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वक्त की नब्जः बुनियादी सरोकार से दूर

कुछ समय के लिए भारतवासियों को लगा था कि मोदी अन्य राजनेताओं से अलग हैं। कुछ क्षणों के लिए लगा था कि वास्तव में सबका साथ, सबका विकास लाकर दिखाएंगे। मगर पिछले चार वर्षों में धीरे-धीरे साबित हो गया है कि मोदी भी धर्म-मजहब के झगड़ों का सहारा लेकर अगला आम चुनाव जीतना चाहते हैं।

Author July 22, 2018 2:18 AM
पिछले चार वर्षों में धीरे-धीरे साबित हो गया है कि मोदी भी धर्म-मजहब के झगड़ों का सहारा लेकर अगला आम चुनाव जीतना चाहते हैं।

हमारे राजनेता बातें बहुत करते हैं। लोकसभा के अंदर बहुत सारी बातें हुर्इं पिछले हफ्ते। लोकसभा के बाहर कई दिनों से बातें हो रही हैं भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के राजनेताओं के बीच यह साबित करने की कि मुसलमानों का असली हमदर्द कौन है। हिंदू-मुसलिम झगड़ों से जब फुर्सत मिलती है, तो देश के तमाम बड़े राजनेता यह साबित करने में लग जाते हैं कि किसानों का दर्द कौन ज्यादा समझता है, दलितों की पीड़ा कौन और आदिवासियों के अधिकार कौन। कोई राजनेता ऐसा नहीं है हमारे भारत महान में जो ‘आम आदमी’ से हमदर्दी दिखाने में पीछे है, लेकिन एक भी नहीं, जो खुल कर स्वीकार करता हो कि अगर भारत की जनता बेहाल है तो दोष उनका है। उन सबका।

एक-दूसरे पर आरोप लगाने के बजाय अगर यही महान नेता ईमानदारी से विश्लेषण करें देश के हालात के, तो साफ दिखेगा उनको कि देश बेहाल है क्योंकि उन्होंने वे काम नहीं किए हैं, जिसके लिए जनता ने उन्हें चुन कर लोकसभा में भेजा था। हमारे देश के लोग अक्सर इस उम्मीद से चुनावों में अपना वोट डालते हैं कि शायद कभी एक दिन ऐसा प्रतिनिधि उनको मिलेगा, जो समझेगा उनकी असली पीड़ा, उनकी असली समस्याएं। संक्षेप में बस यही कि उनको इज्जत से जीने का मौका दिया जाए। इसके लिए कुछ बुनियादी चीजें जरूरी हैं और उनका अभाव अगर आज भी है तो दोष राजनेताओं का है।

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शर्मिंदा होना चाहिए हमारे राजनेताओं को कि स्वतंत्रता के सत्तर वर्ष गुजर जाने के बाद भी आम भारतीय बिजली, पानी, सड़क और रोटी, कपड़ा, मकान जैसी बुनियादी चीजों से वंचित हैं। शर्मिंदा होना चाहिए उन्हें कि धर्म-मजहब के झगड़ों में उलझाते रहते हैं आज भी लोगों को इस मकसद से कि लड़ते रहेंगे भारत के आम लोग, तो शायद भूल जाएंगे कि उनके जनप्रतिनिधि कितने नालायक हैं। इन दिनों प्रधानमंत्री और राहुल गांधी में मुकाबला चल रहा है कि उनमें मुसलमानों का असली हमदर्द कौन है। राहुल गांधी ने क्या कह दिया कि कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है कि प्रधानमंत्री ने इस बात को अपनी एक आमसभा में अहम मुद्दा बना लिया। प्रधानमंत्री ने बड़े नाटकीय अंदाज में पूछा कांग्रेस अध्यक्ष से कि क्या कांग्रेस सिर्फ मुसलिम मर्दों की पार्टी है? अगर मुसलिम महिलाओं की भी पार्टी होती, तो तीन तलाक की प्रथा समाप्त करने के लिए क्यों नहीं उनकी सरकार का साथ दे रही है?

