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चर्चाः उच्च शिक्षा की साख: उच्च शिक्षा के सामने यक्ष प्रश्न

आज उच्च शिक्षा का यह महत्त्वपूर्ण मानवीय उत्तरदायित्व बनता है कि वह उस भाईचारे को प्रखरता दे, जिसके आधार पर भारत ने हर प्रकार की विविधता के साथ रहना सीखा था, हर एक को स्वीकार करने का अद्भुत उदाहरण विश्व के समक्ष रखा था। यह अनुकरणीय था और आगे भी रास्ता केवल यही है।

उच्च शिक्षा से अपेक्षाओं की सूची में जीविकोपार्जन के लिए योग्यता और कौशल, समाज तथा परिवार के प्रति कर्तव्यों की समझ और उनका निर्वहन और चरित्र निर्माण सदा दोहराए जाते रहे हैं।

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक तरफ सरकारी संस्थानों की दुर्दशा, तो दूसरी तरफ निजी संस्थानों के फलते-फूलते जाने को लेकर लगातार बहसें होती रही हैं। सरकारी संस्थानों में शिक्षा के गिरते स्तर के पीछे अक्सर धन की कमी और अच्छे शिक्षकों के अभाव को बड़ा कारण बताया जाता है। पर कुछ लोगों का यह भी मानना है कि इन संस्थानों की गिरती साख के पीछे धन की कमी नहीं, बल्कि उनमें पढ़ाई-लिखाई को लेकर नए प्रयोगों के प्रति उदासीनता बड़ी वजह है। इस बार की चर्चा उच्च शिक्षा की वर्तमान स्थिति पर। – संपादक

उच्च शिक्षा से अपेक्षाओं की सूची में जीविकोपार्जन के लिए योग्यता और कौशल, समाज तथा परिवार के प्रति कर्तव्यों की समझ और उनका निर्वहन और चरित्र निर्माण सदा दोहराए जाते रहे हैं। वैश्वीकरण की चमक-दमक में अपेक्षाओं और आकांक्षाओं की सूची लंबी होती गई है। मूल लक्ष्य और उद्देश्य संरक्षित रखते हुए भी शिक्षा व्यवस्थाओं को अपने कलेवर को लगातार गतिशील बनाए रखना आवश्यक होता है। किसी भी देश की शिक्षा-व्यवस्था की स्थिति की सही और सार्थक समझ के लिए वहां की ज्ञानार्जन परंपरा के सामाजिक-सांस्कृतिक पक्षों को जानना आवश्यक है। हर सभ्यता के विकास की कहानी उसकी ज्ञान-परंपरा के संबल पर ही आगे बढ़ी है। उच्च शिक्षा संस्थान संचित ज्ञान को आगे बढ़ाते हैं, शोध-नवाचार करते हैं और ऐसी भावी पीढ़ी तैयार करने का प्रयास करते हैं, जो भविष्य निर्माण में सजग योगदान करने को तैयार हो। यहां विद्यार्थी यह जानने का प्रयास करते हैं कि उनके देश की ज्ञानार्जन परंपरा की सार्वभौमिकता कब और कैसे अवरुद्ध हुई; या की गई और उसका अब अंतरराष्ट्रीय पटल पर क्या स्थान है?

तेजी से बढ़ रहे ज्ञान के अनेक क्षेत्र नई चुनौतियां भी पेश कर रहे हैं, जिनसे मानव जीवन का कोई अंग अछूता नहीं रह सका है। इक्कीसवीं शताब्दी ‘परिवर्तन की गति’ की सदी है। इसे ‘एज ऑफ एक्सेलरेसन्स’ नाम दिया गया है। भारत के सभी लोग यहां की गौरवशाली ज्ञानार्जन परंपरा पर गर्व करते हैं। तक्षशिला, विक्रमशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों की प्राचीन काल में रही उपस्थिति वैश्विक ज्ञान-परंपरा की अनमोल धरोहर है। ईसा-पूर्व सात सौ से छठी शताब्दी तक तक्षशिला साठ देशों के विद्यार्थियों को आकर्षित करता रहा। बाद में यह उन आक्रांताओं द्वारा नष्ट किया गया, जो सभ्यता और संस्कृति में भारत से बहुत पीछे और ज्ञान, संस्कृति, मानवीय मूल्य और मानवीयता की समझ पाने से परे थे। यह विश्वविद्यालय 1200 ई. तक बना रहा। दस हजार विद्यार्थी, डेढ़ हजार अध्यापक और एक सात का शिक्षक छात्र अनुपात! निश्शुल्क शिक्षा, प्रवेश द्वार पर बैठे द्वार-पंडित की अनुशंसा पर! इसे बख्तियार खिलजी ने नष्ट किया।

