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प्रेम जन्मेजय का कॉलम : कौन भरेगा पानी

हिंदी व्यंग्य के अग्रज व्यंग्यकारों ने इसे सार्थक दिशा दी है, इसकी स्वीकार्यता बढ़ाई है, अब हमारा दायित्व है कि इस धरोहर की रक्षा करें।

Author नई दिल्ली | June 12, 2016 12:10 AM
जनसत्ता में प्रेम जनमेजय का कॉलम

हिंदी साहित्य में अपनी उपस्थिति के लिए व्यंग्य-पथ का निर्माण पर्याप्त श्रमपूर्वक किया गया और किया जा रहा है। व्यंग्य को दोधारी तलवार पर चलने जैसा कठिन कहा गया है। व्यंग्य-पथ के निर्माण में भी दोधारी तलवार पर चलने की यह कठिनाई निरंतर चुनौतियां उपस्थित करती रही है। अनेक ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर अपनी-अपनी कुदालियों से पगडंडियां तैयार की गई हैं। अब भी मार्ग में अनेक कांटे और सांप-बिच्छुओं जैसे जीवों की चुनौतियां हैं। हिंदी व्यंग्य को पाठकों का अपार स्नेह मिल रहा है। इस अपार स्नेह के चलते सामयिक व्यंग्य खुद को राजमार्ग पर चलने का दंभ पालने लगा है।

व्यंग्य का आलोचनाशास्त्र अभी तैयार नहीं हुआ और अंडे से निकलने वाला चूजा विलाप कर रहा है कि मेरा कोई मूल्यांकन नहीं कर रहा है। चूजों ने गिरोह बना लिया है और एक-दूसरे का आभासित मूल्यांकन कर अपनी महानता का डंका पीट रहे हैं। एक दंभकाल निर्मित हो रहा है। व्यंग्य प्रवृत्ति पर होना चाहिए, व्यक्ति पर व्यंग्य उसे सीमित और तात्कालिक कर देता है। अधिकतर व्यंग्य के प्रति यही दृष्टिकोण है। यही नहीं, व्यंग्य आलोचना का भी यही दृष्टिकोण विकसित हो रहा है।

हिंदी साहित्य में एक आलोचना दृष्टि रही है, जिसके द्रष्टा ‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोय’, या फिर ‘तुलसी मस्तक तब नवें, धनुष बान हो हाथ’ का भजन गाते रहे हैं। इससे अनेक अखाड़े पैदा हो गए। अखाड़ों के महंतों ने एक अलिखा संविधान रच दिया। पठ्ठे को गीता पर हाथ रख कर कसम खानी होती थी कि मैं अपने अखाड़े के अलावा किसी और की न तो प्रशंसा करूंगा और न ही निंदा। करूंगा तो केवल उपेक्षा। जहां भी जाऊंगा, वहां अखाड़े के संविधान द्वारा निर्धारित नामों की चर्चा करूंगा।

किसी गोष्ठी, किसी पुरस्कार समिति, आदि में किसी पर-पुरुष की ओर देखूंगा भी नहीं। ऐसी पतिव्रता और सच्चरित्रों के कारण आलोचना की बगिया में कहीं वसंत होता तो कहीं पतझड़। हिंदी व्यंग्य आलोचना भी उसी राह पर चल पड़ी है। हिंदी व्यंग्य का दुर्भाग्यकाल दस्तक दे रहा है। तू भी रानी मैं भी रानी तो कौन भरेगा पानी! व्यंग्य में पानी भरने वाले नहीं हैं। सब प्यासे एक-दूसरे को आदेश दे रहे हैं।

परसाई ने लिखा था- ‘व्यंग्य लिखने वाले की कोई एक ट्रेजडी नहीं है। ‘फनी’ से उसे मनुष्यता की भावना से हीन तक समझा जाता है। ‘मजा आ गया से’ लेकर ‘गंभीर हो जाओ’ तक की प्रतिक्रियाएं उसे सुननी पड़ती हैं। … लेकिन इसके बावजूद पाठकों का एक बड़ा वर्ग है, जो व्यंग्य में निहित सामाजिक-राजनीतिक अर्थ-संकेत को समझते हंै।’

पर लगता है कि धीरे-धीरे यह वर्ग कम होता जा रहा है। व्यंग्य से भाग रहा है, क्योंकि तथाकथित व्यंग्य लिखने वाला लेखन के बाजारवाद से प्रभावित व्यंग्य को वस्तु बनाने को तत्पर है। परसाई ने बड़े दर्द के साथ लिखा था- मुझ पर शिष्ट हास्य का रिमार्क चिपक रहा है। यह मुझे हास्यास्पद लगता है। महज हंसाने के लिए मैंने शायद ही कभी कुछ लिखा हो। और शिष्ट तो मैं हूं ही नहीं। कभी ‘शिष्ट हास्य’ कह कर पीठ दिखाने का भी सुभीता होता है। मैंने देखा है- जिस पर तेजाब की बूंदें पड़ती हैं, वह भी दर्द दबा कर, मिथ्या अट्टहास कर कहता है, ‘वाह, शिष्ट हास्य है’! मुझे यह गाली लगती है।’

