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वक्त की नब्ज: सेक्युलरवाद बनाम सांप्रदायिकता

कभी-कभी ऐसा लगता है कि शायद झूठे सेक्युलरवाद से असली फिरकापरस्ती अच्छी है। पिछले हफ्ते आरएसएस के कुछ बड़े नेताओं ने पत्रकारों को बुला कर स्पष्ट शब्दों में कहा कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए सरकार मदद नहीं करती है, तो संभव है कि उनको फिर से रामजन्मभूमि आंदोलन शुरू करना पड़ेगा। अपना इरादा कम से कम संघ परिवार ने स्पष्ट कर दिया है।

Author November 4, 2018 4:02 AM
पिछले हफ्ते आरएसएस के कुछ बड़े नेताओं ने पत्रकारों को बुला कर स्पष्ट शब्दों में कहा कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए सरकार मदद नहीं करती है, तो संभव है कि उनको फिर से रामजन्मभूमि आंदोलन शुरू करना पड़ेगा। (फाइल)

झूठे सेक्युलरवाद की चादर ओढ़ कर राजनीतिक मैदान में उतरना हमारे राजनेताओं की आदत है। पिछले हफ्ते जब विपक्ष के बड़े-बड़े राजनेताओं को संगठित करने दिल्ली पहुंचे आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू, तो इस चादर को ओढ़ कर आए। पत्रकारों से कहा मुख्यमंत्रीजी ने कि सेक्युलरवाद को बचाने के लिए जरूरी हो गया है नरेंद्र मोदी को हराना। भूल गए थे शायद कि पिछले आम चुनाव में वे खुद उन्हीं लोगों से मिल कर चुनाव लड़े थे, जिन पर वे आज सेक्युलरवाद को खत्म करने का आरोप लगा रहे हैं। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर झूठ बोलने में हमारे राजनेता माहिर हैं। और हम हैं कि इतने आदी हो गए हैं उनकी झूठी भाषा के कि जवाबदेही मांगना भूल गए हैं। मगर असली सेक्युलरवाद हम मांगेगे नहीं अपने राजनेताओं से, तो एक दिन वही हाल हो जाएगा भारत का, जो आज पाकिस्तान का है। पिछले हफ्ते जब आसिया बीबी को गुस्ताख-ए-रसूल या ईश-निंदा के आरोप में निर्दोष पाया गया, तो मौलवियों ने सड़कों पर उतर कर न्यायाधीशों की हत्या का आदेश दिया अपने अनुयायियों को और इतना शोर मचाया इस मांग को लेकर कि साबित कर दिया कि आसिया बीबी और उसके परिवार के लिए पाकिस्तान में कोई जगह नहीं है, क्योंकि ऐसा देश है यह, जहां बस चलता है सिर्फ मौलवियों का। प्रधानमंत्री इमरान खान ने जब उनको खबरदार होने को कहा, तो उनके खिलाफ भी फतवा जारी किया गया और सेनाध्यक्ष के खिलाफ भी।

नवंबर का पहला हफ्ता मेरे लिए वैसे भी सेक्युलरवाद को याद करने का होता है, क्योंकि कभी भूल नहीं सकती हूं मैं 1984 में इस हफ्ते के वे घिनौने नजारे, जब दिल्ली की सड़कों पर तीन दिनों तक पड़ी रही थीं सिखों की अधजली लाशें। इतने लोग मारे थे ‘सेक्युलर’ कांग्रेस पार्टी के समर्थकों ने उन तीन दिनों में कि मुर्दाघरों में जगह खत्म हो गई थी। फिर जब इंदिरा गांधी के अंतिम संस्कार का दिन आया तो लाशों को सड़कों पर ही जला दिया गया, जैसे कूड़े के ढेर जलाए जाते हैं। पिछले हफ्ते दो जनसंहारों को याद करना पड़ा। 31 अक्तूबर को दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि हाशिमपुरा के जनसंहार के लिए जो सोलह पुलिसवाले दोषी पाए गए हैं, उनको आजीवन कारावास होनी चाहिए। ये उनमें से थे, जिन्होंने 1987 में बयालीस मुसलमानों को एक ट्रक में बंद करके गोलियों से भून डाला था। इनमें बच्चे भी थे, बूढ़े भी। इनकी लाशें गंग नहर में फेंक दी गई थीं और इनमें से अगर सात-आठ लोग बच न गए होते, तो इस जनसंहार की खबर तक दुनिया को नहीं मिलती।

