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शिक्षा: गति और गतिरोध

आवश्यकता निजी विद्यालयों पर सख्ती के साथ सार्वजनिक विद्यालयों को आधुनिक संदर्भों में मूल्यपरक शिक्षा देने लायक बनाने की है, जहां सरकारी खानापूर्ति से अधिक अभिभावकीय संतुष्टि के जरूरी मुद्दों को सुलझाया जा सके। इसके लिए आवश्यक है कि शिक्षा को समवर्ती सूची के बजाय केंद्रीय सूची में रख कर नए सिरे से दूरदर्शी पहल की जाए।

देश में सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षण का ढांचा नहीं खड़ा हो सका है और अब तो जिस तरह सरकारों ने शिक्षा से अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना शुरू किया है, उससे एक बेहतर समाज की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए।

शिक्षा समाज की रीढ़ होती है, इसलिए इसकी उपेक्षा करके न तो कोई समाज विकास कर सकता है और न ही कोई देश। शिक्षा से मशीन, तकनीक, उद्योग आदि सब बनें, लेकिन सबसे पहले एक बेहतर मनुष्य और समाज बने, जो इन सबका सकारात्मक उपयोग कर सके। भारत में इसकी और आवश्यकता इसलिए थी कि यहां सैकड़ों सालों की जमींदारी और विदेशी गुलामी से जकड़ा हुआ समाज आजादी के बाद विरासत में मिला था। यहां वंचितों का शोषण व्यवस्थागत था। इससे मुक्ति के लिए आंबेडकर ने भी शिक्षा को ही सबसे महत्त्वपूर्ण साधन बताया था, जिससे इन ढांचागत शोषण प्रक्रियाओं की पहचान संभव हो सके। पर बिडंबना है कि हमने शिक्षा का जो ढांचा विकसित किया, वह आवश्यकताओं से बहुत दूर है।

किसी अकादमिक परिसर में अपनी समकालीन पीढ़ी के सबसे बौद्धिक लोग रहते हैं, अगर उनमें भी सामान्य समाज की बुराइयां बनी हुई हों, तो वहां शिक्षा का मूल्य प्रश्नांकित होगा ही, साथ में पूरे शैक्षिक तंत्र पर सवाल होना चाहिए, जहां से निकले नागरिकों में अपने मूलभूत दायित्वों का बोध न हो। अगर आजादी के साठ साल बाद भी अलग से जनजातीय विश्वविद्यालय बनाने की आवश्यकता महसूस हुई, तो यह उससे पहले के सभी विश्वविद्यालयों पर सवाल है कि वहां इन समाजों की उपेक्षा हुई। यह इसके बावजूद हुआ कि जनजातीय समूहों के लिए प्रवेश से लेकर वहां नौकरियों में आरक्षण था। आदर्श स्थिति तो यह होती कि कम से कम शैक्षिक जगत में बिना किसी आरक्षण के सामाजिक न्याय और बराबरी की सुविधाएं देने के लिए अतिरिक्त कानून की आवश्यकता नहीं होती। कानून एक तरह का बंधन है और इसकी आवश्यकता तब होती है, जब स्वत: जागरूकता न हो, विवेक की कमी हो या सायास किए जाने का प्रयास हो। ऐसे में अगर विश्वविद्यालयों में भी समाज की बराबरी के लिए कानून की आवश्यकता पड़ती है तो उचित नहीं है और अगर इन सबके बावजूद लक्ष्य की प्राप्ति न हो, तो निश्चित रूप से हमारा रास्ता ठीक नहीं था। जबकि हकीकत इसके विपरीत है जहां उपलब्ध अवसरों को भी देने से रोकने के लिए उपक्रम किए जाते हैं।

शिक्षा के सार्वजनिक वंचन का एक संदर्भ माध्यम भी है, जहां हमने ब्रिटिश विरासत को इस तरह गले लगा लिया है, जिस पर मुड़ कर सोचने की स्थिति में भी हम नहीं हैं। देश के सरकारी विद्यालयों पर से मध्यवर्गीय समाज का भरोसा बहुत पहले उठ चुका है। दूसरी तरफ ‘पब्लिक स्कूलों’ की स्थिति यह है कि उनमें पढ़ने के लिए महंगी फीस और उनके नखरों से आम परिवार हमेशा परेशान रहता है। इन सबके बावजूद महानगरों से दूर-दराज के क्षेत्रों में भी अब छात्रों पर अनिवार्य और अभिभावकों पर यह नैतिक दबाव है कि वे अपनी भाषा भूल जाएं। शिक्षा का मूल सिर्फ अंग्रेजी का ज्ञान है? जिस उम्र में बच्चों को क्या-क्या सिखाया जा सकता है, उसी उम्र में अंग्रेजी सीखने के आतंक से आतंकित ये छात्र अपनी जड़, जमीन और परिवेश से कट कर क्या-क्या सीख लेंगे? होना तो यह चाहिए कि बच्चों में ताउम्र सच को सच और गलत को गलत कहने का साहस, विवेक और तर्कशक्ति मिले, पर इन सबसे परे निजी विद्यालयों की प्राथमिकता होती है कि पैसा उगाहने की अधिकतम संभावनाओं को तलाशा जा सके। पढ़ाई के नाम पर सर्वोच्च अंक पाने की ऐसी प्रतिस्पर्धा चल पड़ी है कि किशोरावस्था में बच्चे परीक्षा टालने के लिए हत्या तक करने लगे हैं। इस पूरे प्रकरण में ये विद्यालय शिक्षा पाने के किसी तटस्थ स्थल से परे अपने आप में उद्योग बन चुके हैं, जहां सत्ता और राजनीति के कुत्सित गठजोड़ों से छात्रों और अभिभावकों पर हिंसा हो रही है।

