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दूसरी नजरः उम्मीद और विपदा के बीच

कुछ ही हफ्तों पहले मैंने ‘जम्मू-कश्मीर की कसौटी पर’ शीर्षक निबंध (13 मई, 2018) में अपनी पीड़ा का इजहार किया था। जम्मू-कश्मीर और खासकर कश्मीर घाटी की तेजी से बिगड़ती दशा को लेकर मैंने भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार की नीति पर दोष मढ़ने में कोई हिचक नहीं दिखाई थी।

Author June 24, 2018 4:26 AM
कश्मीर को लेकर केंद्र की रणनीति में स्पष्टता की कमी रही है।

कुछ ही हफ्तों पहले मैंने ‘जम्मू-कश्मीर की कसौटी पर’ शीर्षक निबंध (13 मई, 2018) में अपनी पीड़ा का इजहार किया था। जम्मू-कश्मीर और खासकर कश्मीर घाटी की तेजी से बिगड़ती दशा को लेकर मैंने भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार की नीति पर दोष मढ़ने में कोई हिचक नहीं दिखाई थी। यह नीति कुछ ही दिन पहले पूरी तरह ढह गई। भाजपा ने साझा सरकार से अपने को अलग कर लिया और दूसरे साझेदार पीडीपी के पास इस्तीफा देने के सिवा कोई चारा नहीं था। जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल का शासन लागू हो गया, जो कि केंद्र सरकार के ही प्रत्यक्ष शासन का दूसरा नाम है।

ऐसा लगता है कि बाकी देश में स्थिति की गंभीरता का बहुत कम लोगों को अंदाजा है। वे सत्ताधीशों की बातों को ही सही मान कर चलते हैं, जिसकी शुरुआत प्रधानमंत्री के बयानों से होती है। इस वायदे से सम्मोहित होना आसान है कि ‘घुसपैठ बंद हो जाएगी, आतंकवाद को जड़ से उखाड़ दिया जाएगा, अलगाववादी दंडित होंगे, राज्य में शांति बहाल होगी, और जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग बना रहेगा।’ तनिक ठहर कर गंभीरता से सोचने का हर आग्रह ठुकरा दिया गया, हर आलोचना राष्ट्र-विरोधी मान ली गई।
उनके शब्द याद करें

भूलें नहीं, आरएसएस और भाजपा के रणनीतिकारों ने सरकार की रणनीति कई मौकों पर स्पष्ट की थी: ‘‘विस्फोट हों या नहीं, सरकार टस से मस नहीं होगी।’’ यही सरकार 19 जून, 2018 को गिर गई, भारत की जनता से क्षमायाचना का एक शब्द कहे बगैर। गृहमंत्री ने कुछ महीने पहले एक उलझाने वाला बयान दिया था कि ‘‘जम्मू-कश्मीर मसले का समाधान पा लिया गया है।’’ जिन मंत्री महोदय पर सीधी जिम्मेदारी है उन्होंने राज्यपाल शासन की घोषणा के बाद 20 जून 2018 को गोलमोल ढंग से बस इतना कहा, ‘केंद्र अब आतंकवाद को हरगिज बर्दाश्त नहीं करेगा।’ पर उन्होंने उस रहस्यपूर्ण समाधान के बारे में एक शब्द नहीं कहा, जो उनकी सरकार ने पा लिया था!

जब राजनीतिक दलों ने रमजान माह के दौरान संघर्ष विराम की मांग की थी, तो सेना प्रमुख ने उस मांग का जवाब देने का उत्तरदायित्व अपने सिर लेते हुए कहा था, ‘‘आजादी नहीं मिलने जा रही, कभी नहीं,… अगर आप हमसे लड़ना चाहते हैं, तो हम अपनी पूरी ताकत से आपसे लड़ेंगे।’’ राज्यपाल शासन लागू होने के बाद उन्होंने वही घिसा-पिटा बयान दोहराया कि ‘‘आतंक-विरोधी कार्रवाइयां जारी रहेंगी’’, और यह भी कहा कि ‘‘हमारे काम में कोई राजनीतिक दखलंदाजी नहीं है।’’
जिस एक शख्स ने कुछ नहीं कहा (शुक्रवार शाम छह बजे तक), वे प्रधानमंत्री थे।

