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‘पुस्तकायन’ कॉलम : अस्मिता के आयाम

अपने होने को सार्थकता प्रदान करना, किसी वर्चस्व या अधिनायकवाद के विरुद्ध खड़ा होना और किसी अधीनता/ गुलामी को स्वीकार न करना अस्मिता है।

Author नई दिल्ली | Published on: July 24, 2016 5:45 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

कविता भाटिया की नई आलोचना-कृति है अस्मिता बोध के विविध आयाम। ‘अस्मिता: एक प्रत्यय और आधुनिक भारतीय जीवन के संकट’ अध्याय में कविता ने एक प्रत्यय के रूप में अस्मिता के अर्थ को समझाने की कोशिश की है। भारत समेत दक्षिण एशियाई देशों की स्थिति हो या मध्य-पूर्व देशों की, लैटिन अमेरिकी देशों का परिदृश्य हो या अफ्रीकी देशों का मामला, हर जगह अस्मिता की चिंता संघर्षशील जन-समुदाय के साथ खड़ी दिखती रही है। अस्मिता एक ऐसा अवधारणामूलक शब्द है, जिसके भीतर मानवीय सभ्यता-विमर्श के कई उच्चावच हमें सहज ही देखने को मिल जाते हैं। ऐसे में कुछ हद तक संश्लिष्ट इस संकल्पना पर पूरी तैयारी के साथ कविता हमारे समक्ष अपनी यह आलोचना-पुस्तक लेकर आई हैं।
सब कुछ एक साथ रख देने की हड़बड़ी से मुक्त कविता क्रमवार विषयों और मुद्दों से जुड़े विभिन्न पक्षों पर आवश्यक चर्चा करती हैं। उन्होंने सोपानीकृत समाज-व्यवस्था में अलग-अलग वर्गों, समुदायों और जातियों की अस्मिताओं का समुचित मूल्यांकन किया है। इस पुस्तक में अस्मिता से जुड़े विभिन्न आयामों और उनके संदर्भों की विस्तारपूर्वक चर्चा की गई है। कविता भाटिया ने उचित ही दलित और आदिवासी अस्मिताओं पर अलग-अलग अध्याय रखते हुए इनकी चर्चा मध्यकाल के भक्ति आंदोलन से लेकर आधुनिक काल के प्रगतिशील आंदोलन तक की पृष्ठभूमि में की है। दलितों के प्रति विभिन्न राजनीतिक दलों के रवैए को लेकर एक निरपेक्ष अध्ययन यहां देखने को मिलता है। उस सांस्कृतिक वर्चस्ववाद की भी चर्चा है, जो छोटी-छोटी कई आंचलिक संस्कृतियों को अपने भीतर समाहित करने की चेष्टा करता है।

‘आधुनिक भारतीय जीवन-संकट’ अध्याय में भारत के विभिन्न कालों में व्याप्त परंपराओं, लोक रूपों, धर्मों, प्रवासन आदि के मध्य, औपनिवेशिकता और राष्ट्रीयता के संघर्षों के बीच अस्मिता और उसके लिए संघर्षरत भारतीय समाज के विभिन्न रूपों और पड़ावों का वर्णन किया गया है। विभिन्न रचनाओं के पात्रों को उद्धृत करते हुए कविता परंपरा और आधुनिकता के बीच कहीं पड़ी अस्मिता और उसके विमर्श को हमारे सामने लाती हैं। इस अध्याय के अंत में वे लिखती हैं: ‘निरंतर अपने विकास की उपलब्धियों का बखान करते देश में जहां आज भी कुछ सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक शक्तियां मनुष्य को मनुष्य मानने से इंकार करती हो तो ऐसे समय में नए द्वंद्वों और चुनौतियों का उभरना स्वाभाविक है। यही अवमानना और अपमान उत्पीड़ित की शक्ति बन जाता है और अस्मिता से आगे बढ़ कर मुक्ति के रूप में उभरता है।’

इस विषय पर आगे के अध्याय में आंबेडकर के लिखे को और उनकी दृष्टि को उचित ही शामिल किया गया है। ‘उत्तर आधुनिकतावादी भूमंडलीय विचार और अस्मिता का नया संकट’ अध्याय को कविता ने बड़े मनोयोग से लिखा है। कविता, चूंकि खुद एक कवयित्री हैं, इसलिए कई कवियों की कुछ महत्त्वपूर्ण पंक्तियों की ओर उनका ध्यान सहज ही जाता है। इससे उनके गद्य को एक काव्यपरक फलक से प्रक्षेपित होने में सुविधा मिल जाती है।

