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वक्त की नब्जः राहुल की बचकानी बातें

कांग्रेस अध्यक्ष ने एक बार फिर दोहराया कि वे भारत के प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं, लेकिन शायद उन्होंने इस यथार्थ पर ध्यान नहीं दिया है अभी तक कि उनकी सीटें लोकसभा में इतनी थोड़ी हैं कि उनको नेता विपक्ष भी नहीं बनाया गया है।

Author October 7, 2018 4:35 AM
या तो वे खुद नहीं समझ पाए हैं कि उनको कांग्रेस अध्यक्ष होने के नाते कहना क्या चाहिए या उनके सलाहकार इतने सुस्त हैं कि दिल्ली के सुहाने वातावरण के बाहर निकलते ही नहीं हैं।

कुछ हफ्ते पहले भारतीय जनता पार्टी के एक वरिष्ठ नेता से मेरी बातचीत हो रही थी अगले आम चुनावों के बारे में। मैंने उनसे पूछा कि क्या उनको पूरा विश्वास है कि अगली बार भी मोदी की सरकार बनने वाली है, तो उन्होंने मुस्करा कर कहा, ‘हां। इसलिए कि राहुल गांधी इतनी बेवकूफी की बातें करते हैं कि वे जरूर नरेंद्र मोदी की मदद करेंगे।’ उस समय मैंने इस राजनेता की बातों को गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन पिछले दिनों ऐसा लगने लगा कि वास्तव में कांग्रेस अध्यक्ष मोदी की मदद कर रहे हैं बचकाना, बेतुकी बातें करके। या तो वे खुद नहीं समझ पाए हैं कि उनको कांग्रेस अध्यक्ष होने के नाते कहना क्या चाहिए या उनके सलाहकार इतने सुस्त हैं कि दिल्ली के सुहाने वातावरण के बाहर निकलते ही नहीं हैं। राहुलजी अपने बारे में कई बार गर्व से कह चुके हैं कि वे राजनीति में आए हैं सिर्फ इसलिए कि गरीबों, आदिवासियों, दलितों और पिछड़ों की आवाज बन सकें। ऐसा अगर मानते हैं तो अच्छा होगा अगर वे उन लोगों की बातें भी सुनने की कोशिश करें, जिनकी नुमाइंदगी करना चाहते हैं। उनकी बातें सुन रहे होते तो कभी न कहते मोदी के बारे में कि ‘देश का चौकीदार चोर है’, कभी न कहते कि भारत को मोदी से मुक्ति दिलाने के लिए एक नए स्वतंत्रता आंदोलन की आवश्यकता है। इसलिए कि जो लोग डीजल, पेट्रोल की बढ़ती कीमतों से परेशान हैं, जो लोग बेरोजगारी से बेहाल हैं, वे भी नहीं मानने को तैयार हैं कि मोदी चोर हैं।

यकीन के साथ इसलिए कह सकती हूं यह बात क्योंकि हाल में मैंने ग्रामीण क्षेत्रों के दौरों पर कई अति-गरीब, ग्रामीण लोगों से बातचीत की है राजनीति की और राजनेताओं के बारे में। जहां गई, जिनसे भी बातें हुर्इं उनमें सहमति दिखी इस बात पर कि मोदी जो भी कर रहे हैं, देश की बेहतरी के लिए कर रहे हैं। सबका कहना था कि सत्तर सालों की खराबियों को ठीक करना आसान नहीं है, लेकिन मोदी पूरा प्रयास कर रहे हैं दिन-रात। शिकायतें स्थानीय अधिकारियों और राजनेताओं के भ्रष्टाचार की थीं, लेकिन मोदी की नहीं।
रही बात नए स्वतंत्रता आंदोलन की, तो इसकी क्या जरूरत जब आम चुनावों के जरिए मोदी से मुक्ति पाने का मौका कुछ ही महीनों में आने वाला है। कांग्रेस अध्यक्ष के भारत के भावी प्रधानमंत्री बनने के सपने लेकिन तभी साकार होंगे, जब उनकी तरफ से कोई नई नीतियां, कोई नई दृष्टि दिखने लगेगी। फिलहाल ऐसा नहीं है।