पर आज स्थिति विपरीत है। कान बहरे हो चुके हैं। कोल्हू के बैल बने रचनाकार एक ही घेरे में घूमते हुए मस्त हैं। बड़े आशीर्वाद की मुद्रा में हैं। कर कमल हो गए हैं, चरण ढूंढ़े नहीं मिल रहे हैं और मुंदे नेत्र न जाने कब खुल कर कृपा करेंगे के प्रतीक्षा-रस से लबाबलब भरे हुए हैं। ऐसे में व्यक्ति मागदर्शक, प्रेरक, आशीर्वाददाता आदि न जाने क्या-क्या हो जाता है। आशीर्वाद लेने और देने की तो हमारे देश में बहुत गहरी परंपरा है, इतनी गहरी कि कुछ लोग एक बार इसमें गिरते हैं तो कुंए के मेढक हो जाते हैं या उस कीचड़ के ऐसे कमल हो जाते हैं, जो हर समय आशीर्वाद से ही लथपथाया रहता है।

संतों की पनहिया सीकरी में जाने से घिसती है, तो अशीर्वाद दाताओं की चरण छुवाई प्रक्रिया में घिसती हैं। सब जानते हैं कि आशीर्वाद देने का अधिकार उसी को है और उसी का आशीर्वाद सार्थक होता है जो धर्म, अर्थ, काम, पद आदि आभूषणों से सुसज्जित होता है, खाली-पीली आशीर्वाद तो नंगे के नहाने और निचोड़ने जैसा या मतदाता के पांच वर्ष में एक बार मत के अधिकार जैसा होता है।

सामयिक हिंदी व्यंग्य के समक्ष दो बड़ी चुनौतियां हैं- उसे सीमित होने से बचाना और उसके गांभीर्य की रक्षा करना। पाठकों से मिले स्नेह के कारण खुद को विशिष्ट मानने वाले व्यंग्यकार न केवल आत्महत्या के मार्ग पर हैं, बल्कि सार्थक और सामाजिक सरोकारों से युक्त व्यंग्य के हत्यारे हैं। व्यंग्यकार साहित्यकार ही होता है और एक साहित्यकार के नाते उसके भी वही सामाजिक सरोकार हैं, जो मशाल की तरह जलने और मार्ग को प्रकाशित करने वाले एक रचनाकार के होने चाहिए। व्यंग्य के कुओं के स्थान पर कम से कम व्यंग्य की बावड़ियों का निर्माण किया जाए।

व्यंग्य की स्वीकार्यता तभी बढ़ेगी जब हम उसे विस्तृत हिंदी साहित्य का हिस्सा समझेंगे। स्वीकार्यता के लिए यह भी आवश्यक है कि हम व्यंग्य के हथियार को भोथरा न करें। बिकने की चाह में उसे लकड़ी की तलवार न बनाएं। वैसे तो सावधानी की आवश्यक्ता हर विधा के लेखन में रहती है, पर व्यंग्य चूंकि हथियार है इसलिए इसके प्रयोग में अधिक सावधानी की आवश्यक्ता है। यह ज्ञान बहुत आवश्यक है कि इस हथियार का उपयोग हम सैनिक की तरह कर रहे हैं या हत्यारे की तरह। किस पर व्यंग्य करना है और किस पर नहीं, इसका विवेक भी आवश्यक है।

हिंदी व्यंग्य के अग्रज व्यंग्यकारों ने इसे सार्थक दिशा दी है, इसकी स्वीकार्यता बढ़ाई है, अब हमारा दायित्व है कि इस धरोहर की रक्षा करें। जैसे देश की आजादी के बाद आजादी का अपने अर्थ में प्रयोग और ‘उपयोग’ करने वाले ‘देशसेवकों’ ने जन्म लिया वैसा जन्म ‘व्यंग्य सेवकों’ का न हो। हिंदी व्यंग्य को शूद्र से ब्राह्मण करने वालों के संघर्ष को व्यर्थ न किया जाए। हिंदी व्यंग्य चाहे ब्राह्मण हुआ हो या क्षत्रिय, उसे जातिवाद से बचाना बहुत आवश्यक है।

व्यंग्य एक जाति नहीं है, वह बहुत बड़े साहित्यिक समाज का एक हिस्सा है। बहुत आवश्यक है जानना कि व्यंग्य किस दिशा में जा रहा है? व्यंग्य पर आलोचकों की दृष्टि क्या है? व्यंग्य कैसा होना चाहिए? व्यंग्य में करुणा क्यों आवश्यक है? कौन-कौन से विदेशी रचनाकार हैं, जिनको पढ़ना चाहिए? लेखन के साथ-साथ अध्ययनशीलता परम आवश्यक है। व्यंग्य सुशिक्षित मस्तिष्क की विधा है। व्यंग्य के अर्थ को पकड़ने के लिए व्यंग्योचित विवेकपूर्ण समझ की आवश्यकता है।

व्यंग्य के घाट पर संतों की लगी भीड़ देख कर अच्छा लगता है। चंदन घिसने का और तिलक करने का मन करता है। पर मन शंकित होता है कि चंदन किसी व्यापारी संत के माथे पर न लग जाए।

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