जो कीमत हमने चुकाई

यह मेरे लिए कोई संतोष का विषय नहीं है कि तीन साल पहले कही गई मेरी इस बात से अनगिनत लोगों ने सहमति जताई थी : कि पीडीपी-भाजपा गठबंधन एक अस्वाभाविक और मौकापरस्त गठबंधन है। इसे घाटी के लोगों ने पहले ही दिन नकार दिया था : पीडीपी को दगाबाज के रूप में देखा गया और भाजपा को छल-बल से सत्ता हथियाने वाले के रूप में। जब श्रीनगर क्षेत्र में एक उपचुनाव हुआ, तो केवल सात फीसद मतदाताओं ने वोट डाले। गठबंधन हिंसा में बढ़ोतरी के लिए उकसावा ही साबित हुआ।
26 मई 2014 से, अड़तालीस महीनों में, पहले की किसी भी इतनी अवधि की तुलना में, ज्यादा घुसपैठ हुई, ज्यादा हिंसा हुई, ज्यादा लोग मारे गए। कई बुनियादी सिद्धांत क्षत-विक्षत हुए। लिखित-अलिखित नियमों के विपरीत, सेना के जनरलों ने राजनीतिक बयान दिए, जम्मू-कश्मीर की मंत्रिपरिषद ने सामूहिक दायित्व के सिद्धांत की अवहेलना की, राज्य के एकत्व (जिसमें तीन क्षेत्र शामिल हैं) को गहरी चोट पहुंची, और राज्य ने अपने युवा नागरिकों समेत अपनी ही जनता पर कहर बरपाया। 2014 में जब केंद्र में भाजपा की सरकार बनी, तब से स्थिति और बिगड़ती ही गई है। (देखें तालिका)

अनुत्तरित प्रश्न कई सवाल उठते हैं :

1. क्या राज्यपाल शासन का मतलब है कि विरोध-प्रदर्शनों को कुचलने के लिए और अधिक ‘निर्मम तथा सैन्यवादी’ रवैया अख्तियार किया जाएगा? इस माह के अंत में जब एमएन वोहरा का कार्यकाल समाप्त होगा, तो राज्यपाल कौन होगा? (वोहरा पुराने और अनुभवी व्यक्ति हैं, लेकिन पद पर बने रहने में उनकी उम्र बाधा है। जैसे ही नए राज्यपाल की नियुक्ति होगी, भाजपा के असली इरादों का पता चल जाएगा।)

2. क्या राज्यपाल शासन के तहत यही एकसूत्री एजेंडा होगा: आतंकवाद को उखाड़ फेंकने के लिए भारी बल प्रयोग का इस्तेमाल? कोई भी आतंकवाद की हिमायत नहीं करता, पर किसी को भी इस तथ्य से आंख नहीं मूंद लेना चाहिए कि यह एक अनसुलझा राजनीतिक मसला है जिसने अनेक युवाओं को हिंसा की तरफ प्रवृत्त किया है।

3. क्या सरकार सभी संबद्ध पक्षों से बातचीत करेगी? मौजूदा सरकार साख गंवा चुकी है। अगर बातचीत की पेशकश की भी जाएगी, तो भी कोई सरकार के प्रतिनिधियों से बातचीत नहीं करेगा। हालांकि दिनेश्वर शर्मा भले और सदाशयी व्यक्ति हैं, पर वार्ताकार के रूप में उनकी उपयोगिता अब नहीं रह गई है। जम्मू-कश्मीर के लोगों से नए सिरे से बातचीत के प्रयास के लिए स्वतंत्र वार्ताकारों की जरूरत है, जो सिविल सोसायटी से लिये जाने चाहिए, पर मौजूदा सरकार के तहत यह असंभव मालूम पड़ता है।

4. क्या राज्य विधाननसभा के लिए नए चुनाव होंगे? कम से कम कश्मीर घाटी में, बड़े पैमाने पर चुनाव के बहिष्कार का खतरा है।

5. क्या पाकिस्तान के साथ युद्ध होगा? ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ और ‘सीमित युद्ध’ के बीच बहुत थोड़ा-सा फासला है। और चुनाव की तरफ बढ़ रहे वर्ष में यह फासला तय करने का लोभ प्रबल हो सकता है।

6. मैं तहेदिल से उम्मीद करता हूं कि कश्मीर हमसे कभी बिछुड़ेगा नहीं, पर जो स्थिति है वह किसी विपदा से कम नहीं है।
वर्ष – मारे गए सुरक्षाकर्मी – मारे गए नागरिक – मारे गए आतंकवादी
2013 – 53 – 15 – 67
2014 – 47 – 28 – 110
2015 – 39 – 17 – 108
2016 – 82 – 15 – 150
2017* – 83 – 57 – 218
2018* (17 जून तक) 40 – 38 – 95

* इंस्टीट्यूट फॉर कॉनफ्लिक्ट मैनेजमेंट

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