पिछले हफ्ते उन्होंने हिंदुस्तान टाइम्स लीडरशिप समिट में एक लंबा इंटरव्यू दिया, इस अखबार की मालकिन शोभना भरतीया को, जिसमें उन्होंने उसी किस्म की बचकानी बातें कीं, जो हम उनसे सुनते आए हैं। सो, कह दिया बिना सोचे कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग पर कब्जा करना चाहता है। क्या जानते नहीं हैं राहुलजी, कि सर्वोच न्यायालय पर कब्जा करने की कोशिश भारत के इतिहास में एक ही बार की थी किसी राजनेता ने और वह थीं उनकी दादीजी? इमरजेंसी के दौर में उन न्यायाधीशों को इंदिरा गांधी ने हटा दिया था, जिन्होंने उनकी तानाशाही पर मोहर लगाने से इंकार किया था। याद रखिए कि उस दौर में भारतवासियों के तमाम बुनियादी अधिकार छीन लिए गए थे। चुनाव आयोग का यह हाल रहा है कांग्रेस के दौर में कि दरबारियों को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया जाता था और कई बार रिटायर होने के बाद वे कांग्रेस सरकारों में मंत्री बने हैं और राज्यसभा के सदस्य भी।

जब राहुलजी से पूछा गया कि प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी पाकिस्तान के साथ क्या नीति रहेगी, तो उन्होंने सिर्फ इतना कहा, ‘पाकिस्तान हमारा विशेष पड़ोसी है।’ न जिहादी आतंकवाद के बारे में एक शब्द और न ही हाल में पाकिस्तान के विदेशमंत्री द्वारा लगाए उस आरोप के बारे में कि भारत जिम्मेवार है उस घिनौने आतंकवादी हमले के लिए, जो पेशावर के सैनिक स्कूल में हुआ था कुछ साल पहले, जिसमें सौ से ज्यादा बच्चों को मारा गया था। राहुलजी शायद जानते नहीं हैं कि ग्रामीण मतदाता पहले से कांग्रेस पार्टी से इसलिए नाराज हैं कि मणिशंकर अय्यर ने पाकिस्तान की जमीन से मोदी को हटाने की मांग की थी। इस सम्मेलन में कांग्रेस अध्यक्ष ने एक बार फिर दोहराया कि वे भारत के प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं, लेकिन शायद उन्होंने इस यथार्थ पर ध्यान नहीं दिया है अभी तक कि उनकी सीटें लोकसभा में इतनी थोड़ी हैं कि उनको नेता विपक्ष भी नहीं बनाया गया है।

इस बात पर भी शायद ध्यान नहीं दिया है कि 2014 के आम चुनावों में कांग्रेस की हार का असली विश्लेषण नहीं हुआ है पार्टी के अंदर। सो, जब भी किसी वरिष्ठ कांग्रेसी नेता से पूछा जाता है कि देश के इस सबसे पुराने राजनीतिक दल का क्यों इतना बुरा हाल हो गया है कि लोकसभा में सिर्फ चौवालीस सीटें मिली हैं, तो उसका एक ही जवाब होता है, ‘मोदी की मार्केटिंग हमसे अच्छी थी। झूठ और जुमलेबाजी का सहारा लेकर वे प्रधानमंत्री बने हैं।’ इससे अच्छा विश्लेषण तो वे गरीब ग्रामीण मतदाता करते हैं, जिनकी नुमाइंदगी करने राहुल गांधी राजनीति में आए हैं। मैंने अपने ग्रामीण दौरों पर गांव-गांव में सुना कि मोदी 2014 में जीते इसलिए कि लोग परिवर्तन और विकास चाहते थे। इन लोगों से जब मैंने पूछा कि क्या अब मायूस हैं कि इतना कम परिवर्तन आया है उनके जीवन में, तो उनका जवाब अक्सर यही रहा- मोदी कोशिश कर रहे हैं। सत्तर सालों में जो खराबियां आई हैं उनको सुधारने में समय तो लगेगा ही।

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