ताज़ा खबर
 

तीरंदाजः असुरक्षा का वितंडा

भारतीय महिला असुरक्षित है, कहना एक मानसिकता का परिचायक है। अक्सर बेहद सुरक्षित लोग अपने को, और दूसरों को भी, असुरक्षित मानते हैं। इस भाव को कोई बदल नहीं सकता। पर, दूसरी तरफ अगर हम सामान्य महिला समाज पर नजर डालें तो हमें भय और आतंक की जगह उम्मीद, उल्लास और नई कामनाएं नजर आएंगी।

प्रतीकात्मक चित्र

आत्मविश्लेषण जरूरी है। यदा कदा करते रहना चाहिए। खासकर तब, जब कोई आपकी सोच के विपरीत आपके सामने तस्वीर पेश कर दे। कहा जाता रहा है कि भारत एक रूढ़िवादी देश है। यह धारणा सदियों से चली आ रही है। इस धारणा को पुख्ता करने में पिछली दो सदियों में अंग्रेजों का बड़ा योगदान रहा है। 1960 और 1970 के दशकों तक भारत की छवि सर्वव्याप्त राजाओं, शहर-जंगलों में फिरते सपेरों, चिंघाड़ते हाथियों और हवा में गायब हो जाने वाले जादूगरों की थी। इसी छवि को हमने अपनी औपनिवेशिक मानसिकता के चलते जाने-अनजाने में काफी प्रसारित भी किया है। लोकतांत्रिक समाजवादी देश होने के बावजूद हमारे राष्ट्रीय वाहक एयर इंडिया का लोगो लाल अचकन पहने, सिर पर भारी पगड़ी लगाए, झुक के स्वागत करता ‘महाराजा’ बना रहा था।

पर इस छवि के विपरीत भारतीय समाज में तेजी से व्यापक बदलाव आए हैं। बिना कोई आंदोलन चलाए समाज की मानिसकता में परिवर्तन खुद-ब-खुद आ गया है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण भारतीय समाज में महिलाओं के प्रति तेजी से नजरिए में बदलाव है। राजा राममोहन राय ने इसकी शुरुआत सती प्रथा प्रतिबंध (1829) कानून बनवा कर की थी और उनके साथ और उनके बाद बहुत सारे समाज सेवकों ने लड़कियों और औरतों की शिक्षा और सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए विशेष सफल प्रयास किए थे।
इन्हीं प्रयासों का नतीजा था कि बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में ‘रूढ़िवादी’ समाज की महिलाओं ने परदा छोड़ कर कांग्रेस द्वारा चलाए कार्यक्रमों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। हिंदू, मुसलिम, ईसाई, सिख, यहूदी, पारसी, दलित और सवर्ण वर्गों से बड़ी संख्या में महिलाएं परदे जैसी कुरीतियों को तोड़ कर सड़कों पर उतर आई थीं और पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर आजादी के आंदोलन में शामिल हुई थीं।

इसके चलते यह स्वाभाविक ही था कि भारतीय गणतंत्र के संविधान में उनको वे सब हक अपने आप मिल गए, जिनके लिए दूसरे देशों की महिलाओं को संघर्ष करना पड़ा है। उदाहरण स्वरूप अमेरिका में वोट डालने का अधिकार महिलाओं को 1920 में दिया गया था और अश्वेतों को मताधिकार 1965 में मिल पाया था, जबकि देश 1776 में आजाद हुआ था। पर दूसरी तरफ गणतंत्र होने के महज बीस साल में ही भारत की प्रधानमंत्री एक महिला बन गई थी। उससे पूर्व 1951 के चुनाव के बाद गठित प्रथम मंत्रिमंडल में महिलाओं को प्राकृतिक रूप से प्रतिनिधित्व मिला था।

पर संविधान और कानून से ज्यादा क्रियाशील हमारी सामाजिक व्यवस्था रही है। अगर दूसरे देशों के समाजों से तुलना की जाए, तो भारतीय स्त्री ने जीवन के हर श्रेत्र में- जमीन से लेकर अंतरिक्ष तक- असीम सफलताएं हासिल की हैं। यहां पर सिर्फ पोस्टर गर्ल्स का जिक्र नहीं हो रहा है, बल्कि उन तामम करोड़ों महिलाओं की बात हो रही है, जिनकी आज की दुनिया कुछ समय पहले की दुनिया से एकदम अलग, स्वस्थ और खुशनुमा है। एक छोटा-सा उदाहरण काफी होगा। 1990 के दशक तक बड़े शहरों में रह रही लड़कियों के लिए भी यह सोचना नामुमकिन था कि वे नौकरी या पढ़ाई के लिए दूसरे शहर में जाकर साझे में कमरा लेकर रहें। अति-आधुनिक परिवार भी इस व्यवस्था पर एतराज करते थे और अगर मजबूरी में राजी भी हो जाते थे, तो लड़की में हिम्मत नहीं बन पाती थी। शाम या देर रात तक बाहर दोस्तों के साथ रहना अच्छा नहीं माना जाता था। पर आज यह सब हमारी सामान्य जीवन शैली का हिस्सा है।

