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वक्त की नब्जः रहबरी का सवाल है

वर्तमान में वही हो रहा है, जो होता आया है दशकों से, लेकिन मोदी की समस्या यह है कि उन्होंने परिवर्तन का वादा किया था। अफसोस कि परिवर्तन सिर्फ यह आया है कि जो चीजें कांग्रेस सरकारों ने बड़ी समझदारी से की थीं, उन चीजों को मोदी सरकार अनाड़ियों की तरह कर रही है।

Author October 28, 2018 3:54 AM
दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में चर्चा रही है कि प्रधानमंत्री इस झगड़े में पक्ष लेते हैं उस व्यक्ति का, जिसे उन्होंने खुद गुजरात से लाकर सीबीआई में बिठाया है।

बहुत सोचा, बहुत समझने की कोशिश की, लेकिन समझ नहीं पाई हूं कि अंधेरे का सहारा लेने की जरूरत क्या थी केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के निदेशक की जगह किसी और को बिठाने के लिए। महीनों से देश जानता है कि सीबीआई के निदेशक और उपनिदेशक के बीच गंभीर किस्म का घमासान चल रहा था। हर दूसरे-तीसरे दिन सुर्खियों में रहा है यह घमासान और दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में चर्चा रही है कि प्रधानमंत्री इस झगड़े में पक्ष लेते हैं उस व्यक्ति का, जिसे उन्होंने खुद गुजरात से लाकर सीबीआई में बिठाया है। सो, अगर सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना को ‘छुट्टी’ पर भेजना ही था, तो इस काम को देर रात को क्यों करना पड़ा? इसको भी ऐसे चोरी-छिपे किया गया जैसे किसी घटिया हिंदी फिल्म में घटिया किस्म के पुलिसवाले करते हैं।

क्या प्रधानमंत्री के आदेश पर ऐसा हुआ? अगर उनके आदेश के बिना हुआ, तो उनको फौरन कुछ कहना चाहिए था, लेकिन चुप रहे। उनकी तरफ से सफाइयां दीं उनके मंत्रियों ने, लेकिन क्या नरेंद्र मोदी भूल गए हैं कि 2014 में वे तीस वर्ष बाद पहले प्रधानमंत्री बने, जिनको पूर्ण बहुमत मिला था, क्योंकि उन्होंने साबित किया अपने भाषणों से कि वे वास्तव में नेता हैं। यानी नेतृत्व दिखा सकते हैं, जब नेतृत्व दिखाने की नौबत आएगी। उनके नाम से अगर लहर चली थी उस आम चुनाव में, तो सिर्फ इसलिए कि उनके शब्दों में, उनकी तकरीरों में जादू था, जिसकी वजह से उन पर विश्वास करने का निर्णय किया भारत के मतदाताओं ने। प्रधानमंत्री बन जाने के बाद लेकिन मोदी तभी बोले हैं जब कोई चुनावी जलसा होता है या जब मन की बात कहने की जरूरत महसूस करते हैं। उस समय कभी नहीं बोलते हैं जब उनकी सरकार कोई ऐसा कदम उठाती है, जो विवादित या गलत लगता है। यही तो मौके होते हैं प्रधानमंत्रीजी, नेतृत्व दिखाने के। ऐसे मौकों पर न आपके मंत्री आपकी जगह ले सकते हैं और न ही भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता काम आ सकते हैं। पिछले हफ्ते चूंकि मोदी ने फिर मौन रहना ठीक समझा, तो खूब हल्ला मचाया उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी ने।

