्दों को आगे बढ़ाने की कोशिश की गई तो संवैधानिक व्यवस्था कमजोर हुई है। हमने हमेशा वास्तविकता के आधार पर मुद्दों का हल ढूंढ़ने की कोशिश की है। विकास के मुद्दे पर भाजपा पूर्वोत्तर में घुसी जरूर लेकिन दिया कुछ नहीं, बल्कि छीन लिया।

मृणाल वल्लरी : कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की आवाज समूचे विपक्ष की आवाज नहीं बन पा रही है। ऐसा क्यों?
’हम यूपीए का संचालन करते हुए भी बराबर के भागीदार रहे। रहा सवाल मुद्दों का तो राष्टÑीय स्तर पर विपक्ष का पक्ष, उसका रुख तय करने की जिम्मेदारी कांग्रेस पर या हमारे नेता राहुल गांधी पर है। चाहे सामाजिक-आर्थिक मामले हों, सांस्कृतिक मामले हों या भावनात्मक नैरेटिव हों, सभी राहुल गांधी के चारों ओर बनते हुए दिख रहे हैं। वे उनका नेतृत्व करते हुए दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने बड़ी कुशलता से भाजपा के भावनात्मक व जुमला आधारित सोच की हकीकत जनता के सामने पेश कर दी।

पंकज रोहिला : देश की इतनी बड़ी और पुरानी पार्टी कांग्रेस अलग-अलग राज्यों में अपनी क्षमता से कम सीटों पर भी समझौता करने को क्यों तैयार हो रही है?
’आज सत्य, अहिंसा, सहिष्णुता के मूल्यों की रक्षा की लड़ाई है। आज हम एक असहिष्णु समाज कहे जा रहे हैं। हमारी तुलना सेनेगल व नाइजीरिया से की जा रही है। आज भाजपा गांधीवाद के विपरीत सोच पैदा करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में हमें सर्वधर्म समभाव की रक्षा करनी है और इन मूल्यों के संरक्षक संविधान की रक्षा करनी है।

मुकेश भारद्वाज : कांग्रेस जब भी भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाती है तो सबसे पहले यही कहा जाता है कि इसके अपने सारे नेता भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। यहां तक कि कांग्रेस अध्यक्ष, उनकी मां भी जमानत पर हैं। कांग्रेस का दूसरा कमजोर पक्ष वंशवाद है। अब आप प्रियंका गांधी को लेकर आए जिनके पति पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं।
’पहले मैं दूसरे सवाल का जवाब देता हूं। दुनिया में कहीं भी विकासशील देशों में आपको एक ऐसे नेता की जरूरत होती है जो न्यूक्लियस के तौर पर बीच में हो और बाकी लोगों को उसके चारों ओर खड़ा किया जा सके। हम भी एक विकासशील देश हैं। जवाहरलाल नेहरू ने हमारे देश की रूपरेखा तय की, उसका लाभ निश्चित रूप से उनके परिवार को मिला। यह खाली हमारे देश में ही नहीं हुआ, आप सुकर्णो को ले लीजिए, ज्यूलिस न्येरेरे को ले लीजिए। सब जगह यह हुआ। यहां तक कि जो विकसित लोकतंत्र हैं, जैसे अमेरिका है, वहां क्लिंटन परिवार की बात होती है, बुश परिवार की बात होती है, कार्टर परिवार की बात होती है। आप ब्रिटेन में चले जाएं, जापान में चले जाएं। हर जगह ऐसा देखने को मिलेगा। ऐसे में भारत में यह स्वाभाविक है। कांग्रेस के अंदर जो स्थायित्व है वह इसकी वजह से है। आप इसको वंशवाद कहते हैं, हम इसे नेतृत्व कहते हैं।
जहां तक भ्रष्टाचार का सवाल है तो जितने भी बड़े फैसले हुए, वे कांग्रेस के जमाने में हुए। अब जब हमने रफाल का सौदा किया तो लालकृष्ण आडवाणी सहित सौ सांसदों ने इसके खिलाफ लिखकर दिया जिसकी वजह से बात रुकी। आज भी जितने रक्षा सौदे के तहत सामग्री आ रही है, उन सबकी प्रक्रिया कांग्रेस की सरकारों ने तय की। हमारा यह कहना है कि आप हम पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा रहे हैं तो लगाइए लेकिन यह तो बताइए कि आपको बोफर्स में क्या मिला। और बोफर्स ने अपनी उपयोगिता साबित कर दी। मिराज, सुखोई, मिग, जगुआर सब हमने खरीदे। आज 2जी घोटाल कहां है, कोल ब्लॉक आबंटन घोटाला कहां है। क्या सब कपूर की तरह उड़ गए। यह सरकार ही झूठे आरोपों के गर्भ से पैदा हुई।

