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वक्त की नब्जः उन्हें भी अहसास है…

परिवर्तन और विकास के रास्ते पर रहते मोदी तो अगला आम चुनाव हारने का सवाल ही नहीं उठता। बातें अब उनके हारने की हो रही हैं, तो इसलिए कि इस रास्ते से भटक कर हिंदुत्व के रास्ते पर चल पड़े थे भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री और मोदी ने उनको नहीं रोका।

Author July 1, 2018 03:58 am
पीएम मोदी ने आगामी लोकसभा चुनाव की तैयारियां की शुरु, चुनाव प्रचार की बनायी रणनीति। (express photo)

मैंने पिछले हफ्ते वाले स्तंभ में लिख क्या दिया कि नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता घटने लगी है, जूते मुझे उनके दोस्तों से भी पड़े और उनके दुश्मनों से भी। सोशल मीडिया के इस जमाने में पाठकों की शिकायतें और उनकी तारीफें सुने बिना काम नहीं चलता है हम पत्रकारों का, सो मैंने ध्यान से ट्विटर पर तारीफें भी पढ़ीं और शिकायतें भी। पढ़ने के बाद दिखा कि एक सवाल है, जो आजकल मोदी के बारे में सब पूछ रहे हैं कि क्या अगले कुछ महीनों में मोदी कोई ऐसा चमत्कार कर सकते हैं, जिससे उनका दुबारा प्रधानमंत्री बनना तय हो जाए अगले साल।

दिखने लगा है कि मोदी खुद जान गए हैं कि उनका करिश्मा अब वह नहीं रहा, जो कभी था। सो, जहां जाते हैं वहां अपने प्रतिद्वंद्वियों पर हमला किए बगैर नहीं रहते। मुंबई पहुंचे थे छब्बीस जून को, सो याद दिलाया उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते समय कि इस दिन 1975 की आधी रात को इंदिरा गांधी ने देश में इमरजंसी लगा दी थी, जिसके लगने के बाद पूरे देश को जेलखाना बना दिया गया था। इमरजंसी की यादें ताजा करने के लिए मोदी ने याद दिलाया कि वह ऐसा दौर था जब न विपक्ष था देश में, न संसद, न पत्रकारों को बोलने की आजादी और न ही न्यायालयों की स्वतंत्रता कायम थी। कांग्रेस की तरफ इशारा करते हुए मोदी ने कहा कि आज इसी राजनीतिक दल के लोग उन पर तानाशाही का आरोप लगाते फिरते हैं।

मुंबई से उत्तर प्रदेश जब गए मोदी, तो कबीर की मजार पर चादर चढ़ाने के बाद अपने भाषण में अखिलेश यादव और मायावती की नई दोस्ती का मजाक उड़ाया, यह कहते हुए कि इस दोस्ती का एक ही मकसद है- सत्ता में वापस आना। सत्ता में आना चाहते हैं ये लोग, देश के लिए कुछ करने नहीं, अपने लिए और अपने परिवारों के लिए कुछ करने। ‘वे देश नहीं, समाज नहीं, केवल अपने परिवार के हितों के लिए चिंतित हैं। गरीबों, दलितों, पिछड़े, वंचित, शोषित को धोखा देकर अपने लिए करोड़ों के बंगले बनवाने वाले… ऐसे लोगों से उत्तर प्रदेश और देश के लोगों को सतर्क रहने की जरूरत है।’

मोदी को ऐसी बातें करने की आवश्यकता शायद इसलिए महसूस हो रही है, क्योंकि वे जान गए हैं कि उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता घट गई है इतनी कि पिछले साल उत्तर प्रदेश के विधानसभा में शानदार बहुमत हासिल करने के कुछ ही महीनों बाद इस अति-महत्त्वपूर्ण राज्य में इस वर्ष तीन लोकसभा सीटें और एक विधानसभा सीट हार चुकी है भारतीय जनता पार्टी। उनके इसी दौरे में जब टीवी पत्रकारों ने गोरखपुर के कुछ नौजवानों से बातें कीं तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पिछले चार वर्षों में उनको उम्मीद थी कि मोदी नौजवानों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा करके दिखाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ है।

परिवर्तन और विकास के रास्ते पर रहते मोदी तो अगला आम चुनाव हारने का सवाल ही नहीं उठता। बातें अब उनके हारने की हो रही हैं, तो इसलिए कि इस रास्ते से भटक कर हिंदुत्व के रास्ते पर चल पड़े थे भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री और मोदी ने उनको नहीं रोका। इस रास्ते में चलते नेतृत्व राजनेताओं के हाथों से खिसक कर हत्यारे गोरक्षकों के हाथों में पहुंच गया। इन लोगों ने माहौल ऐसा खराब किया है कि मुसलमानों और दलितों को लगने लगा है भाजपा शासित राज्यों में कि सरकार उनकी नहीं, सिर्फ सवर्णों की है। उत्तर प्रदेश में कई चुनाव क्षेत्र ऐसे हैं, जहां दलित और मुसलमान हराने की ताकत रखते हैं, सो मोदी को चिंता होनी चाहिए।

ऐसा कहने के बाद लेकिन यह भी कहना जरूरी है कि मोदी इतने चतुर राजनेता हैं कि कुछ न कुछ ऐसा कर सकते हैं, जो उनकी लोकप्रियता को फिर ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती है। यह कुछ न कुछ क्या हो सकता है? उनके दुश्मन कहते हैं कि अयोध्या में राम मंदिर अगले आम चुनाव से पहले बन सकता है और ऐसा हुआ तो हिंदू वोट बैंक फिर कायम हो सकता है। पिछले आम चुनावों में हिंदुओं ने परिवर्तन और विकास के नारे से प्रभावित होकर जातिवाद की दरारें भुला दीं थीं, खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार में, जहां ये दरारें अक्सर याद रहती हैं मतदाताओं को। एक और ‘चमत्कार’ है, जिसका जिक्र हो रहा है इन दिनों और वह यह है कि मोदी जनधन खातों में पंद्रह लाख न सही, लेकिन कुछ थोड़ा-बहुत पैसा डाल कर वोट बटोर सकते हैं।

मेरी अपनी राय है कि जनता में परिवर्तन और विकास की उम्मीदें जगाने का सबसे अच्छा तरीका है उत्तर प्रदेश के स्कूलों और अस्पतालों में परिवर्तन लाना। पिछले विधानसभा चुनाव में ग्रामीण उत्तर प्रदेश में मैंने ऐसे स्कूल और अस्पताल देखे, जिनको देख कर रोना आया। मुझे कई गरीब मतदाता मिले, जिन्होंने कहा कि सरकारी स्कूल और अस्पताल इतने रद्दी हैं कि किसी न किसी तरह पैसा जुटा कर प्राइवेट स्कूलों में अपने बच्चों को भेजते हैं। बीमारी अगर दस्तक दे तो प्राइवेट में इलाज कराने पर मजबूर हैं। भाजपा शासित राज्यों में अगर इन सरकारी सेवाओं में असली परिवर्तन दिख गया होता तो मोदी की 2019 में जीत तय होती। ऐसा अब राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में करना नामुमकिन है, क्योंकि चुनाव इतने पास आ गए हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में ऐसा हो सकता है, अगर मोदी अपने चुने हुए मुख्यमंत्री पर दबाव डालें। मेरा मानना है कि इन आम सेवाओं में परिवर्तन लाने का असर अयोध्या में राम मंदिर बनाने से भी ज्यादा हो सकता है।

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