इसी तरह बहुत सारे ऐसे सामाजिक और व्यक्तिगत पहलू हैं, जिनमें महिलाओं ने तवरित गति से बढ़त ली है और उस मुकाम तक पहुंची हैं, जहां पर उनको अपनी तरह से जीने का हौसला मिला है। पति-पत्नी का रिश्ता हो या फिर सास-बहू या फिर बाप-बेटी का संबंध, सबमें आमूलचूल परिवर्तन आया है। तब फिर कैसे कहा जा सकता है कि भारत में महिलाएं सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं? वे इतनी प्रताड़ित हैं कि उतना विश्व में कही नहीं है? हां, यह सच है कि भ्रूण हत्या अभी हाल तक बड़े पैमाने पर होती थी, पर इस कुरीति को समाप्त करने के लिए हमारे देश के जागरूक वर्ग ने सफलता पूर्वक अभियान चलाया है, जिसकी वजह से इन हत्याओं में भारी गिरावट आई है।

इसी तरह, महिलाओं के विरुद्ध हिंसा एक बड़ा मुद्दा है, पर उसके लिए भी कई ठोस कदम उठाए गए हैं। ऐसे अपराध किसी भी समाज में शून्य के स्तर पर नहीं आ सकते हैं, पर इनको करने की सहजता पर काबू जरूर पाया जा सकता है। वैसे आज की तारीख में भारत के किसी भी शहर की सड़कें महिलाओं के लिए तुलनात्मक रूप से ज्यादा सुरक्षित हैं। अमेरिका हो या यूरोप, छेड़छाड़ से लेकर बलात्कार तक की घटनाएं इन जगहों पर ज्यादा व्याप्त हैं। पर ऐसा होने पर हमें इन उपलब्धियों पर इतराने की जरूरत नहीं है। जितना हुआ है, वह काफी नहीं है, हमें अभी और करना है, क्योंकि स्त्री ही समाज का मूल है, उसकी धुरी है। वह जितनी मजबूत होगी, हमारा समाज भी उतना ही फलेगा और फूलेगा।

वास्तव में बिना स्त्रीवाद का झंडा उठाए, बिना अपनी ब्रा जलाए, चुपचाप, शालीन और दृढ़ मनोयोग से स्त्री सशक्तीकरण हमारे देश में हो रहा है। अन्य समाजों में अमूमन मर्दों ने किसी न किसी तरीके से इसके आड़े आने की कोशिश की है और महिलाओं को छोटी-छोटी रियायतें भी काफी जद्दोजहद के बाद मिली हैं। पर पिछले सत्तर सालों में भारत के पुरुषों ने स्त्री के हक में अपना रुख और रवैया बड़ी संजीदगी से बदला है। उसके पैरों के नीचे की जमीन को मजबूत करने में बड़ा योगदान दिया है। वास्तव में, भारतीय महिला असुरक्षित है, कहना एक मानसिकता का परिचायक है। अक्सर बेहद सुरक्षित लोग अपने को, और दूसरों को भी, असुरक्षित मानते हैं।

इस भाव को कोई बदल नहीं सकता। पर, दूसरी तरफ अगर हम सामान्य महिला समाज पर नजर डालें तो हमें भय और आतंक की जगह उम्मीद, उल्लास और नई कामनाएं नजर आएंगी। हर बच्ची या युवती आज निडर होकर अपना एक छोटा-सा सपना सजा रही है। इस सपने को देखने की सुरक्षा हमारे समाज ने दी है। बाकी सब उत्पीड़न खतरनाक जरूर है, और हमें उन्हें खत्म भी करना है, पर इन सबसे ज्यादा खतरनाक है सपनों का मर जाना। क्या हमारी महिलाओं के सपने मृत्प्राय हैं? या वे और परवान चढ़ रहे हैं? आप खुद आत्मविश्लेषण कर लें, जवाब मिल जाएगा।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App