सिखों को जब मारा गया इंदिरा गांधी की हत्या के बाद, तो पुलिस ने हिंसक कांग्रेस समर्थकों को अपना काम करने से रोका नहीं। हाशिमपुरा में पुलिसवाले खुद हत्यारे बने। कांग्रेस पार्टी के प्रधानमंत्री चूंकि झूठी सेक्युलरिज्म की चादर में हमेशा छिपे रहे, उन्होंने न्याय दिलाने की कोई कोशिश नहीं की, लेकिन जिन ‘सेक्युलर’ राजनेताओं का अब महागठबंधन बन रहा है, वे भी रहे हैं सत्ता में। उन्होंने क्यों नहीं कुछ किया? क्या उनका सेक्युलरवाद भी उतना ही झूठा है?
कभी-कभी ऐसा लगता है कि शायद झूठे सेक्युलरवाद से असली फिरकापरस्ती अच्छी है। पिछले हफ्ते आरएसएस के कुछ बड़े नेताओं ने पत्रकारों को बुला कर स्पष्ट शब्दों में कहा कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए सरकार मदद नहीं करती है, तो संभव है कि उनको फिर से रामजन्मभूमि आंदोलन शुरू करना पड़ेगा। अपना इरादा कम से कम संघ परिवार ने स्पष्ट कर दिया है। उधर कांग्रेस अध्यक्ष हैं, जो अपने आप को सेक्युलर भी कहते हैं गर्व से और उतने ही गर्व से अपने आप को जनेऊधारी ब्राह्मण और शिवभक्त भी कहते हैं। नकली सेक्युलरवाद से असली सांप्रदायिकता बेहतर नहीं है क्या?

नरेंद्र मोदी के दौर में दंगे-फसाद कम हुए हैं, लेकिन गोरक्षकों के हाथों मुसलमानों और दलितों पर हिंसक हमले हुए हैं गौमाता के नाम पर। जब आरोपियों को पकड़ा गया और साबित हुआ कि उनका सीधा रिश्ता संघ परिवार से है, तो कम से कम सच तो सामने आ जाता है। झूठे सेक्युलरवाद की चादर ओढ़े हुए राजनेताओं का असली चेहरा छिपा ही रहता है, सो मेरी नजर में ऐसे लोगों से देश को ज्यादा खतरा है। कांग्रेस पार्टी के आला नेता कई बार साबित करने का प्रयास करते हैं कि सेक्युलरवाद अगर है भारत में तो उनकी वजह से, लेकिन यह भी झूठ है। इतिहास गवाह है कि भारतीय संस्कृति में राजनीति और धर्म-मजहब के बीच फासला रखा गया है। यूरोप में धर्मगुरुओं के पास जैसे कभी सेनाएं होती थीं, वैसे भारत में कभी नहीं रहा, सो सेक्युलरवाद शब्द की कभी जरूरत ही नहीं रही। भारतीय राजनीति में इस शब्द का इस्तेमाल ज्यादातर तब हुआ है जब भारतीय जनता पार्टी को सांप्रदायिक साबित करने का समय आता है।

ऐसा होता आया है, लेकिन भविष्य में हमको अपने राजनेताओं से जवाब मांगना चाहिए। उनकी जिम्मेवारी होनी चाहिए असली सेक्युलरवाद में अपना विश्वास साबित करने की, क्योंकि अगर एक महत्त्वपूर्ण फर्क है भारत और पाकिस्तान में, तो वह सेक्युलरवाद ही है। पाकिस्तान पैदा हुआ है इस्लाम के नाम पर, सो शुरू से उस देश में मौलवियों का बोलबाला रहा है। आज उनकी आवाज इतनी ऊंची है कि पिछले हफ्ते जब आसिया बीबी को बरी किया गया और प्रधानमंत्री इमरान खान ने मौलवियों को अपने दायरे में रखने की कोशिश की, तो उन्होंने आसिया बीबी को सरेआम फांसी देने की धमकी दी। भारतीय राजनीति में बेशक आए होंगे योगी आदित्यनाथ जैसे धार्मिक लोग, लेकिन राजनीति और धर्म-मजहब में फासले बने रहे हैं और भविष्य में इन फासलों को और मजबूत करने की आवश्यकता है।

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