कांग्रेस अध्यक्ष ने एक बार फिर प्रधानमंत्री पर चोरी और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। और यह भी कहा कि सीबीआई प्रमुख को सिर्फ इसलिए छुट्टी पर भेजा गया है, क्योंकि उन्होंने राफेल सौदे की जांच शुरू कर दी थी। टीवी पत्रकारों के सामने ये आरोप लगाने के बाद राहुल गांधी ने सीबीआई मुख्यालय को अपने साथियों के साथ घेरने की कोशिश की और फिर खुशी-खुशी, खूब मुस्कुराते हुए, गिरफ्तारी दी। मजे की बात यह है कि चूंकि प्रधानमंत्री इन सब हरकतों के बावजूद चुप रहे हैं, सो कांग्रेस अध्यक्ष इस आरोप को लगाने में भी सफल रहे हैं कि सीबीआई का पहली बार गलत इस्तेमाल हो रहा है। अरे राहुल भैया, क्या आपकी याददाश्त इतनी कमजोर है? शायद भूल गए हैं आप, कितनी बार इसी सीबीआई का गलत इस्तेमाल किया है आपकी मम्मी, डैडी और दादी की सरकारों ने। क्या भूल गए हैं राहुलजी कि सीबीआई ने किस तरह ओत्तावियो क्वात्रोकी की मदद की थी? सीबीआई अपना काम कर रही होती तो जब क्वात्रोकी के स्विस खातों में बोफर्स सौदे में रिश्वत का पैसा पाया गया तो उसको कम से कम भारत से रातों रात भागने न देती।

इसके बाद कई विदेशी दौरे किए सीबीआई के जासूसों ने क्वात्रोकी को पकड़ने के बहाने, लेकिन कभी उसके नजदीक भी नहीं पहुंची। क्या भूल गए हैं कांग्रेस अध्यक्ष कि किस तरह सीबीआई की मदद से क्वात्रोकी के खिलाफ सारे आरोप रफा-दफा कर दिए गए थे? सो, लंदन में जो उनके बैंक खाते सील कर दिए थे भारत सरकार के कहने पर, उनको खोल सके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने पहले कार्यकाल के आखिरी दिनों में। सीबीआई का अतीत इस तरह के गलत कामों से इतना दागी रहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस संस्था के बारे में कभी कहा था कि यह एक कैद तोते की तरह सिर्फ अपने ‘मास्टर’ की बातें दोहराता है। इस तरह की बातें जब किसी कांग्रेस समर्थक के सामने की जाती हैं, तो एक ही जवाब होता है उनका : अतीत की बातें छोड़ो, वर्तमान की बातें करो। वर्तमान में वही हो रहा है, जो होता आया है दशकों से, लेकिन मोदी की समस्या यह है कि उन्होंने परिवर्तन का वादा किया था। अफसोस कि परिवर्तन सिर्फ यह आया है कि जो चीजें कांग्रेस सरकारों ने बड़ी समझदारी से की थीं, उन चीजों को मोदी सरकार अनाड़ियों की तरह कर रही है।

सीबीआई में घमासान चल रहा था, तो इसको बहुत पहले क्यों नहीं काबू में लाया गया? नहीं ला सके अगर और सीबीआई प्रमुख को हटाने की आवश्यकता सामने आई तो इसे आधी रात को करने की क्या जरूरत थी? इतना अनाड़ीपन दिखाया है मोदी सरकार ने इस मामले में कि बात सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गई है अब। इसके बाद भी अभी तक प्रधानमंत्री अपनी चुप्पी साधे हुए हैं जैसे पिछले चार वर्षों में उन्होंने हमेशा किया है जब भी बोल कर नेतृत्व दिखाने की जरूरत रही है। ऐसी चुप्पी प्रधानमंत्री जी, मसीहों, साधु-संतों के लिए बेशक शोभा देती होगी, लेकिन राजनेताओं को सिर्फ नुकसान पहुंचाती है। खुशकिस्मत हैं नरेंद्र मोदी कि राहुल गांधी इस किस्म के हर मौके पर कोई न कोई बचकानी बात करके लोगों को फिर याद दिला देते हैं कि मुकाबला अगर उनके और मोदी के बीच होता है, तो उसमें मोदी लीडर दिखते हैं और राहुल ‘बिगड़े दिल शहजादा’। ऐसा अब तक तो है, लेकिन कब तक ऐसा रहेगा, कौन जाने। रहबरी का सवाल है प्रधानमंत्री जी। रहबरी का अभाव अब दिखने लग गया है।

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