जब नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों को समाप्त किया जा रहा था, तब यूरोप में आधुनिक विश्वविद्यालयों का उदय हो रहा था। 1857 में जब अंग्रेजों ने भारत में कलकत्ता, मद्रास और बंबई में विश्वविद्यालय स्थापित किए तब उन्होंने लंदन विश्वविद्यलय के ‘मॉडल’ को यहां भी जैसे का तैसा अपनाया। लंदन विश्वविद्यालय केवल परीक्षाएं लेता था। यहां भी यही प्रारंभ हुआ। भारत आज भी परीक्षा और अंकों के आतंक से मुक्त नहीं हो पाया है। आज यह भली भांति समझ लिया गया है कि प्रगति और विकास के मार्ग पर चलने के लिए रास्ता एक ही है: शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार! आजादी के बाद से ही भारत के विश्वविद्यालयों ने भी इसे पहचाना, क्रियान्वित किया और अंतरराष्ट्रीय स्तर का शोध कठिन परिस्थितियों में कर के दिखाया है।

इसके लिए नए संस्थान और शोध प्रयोगशालाएं भी स्थापित की गर्इं। यह भी सही है कि देश में विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ने के साथ उनकी साख और संसाधनों में कमी आई है। हर नए विश्वविद्यालय के समक्ष ये दो बड़ी चुनौतियां अब उभर रही हैं। परिस्थितियां कितनी ही कठिन क्यों न हों, हर विश्वविद्यालय को अपने मूल कर्तव्य को पहचानना आवश्यक है। विश्वविद्यालय के लक्ष्य और कार्यक्षेत्र तो वैश्विक ही हो सकते हैं, स्थानीयता का महत्त्व वैश्विक संदर्भ में देख पाना हर विश्वविद्यालय का नैसर्गिक उत्तरदायित्व बनता है। अनुभवों की नींव पर और भविष्य के प्रति सम्यक दूरदृष्टि अपना कर ही विश्वविद्यालय अपने लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं।

वर्तमान समय में पुराने और नए विश्वविद्यालय अपने को नए परिवेश में कैसे ढालें यह एक यक्ष प्रश्न उच्च शिक्षा में तेजी से उभरा है। आज की परिस्थिति में- और अपने दो सौ वर्षों में निर्मित दृष्टिकोण के प्रभाव में- हमारी पहली प्राथमिकता विदेशों के कुछ नामी-गिरामी विश्वविद्यालयों की नकल करने की ही बनती है। किसी भी सारगर्भित चर्चा में कुल मिला कर यही निष्कर्ष निकालता है कि हमें हारवर्ड, एल, आक्सफर्ड, एमईटी, आदि जैसा बनना है। लगभग हर बार यह भुला दिया जाता है कि कोई भी बड़ा विश्वविद्यालय किसी की नकल करके कभी नहीं बना। निजी क्षेत्र में वह अपने उद्देश्यों की जन-स्वीकार्यता और नवाचार की संकल्पना करने वाले की कर्मठता, पारदर्शिता और लगन पर प्रस्फुटित होता है।

सरकारों द्वारा स्थापित संस्थान तभी सफल हो पाते हैं जब उन्हें शुरू में सही नेतृत्व और समुचित संसाधन मिल सकें। यह अब सर्व-स्वीकार्य है कि हर देश की शिक्षा-व्यवस्था की जड़ें उस देश की मिट्टी और संस्कृति में गहराई तक जानी चाहिए और उसे प्रगति के प्रति प्रतिबद्ध होना चाहिए। हर प्रकार के ज्ञान और विचारों को जानने, विश्लेषित करने तथा उसमें से उपयोगी को ग्रहण करने की तैयारी और क्षमता हर विश्वविद्यालय में होनी ही चाहिए। इस प्रकार विकसित शिक्षा प्रणाली की ही वर्तमान और भविष्य में सफल होने की संभावना बनती है। उसकी गतिशीलता, नवाचारों और शोध के प्रति प्रतिबद्धता भविष्य की सफलता से सीधे अनुपात में जुड़ती है।

नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री और चिंतक गुनार मिर्डल की पुस्तक ‘एशियन ड्रामा’ 1968 में छपी और सारे विश्व में चर्चित हुई। उसी वर्ष इंदौर विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में दौलत सिंह कोठारी ने उस पुस्तक में से एक उद्धरण दिया था: ‘आज दक्षिण एशिया में हम देखते हैं कि आधुनिकीकरण की विचारधारा से- जो प्राथमिक रूप से पाश्चात्य आदर्शों, साम्यवादी सिद्धांतों के प्रभावस्वरूप अवसरों की समानता पर बल दे रही है- किस प्रकार प्रेरित होकर कुछ थोड़े से विद्वान नेता शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी सुधार करने के लिए युद्धग्रस्त हैं। हम यह भी देखते हैं कि कुछ स्वार्थी लोग इन सुधारों को लागू होने से रोक रहे हैं या उनको कमजोर बना रहे हैं। अन्य बहुत-सी बातों की भांति इस बात में भी हमें प्रजातांत्रिक और निरंकुश शासन वाले देशों के बीच में थोड़ा ही अंतर दिखाई पड़ता है।

