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वक्त की नब्जः जुमलेबाजियों का दौर

शुरुआत हुई, जब राहुल गांधी चुनाव हारने के बाद अपनी लंबी विदेशी छुट्टी के बाद वापस वतन लौटे नई ऊर्जा से चमकते हुए। लोकसभा में पहुंचते ही प्रधानमंत्री पर ताना कसा कि वे ‘सूट-बूट की सरकार’ चला रहे हैं।

भारतीय जनता पार्टी के एक वरिष्ठ नेता से मिलने गई कुछ दिन पहले। इधर-उधर की बातें करने के बाद मैंने उनसे पूछा कि क्या उनको पूरा विश्वास है कि नरेंद्र मोदी अगले चुनावों के बाद भी प्रधानमंत्री बनेंगे। इस सवाल को सुनते ही उनके चेहरे पर अजीब मुस्कुराहट आई और उन्होंने कहा, ‘हां, इसलिए क्योंकि राहुल गांधी अभी तक पप्पू ही रहे हैं।’ शायद। लेकिन इस ‘पप्पू’ को आज काफी भारतवासी एक राजनेता के रूप में देखने लगे हैं और इसका दोष भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और प्रवक्ताओं का ही है। ‘पप्पू’ को राजनेता इन्होंने बनाया।

शुरुआत हुई, जब राहुल गांधी चुनाव हारने के बाद अपनी लंबी विदेशी छुट्टी के बाद वापस वतन लौटे नई ऊर्जा से चमकते हुए। लोकसभा में पहुंचते ही प्रधानमंत्री पर ताना कसा कि वे ‘सूट-बूट की सरकार’ चला रहे हैं। इस ताने के बाद प्रधानमंत्री जैसे घबरा से गए और देश की आर्थिक दिशा बदलने का अपना वादा भूल कर उसी रास्ते पर लौट आए, जिस पर कांग्रेस की सरकारें चलती आई हैं नेहरूजी के दौर से। जिस व्यक्ति को देश के मतदाताओं ने पूर्ण बहुमत दिया था आर्थिक परिवर्तन लाने के नाम पर, इस ताने से डर गए। न डरे होते मोदी तो हो सकता है अब तक भारत के सरकारी बैंकों का निजीकरण हो गया होता और वे इस हाल में नहीं होते, जो आज हैं।

न डरे होते मोदी, तो एयर इंडिया जैसी सरकारी कंपनियां, जिन्होंने जनता का पैसा दशकों से हजम किया है, बिना कोई लाभ दिए, वे भी शायद बिक गई होतीं। काश कि मोदी ने राहुल गांधी के उस ताने का जवाब इस तरह दिया होता : मेरा सपना है कि वह दिन जल्दी आएगा जब गरीब से गरीब भारतीय के पास क्षमता होगी सूट और बूट खरीदने की। ऐसा करने के बदले मोदी वही भाषा बोलने लगे, जो हम सुनते आए हैं इंदिरा गांधी के जमाने से। यानी गरीबों के लिए मेरी सरकार घर बानाएगी, स्वास्थ्य बीमा देने का काम करेगी, इलाज का पैसा उपलब्ध कराएगी, आदि। बिलकुल वैसे जैसे उस पुराने दौर में काले धन की खोज हुआ करती थी, उसी तरह मोदी ने काले धन की तलाश शुरू की। नोटबंदी इसी कारण हुई।

प्रधानमंत्री के नक्शे-कदम पर चलने लगे उनके साथी। जब भी राहुल गांधी का कोई बयान आता, उस पर टिप्पणी करने लगे मोदी के मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता। सो, पिछले सप्ताह जब कांग्रेस अध्यक्ष ने जर्मनी में एक सवाल का जवाब देते हुए स्वीकार किया कि भारत में सभ्यता है कि मर्द औरतों को अपने से छोटा समझते हैं और इससे शुरू होता है औरतों का अपमान और अत्याचार, तो भाजपा प्रवक्ता आ टपके टीवी पर। चिल्लाने लगे कि भारतीय संस्कृति का अपमान किया है कांग्रेस अध्यक्ष ने। जानबूझ कर गलत मतलब निकाल कर कहने लगे कि मानसिकता की बात करते, तो हमको एतराज न होता, लेकिन भारतीय संस्कृति का अपमान बर्दाश्त नहीं होगा।