पंकज रोहिला : कांग्रेस पर भाजपा का आरोप है कि कश्मीर से लेकर चीन तक की समस्या उसी की देन है। आपका क्या कहना है?
’विभाजन का जो सिद्धांत था, उसमें एक बात तय कर दी गई थी कि जो हिंदू बाहुल्य वाले क्षेत्र होंगे वे हिंदुस्तान की तरफ होंगे और जो मुसलिम बाहुल्य वाले होंगे, वे पाकिस्तान की तरफ जाएंगे। जैसे जूनागढ़, हैदराबाद आदि हिंदू बाहुल्य वाले क्षेत्र थे वे हिंदुस्तान में रहेंगे। उसी प्रकार कश्मीर मुसलिम बाहुल्य वाला क्षेत्र था। उसने स्वतंत्र रहने की बात की। पाकिस्तान ने उस पर हमला कर दिया। नेहरू का कद था या शेख अब्दुल्ला की यह दूरदर्शिता थी कि 98 फीसद मुसलिम आबादी वाले कश्मीर ने हिंदुस्तान के साथ रहने का फैसला किया। जयप्रकाश जैसे दूरदर्शी व्यक्ति ने इसके लिए नेहरू को पत्र लिखकर कहा कि आपने असंभव को संभव बना दिया। असल में कश्मीर नेहरू द्वारा दिया गया अविवादित उपहार है। कश्मीर की स्थिति आज इतनी इसलिए बिगड़ी क्योंकि वहां पर सत्ता की खातिर भाजपा और पीडीपी में आपराधिक समझौता हुआ। जहां तक चीन का मामला है तो नेहरू ने संसद में अपने भाषण में कहा कि संयुक्त राष्टÑ सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का आॅफर कभी नहीं किया गया। उस समय चीन और रूस एक साथ थे। रूस के पास वीटो का अधिकार था। कोरिया का झगड़ा था। अब जरा सोचिए कि रूस की इच्छा के बगैर कोई स्थायी सदस्य बन सकता है? चलिए हम मान लेते हैं कि नेहरू ने इतने सारे अच्छे काम किए तो कुछ गलतियां भी हुई होंगी तो भाजपा के लोग बताएं कि वे पांच साल से बैठकर क्या कर रहे थे। क्यों नहीं सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता हासिल कर ली।

अनिल बंसल: उत्तराखंड में पांच सीटें हैं, कांग्रेस को कितनी सीट मिलने का भरोसा है? कहा जा रहा है कि हवाई हमलों के बाद माहौल बदला है।
’पांच की पांच जीतेंगे। हम सब हवाई हमलों के पक्षधर हैं। यह सही है कि 1971 के बाद पहली बार हमारी वायुसेना ने सीमा पार जाकर हमला किया। हमारे लिए यह महत्त्वपूर्ण नहीं है कि कितने मारे गए या नहीं मारे गए। यह हम नहीं गिन रहे, यह तो भाजपा गिन रही है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इन हमलों के तुरंत बाद कहा कि हम सेना को सलाम करते हैं और प्रस्ताव पारित कर कहा कि हम सरकार और सशस्त्र बलों के साथ हैं। हमने पुलवामा की घटना के बाद अपने सारे राजनीतिक कार्यक्रम बंद कर दिए जबकि भाजपा ने उल्टा किया। अब भाजपा सैनिक की शहादत को भाजपाई व गैर भाजपाई के बीच बांटने की कोशिश कर रही है तो आज यह सेना को और पूर्व सैनिकों को सोचना है कि क्या यह ठीक है। क्या किसी एक व्यक्ति या दल के लिए सेना की निष्पक्षता का, सर्वस्वीकार्यता का विभाजन होना चाहिए। इस चुनाव में इस मुद्दे पर वोट डाले जाएंगे।
दीपक रस्तोगी: कश्मीर में आज उग्रवाद की जो स्थिति है, पूर्वोत्तर में भी विद्रोहियों को सीमापार से सहयोग मिल रहा है। क्या सिर्फ सेना के बल पर हम उग्रवाद को कुचल सकते हैं?
’इस तरह की स्थितियों के सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक पहलू होते हैं। पूर्वोत्तर में सांस्कृतिक पहलू भी है। आपने नागरिकता संशोधन विधेयक थोपा और बहुत सालों के बाद पहली बार लड़के जंगलों में भागे और उल्फा के साथ खड़े हो गए। जो पूर्वोत्तर शांत हो चुका था, उसमें अशांति के बीज आपने बो दिए। नक्सलवाद से हम दो तरह से निपट रहे थे। हम सामाजिक-राजनीतिक हल भी ढूंढ़ रहे थे और हथियार से भी निपट रहे थे। लेकिन इस सरकार ने राजनीतिक पहल बंद कर दी। इसी प्रकार कश्मीर में आपने संवाद बंद कर दिया। मेरा मानना है कि लोकतंत्र में केवल बंदूक से समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता। आपको बंदूक व बातचीत दोनों को साथ चलाना होगा। जो देश के खिलाफ हथियार उठा रहे हैं उनके खिलाफ हथियार चलाना पड़ेगा लेकिन जो लोग वैचारिक रूप से ऐसे लोगों से जुड़ते जा रहे हैं, उनको अलग हटाने के लिए आपको बातचीत की प्रक्रिया भी चलानी पड़ेगी।

आर्येंद्र उपाध्याय : 2019 में आपको कांग्रेस की जीत का भरोसा है?
’मुझे कांग्रेस की जीत का पूरा भरोसा है। मुझे लोगों के विवेक पर भरोसा है।

अरविंद शेष: आदिवासियों का मुद्दा हावी होता नहीं दिख रहा?
’यूपीए-1 और यूपीए-2 को जनता के अधिकारिता के कार्यकाल के तौर पर देखा जाता है। सूचना के अधिकार से वनाधिकार तक सब कुछ यूपीए सरकारों के दौरान जनता को मिला। इसमें वनाधिकार भी बेहद अहम था। लेकिन उस कानून का गला घोटने की कोशिश की जा रही है। हमारी सरकार आने दीजिए, हम इसको फिर से उसी रूप में लागू करेंगे। हमने अपनी राज्य सरकारों से कह भी दिया है और राजस्थान ने तो कानून भी बना दिया है।

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