साम्यवादी चीन से जो दौड़ हो रही है उसका क्या परिणाम होगा, यह अधिकतर इस बात पर निर्भर करेगा कि विभिन्न राजनीतिक प्रणालियों वाले दक्षिण एशिया के देशों में, चीन की भांति अपनी शिक्षा संस्थाओं को सुधारने का निश्चय है या नहीं।’ आधी सदी पहले भी यह ज्ञात था कि शिक्षा सुधारों से अधिक महत्त्वपूर्ण सुधार कोई हो ही नहीं सकता था। इसके लिए राष्ट्रीय इच्छाशक्ति और प्रतिबद्धता के अभाव में समेकित प्रगति और विकास के सपने गति नहीं पकड़ पाएंगे। ऐसा न हो पाने के जो भी कारण रहे हों; यह निष्कर्ष आज भी स्वीकार्य होना चाहिए कि अच्छी गुणवत्ता वाली उच्च शिक्षा चीन में इसलिए पनप सकी, क्योंकि वहां स्कूली शिक्षा में वर्ग-भेद पैदा नहीं होने दिया गया, और प्रारंभ में उचित संसाधन तथा अनुशासन-पूर्वक समाज का सहयोग उपलब्ध कराया गया। भारत में प्रारंभ से निजी स्कूलों को संपन्न तथा शिक्षित वर्ग का जो प्रश्रय मिला, उससे सरकारी स्कूलों से ध्यान हटा, उनकी साख लगातार घटी और आज खाई इतनी गहरी हो चुकी है कि उसे भरने के लिए कोई भी प्रयास तक करने को तैयार नहीं है! आज नहीं तो कल इसे भरना ही होगा। शायद उच्च शिक्षा प्राप्त साधन संपन्न वर्ग के युवा ही आगे आएंगे और वंचित वर्ग को शिक्षा में समान भागदारी और सफलता के अवसर प्रदान करने के रास्ते खोज लेंगे।

हर पीढ़ी को अपना रास्ता स्वयं तय करना होता है, इसीलिए उसे देश-काल-परिस्थिति को जान-समझ कर निर्णय करने का अधिकार प्रकृति-प्रदत्त है। अगर हर पुत्र पिता के रास्ते पर ही चलता तो शायद सभ्यता का विकास हो ही नहीं पाता! विकास और प्रगति तो उन्हीं के कारण संभव है जो अलग से, लीक से हट कर सोचने की प्रतिभा विकसित कर लेते हैं। विश्वविद्यालय का कार्य विद्यार्थी को इस प्रकार तैयार करने का होता है कि उसका चिंतन प्रस्फुटित हो और अधिक से अधिक प्रखर होता रहे। अगर यह सघनता से किया जाए तो उच्च शिक्षा प्राप्त कर ज्ञान तथा विश्लेषण के कौशल से परिपूर्ण व्यक्ति कभी भी केवल स्व-केंद्रित बन कर जीवन नहीं जिएगा। शिक्षा किसी भी स्तर पर क्यों न हो, उसका लक्ष्य एक ही होता है- व्यक्ति मनुष्यत्व की राह पर आगे बढ़ता रहे, मानव-मात्र की एकता को समझे, समाज में अपना स्थान समझे और अपना योगदान निर्धारित करे, उन जन्मजात ऋणों को चुकाए, जिनके द्वारा उसका अपना जीवन जीने लायक होता है।

मनुष्य को सभ्य और सामाजिक बनाने में हर धर्म के योगदान से हर बच्चे को आवश्यक रूप से परिचित कराना ही चाहिए। बच्चे हर धर्म के मूल सिद्धांत को जानें, समानताओं से परिचित हों और जहां-जहा अंतर है, उनका आदर करना सीखें। ऐसे में बचपन से ही उनमें विविधता की स्वीकार्यता की प्रवृत्ति आत्मसात हो जाएगी और यह सामजिक जुड़ाव की नीव बनेगी। इस राह पर चल कर ही व्यक्ति वैश्विक पटल पर मनुष्य-मात्र की एकता की उपस्थिति और विविधताओं और भिन्नताओं को समझ सकता है। आज जब विश्व में अब तक एकांगी रहे समाज बहुभाषी, बहुपंथी और अनेक संस्कृतियों वाले बन रहे हैं, आज उच्च शिक्षा का यह महत्त्वपूर्ण मानवीय उत्तरदायित्व बनता है कि वह उस भाईचारे को प्रखरता दे, जिसके आधार पर भारत ने हर प्रकार की विविधता के साथ रहना सीखा था, हर एक को स्वीकार करने का अद्भुत उदाहरण विश्व के समक्ष रखा था। यह अनुकरणीय था और आगे भी रास्ता केवल यही है।

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