हालांकि कुछ सरकारों ने थोड़ी सख्ती दिखाई है, लेकिन आवश्यकता निजी विद्यालयों पर सख्ती के साथ सार्वजनिक विद्यालयों को आधुनिक संदर्भों में मूल्यपरक शिक्षा देने लायक बनाने की है, जहां सरकारी खानापूर्ति से अधिक अभिभावकीय संतुष्टि के जरूरी मुद्दों को सुलझाया जा सके। इसके लिए आवश्यक है कि शिक्षा को समवर्ती सूची के बजाय केंद्रीय सूची में रख कर नए सिरे से दूरदर्शी पहल की जाए।

विश्वविद्यालय ज्ञान के उत्पादन और संवर्धन के केंद्र होते हैं, जहां समाज की समकालीनता का गहन विश्लेषण और भविष्य की चुनौतियों का एक समावेशी समाधान खोजा जा सके। जहां नवाचार की तकनीक तो विकसित हो ही, समाज के दुर्गुणों के प्रति मूल्य भी विकसित हों। किसी अकादमिक संस्थान की स्थापना विशेष बौद्धिक भूख को तृप्त करने के लिए होनी चाहिए, न कि चुनावी लाभ-हानि के लिए। विश्वविद्यालय बेरोजगारी उन्मूलन का केंद्र नहीं हो सकते, बल्कि ऐसी शिक्षा वहां दी जानी चाहिए, जिससे छात्र स्वत: रोजगार की समस्या से निपटने में सक्षम हो सकें। दुर्भाग्य है कि देश में विश्वविद्यालयों की घोषणा चुनावी रैलियों में होती है और उसके बाद उनको अपने विभिन्न हितों के अनुरूप ढालना ही प्राथमिकता हो जाती है। एक सरकार द्वारा शुरू किए संस्थानों को दूसरी सरकार ठंडे बस्ते में डाल देती है। देश में ऐसे अनेक विश्वविद्यालय हैं, जहां वर्षों से उनके शीर्ष अधिकारी नहीं हैं। पचासों विश्वविद्यालय ऐसे हैं, जहां बीस-बीस वर्षों से शिक्षकों के पद रिक्त हैं। प्रयोगशाला के जरूरी साधन नहीं हैं। पाठ्यक्रम और आधुनिक तकनीक नहीं है। अकादमिक भ्रष्टाचार, आर्थिक अपराध, जातिगत और जेंडरगत विद्वेष और भाई-भतीजावाद जैसी समाज की बुराइयां अकादमिक परिसरों में इसीलिए अपना स्थान बना चुकी हैं कि विश्वविद्यालय अपना उद्देश्य भूल चुके हैं।

देश में सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षण का ढांचा नहीं खड़ा हो सका है और अब तो जिस तरह सरकारों ने शिक्षा से अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना शुरू किया है, उससे एक बेहतर समाज की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए। धनाढ्य तबका तो ‘पब्लिक स्कूल’ और विश्वविद्यालय में पढ़ लेगा, जो रुपया, डॉलर और पौंड सब कमा सकता है, लेकिन शिक्षा के सामाजिक सरोकारों से शायद ही जुड़ पाए। गरीब और वंचित तबका जहां आज खड़ा है, उससे और पीछे जाएगा। इस पूरे प्रकरण में अपनी भाषा, संस्कृति और समाज सब द्वितीयक होंगे, इसके बावजूद कि भूमंडलीकरण का सबसे बड़ा प्रवक्ता अमेरिका आज अपनी सीमाओं को घेरने में व्यस्त है।

शिक्षा स्वयं में संपूर्ण माध्यम है, जिससे समाज की आवश्यकताओं को संबोधित किया जा सकता है। इक्कीसवीं सदी एशिया की होने की घोषणा के स्वर में चीन और भारत दो प्रमुख देश होंगे, जिन पर वैश्विक नेतृत्व की जिम्मेदारी होगी, ऐसे में क्या यह आवश्यक नहीं कि प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा और शोधों में स्थानीय सामाजिक, दार्शनिक, पारिस्थितिक तथा वैज्ञानिक आवश्यकताओं को प्रमुखता से शामिल किया जाए? क्योंकि बिना समेकित शिक्षा के न तो सामाजिक खाइयों को पाटा जा सकता है और न ही बौद्धिक पूंजी और तकनीकी नवाचारों की कल्पना की जा सकती है, जिनसे विश्व का नेतृत्व हो सकता है। ध्यान रहे कि एक खोखला राष्ट्र सिर्फ उपभोक्ता हो सकता है, उत्पादक नहीं।

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