अच्छा सवाल पूछा। लेकिन आगे यह भी पूछ देते कांग्रेस अध्यक्ष से कि इतनी हमदर्दी है मुसलमानों से तो इस कौम का हाल क्यों इतना बुरा है आज भी कि मुसलमानों से आगे दलित और आदिवासी भी निकल चुके हैं शिक्षा, विकास और गरीबी के मामले में। भारत के अधिकतर मुसलमान इतने गरीब क्यों हैं? क्या इसलिए नहीं कि उनको गरीब और अशिक्षित जानबूझ कर रखा गया है, ताकि चुनावों के समय वे वोट बैंक बन सकें? शिक्षित, खुशहाल लोगों को वोट बैंक आसानी से नहीं बनाया जा सकता है। कांग्रेस के राजनेताओं ने बहुत सोच-समझ कर मुसलमानों के साथ हमदर्दी दिखाई है। सो, उनकी आर्थिक समस्याओं का समाधान ढूंढ़ने के बजाय उनके मजहब की सुरक्षा की तरफ उनका ध्यान दिलाने का काम किया गया है। ऐसा करने से मौलवियों का फायदा जरूर हुआ है, लेकिन आम मुसलमानों का नहीं।

ऐसा सिर्फ मुसलमानों के साथ नहीं हुआ है। हिंदुओं के साथ भी छल-कपट की राजनीति की गई है। दोषी कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी तो हैं ही, लेकिन कम दोषी वे राजनीतिक दल भी नहीं हैं, जिन्होंने जाति को आधार बना कर अपनी राजनीति की है। इस तरह की राजनीति से होता सिर्फ यह है कि न उन समुदायों का फायदा होता है, जिनके नाम पर राजनीति की जाती है और न ही देश का। सो, भारत की राजनीतिक बहस अभी तक अटक कर रह गई है ऐसे मुद्दों में, जिनसे देश में न कभी समृद्धि आ सकती है, न असली विकास।

कुछ समय के लिए भारतवासियों को लगा था कि मोदी अन्य राजनेताओं से अलग हैं। कुछ क्षणों के लिए लगा था कि वास्तव में सबका साथ, सबका विकास लाकर दिखाएंगे। मगर पिछले चार वर्षों में धीरे-धीरे साबित हो गया है कि मोदी भी धर्म-मजहब के झगड़ों का सहारा लेकर अगला आम चुनाव जीतना चाहते हैं। अब चर्चा खूब गरम है दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में कि अगले कुछ महीनों में राम मंदिर का निर्माण शुरू हो जाएगा, सो फिर से शुरू हो जाएंगे मंदिर-मस्जिद के झगड़े। फिर से नफरत और तनाव फैलने लग जाएगा देश भर में और भारत के आम लोग भूल जाएंगे कि सबकी समस्याएं असल में आर्थिक हैं।

जिस दिन हर भारतीय का आर्थिक हाल इतना अच्छा हो जाएगा कि रोजगार की चिंताएं, रोटी-कपड़ा-मकान की चिंताएं दूर हो जाएंगी तब इतना आसान नहीं होगा राजनेताओं के लिए आम भारतवासियों को गुमराह करना। इस बात को राजनेता अच्छी तरह जानते हैं इसलिए उनकी कोशिश रहती है उन मुद्दों को उठाने की हमेशा, जिनसे सिर्फ उनको फायदा होता है। इस हफ्ते अविश्वास प्रस्ताव लोकसभा में लाकर थोड़ा समय और बर्बाद किया गया। मकसद सरकार को गिराना नहीं था विपक्ष के लिए। मकसद सिर्फ इतना था कि लोकसभा का यह सत्र भी शोरगुल करके बेकार किया जाए। रही मोदी सरकार की बात, तो उनके लिए इससे अच्छा मौका नहीं मिल सकता था अघोषित तरीके से चुनाव अभियान शुरू करने का अपनी उपलब्धियां लोकसभा में गिना कर। ऐसे चलती रही देश की राजनीति तो वह दिन बहुत दूर होता जाएगा, जब भारत वास्तव में एक विकसित, संपन्न देश बन सकेगा।

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