उल्लेखनीय है कि लेखिका ने अस्मिता की बात करते हुए हर तरह के लोगों के वाजिब हक की बात की है। खासकर उनका ध्यान समाज के हाशिए पर रह रहे लोगों की जीवन शैली पर विशेष रूप से गया है। तभी तो उनकी चर्चा के केंद्र में स्त्री और वृद्ध आते हैं, तो दलित और आदिवासी भी। गांव और कस्बा आता है तो हमारे समाज में उपेक्षित रहती आर्इं वेश्याएं और किन्नर भी उनके अध्ययन के दायरे में हैं। कुल मिलाकर अपने इस विमर्श के केंद्र में कविता हर वर्ग, जाति, लिंग, धर्म आदि के सदस्यों को शामिल करती हैं। ‘अवमानना की संस्कृति और हाशिए की अस्मिता’ शीर्षक अध्याय में लेखिका ने स्त्री संघर्ष के विभिन्न रूपों को खासतौर से रेखांकित किया है। उनके लेखन में अनसुनी आवाजों को जगह देने की वकालत और निष्ठा स्पष्ट दिखती है। रूढ़िबद्ध मान्यताओं को तोड़ने की संस्कृति कई बार अवमानना की संस्कृति करार दी जाती है, जिसे लेखिका ने उसके मूल उत्स में जाकर पकड़ने की एक पूर्वाग्रहमुक्त कोशिश की है।

बावजूद इसके कि एकाधिक जगहों पर सरलीकरण देखने को मिलता है, कविता भाटिया की आलोचना में यथासंभव एक प्रभावी गद्य का निर्वहन हो सका है। मसलन, अंतर्राष्ट्रीयतावाद और उसके विभिन्न रूपों का दबाव’ शीर्षक अध्याय में पेटेंट के पीछे की राजनीति और अवसरवादिता पर टिप्पणी करती प्रयाग शुक्ल की कविता ‘यह जो हरा है’ को उद्धृत करते हुए कविता अपनी टिप्पणी कुछ इस अंदाज में करती हैं, ‘बहुराष्ट्रीय यथार्थ में प्रकृति के उपकेंद्र द्वारा प्रतिरोध इसी तरह संभव है कि ‘याद’ को ‘स्मृति’ का अस्त्र बनाया जाए।’

अपने होने को सार्थकता प्रदान करना, किसी वर्चस्व या अधिनायकवाद के विरुद्ध खड़ा होना और किसी अधीनता/ गुलामी को स्वीकार न करना अस्मिता है। ऐसे में, बाजारीकरण के प्रभाव में स्त्री और आदिवासी अस्तित्व का दोहन (देह-प्रदर्शन, उत्तेजना-प्रधान भित्ति-चित्रों और मूर्तिकला, उन्मुक्त जीवन-शैली आदि सहित भौतिक और अभौतिक संस्कृति दोनों का बाजार में विपणन करने या उसमें सहयोग देने के लिए उपयोग में लाने के विशेष संदर्भ में) अलग-अलग कारणों से तो हुआ है, मगर उन्हें समुचित और सम्मानजनक रूप में अपनी अस्मिता का देय नहीं मिल पाया है। हां इतना अवश्य है कि सामूहिक अस्मिता के पक्ष की लड़ाई में व्यक्ति अकेला नहीं होता। अगर प्रकृति के संसाधनों और शक्ति के अन्य स्रोतों का वितरण समान रूप से नहीं होगा और उन पर अधिकार कुछ विशिष्ट वर्गों तक ही सीमित रहेगा तो ऐसे में मानवीय अस्मिताएं निरंतर खतरे में रहेंगी और उनके बीच शांति और सद्भाव की उम्मीद करना बेमानी होगा। कविता भाटिया अपने इस आलोचनात्मक ग्रंथ में उचित ही इन चुनौतियों का जिक्र करती हैं। उनके लिए अस्मिता एक ऐसा आलोचकीय टूल है, जिसके बहाने वैश्विक और स्थानीय दोनों स्तरों पर वे मनुष्य-मनुष्य के बीच फैली विषमता के मुद्दों को उसके वर्तमान और अतीत से कड़ीबद्ध करती हुई देखती और रखती हैं।

अर्पण कुमार
अस्मिता बोध के विविध आयाम: कविता भाटिया; सामयिक बुक्स, 3320-21 जटवाड़ा दरियागंज, एनएस मार्ग, नई दिल्ली; 495 रुपए।

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