याद दिलाया राहुल गांधी को कि यह वही संस्कृति है, जिसने उनकी इटालियन माताजी को देश के असली प्रधानमंत्री के रूप में एक दशक तक स्वीकार किया। याद यह भी दिलाया कि भारत महान देश है और भारतीय संस्कृति भी महान है। भारतीय संस्कृति में न उलझ गए होते भाजपा प्रवक्ता, तो शायद उनको ध्यान आया होता कि सबसे बड़ी गलती राहुल गांधी के इस भाषण में थी कि उन्होंने आइएसआइएस के जन्म का कारण मुसलिम युवाओं में बेरोजगारी बताया। अबू बकर अल-बगदादी ने पिछले हफ्ते साबित करने की कोशिश की कि वह जिंदा है। बगदादी उस खिलाफत का सरगना था, जिसमें आइएसआइएस ने दो वर्ष से ज्यादा राज किया। उसने कांग्रेस अध्यक्ष का भाषण सुना होगा, तो हैरान हुआ होंगा।

इसलिए कि उसने कई बार कहा है कि उसके जिहाद का मकसद है इस्लाम का झंडा फिर से उन देशों में फहराना, जहां कभी लहराया करता था। इस मकसद को हासिल करने के लिए ही यूरोप के शहरों में बार-बार आइएसआइएस के जिहादी हमले किए गए थे। इसी मकसद से अमेरिकी और यूरोपीय पत्रकारों के गले काटे गए थे खिलाफत जब सलामत थी और इन बर्बर हत्याओं के विडियो इंटरनेट पर अपलोड किए गए थे जिहादियों को प्रेरित करने के लिए। इसी मकसद से इसाई महिलाओं और बच्चियों को बाजारों में गुलाम बना कर बेचा गया था। क्या यह सब हुआ सिर्फ इसलिए कि मुसलिम युवक बेरोजगार थे?

भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ताओं ने इस बयान का भी उलटा मतलब निकाल कर यह समझा कि कांग्रेस अध्यक्ष कहना चाहते हैं कि भारत के मुसलमानों की चूंकि मोदी के दौर में गोरक्षकों ने सरेआम हत्याएं की हैं अब अपने देश में मुसलिम नौजवान जिहादी आतंकवाद के रास्ते पर चल पड़ेंगे। राहुलजी ने इशारा इस तरफ जरूर किया था, लेकिन असली गलतबयानी उन्होंने तब की जब आइएसआइएस की अंतरराष्ट्रीय भूमिका का जिक्र कर रहे थे। इतनी बेअक्ली दिखाई, इसमें कि डर लगता है कि अगर कभी बन जाते हैं भारत के प्रधानमंत्री भविष्य में, तो उनकी विदेश नीति क्या होगी!

राहुल जी का भाषण बचकाना था, बेतुका था, लेकिन आज इस पर हम जैसे लोग लंबे-लंबे लेख लिख रहे हैं, तो इसलिए कि हाल में किए गए सर्वेक्षण बता रहे हैं कि अब उनकी हैसियत इतनी बढ़ गई है कि आम भारतीय मानने लगे हैं कि अगले लोकसभा चुनावों में वे मोदी को चुनौती दे सकते हैं। इस मुकाम पर पहुंचाया है राहुल गांधी को भारतीय जनता पार्टी के आला नेताओं और प्रवक्ताओं ने, वरना जिस दल के पास लोकसभा में सिर्फ चौवालीस सीटें हों, उस दल के अध्यक्ष की हैसियत इतनी बड़ी कभी न बन गई होती।

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