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चर्चाः बोलियों की ताकत

जनजीवन से बोलियों के विस्थापन का कारण बाजार है। इस तथ्य से हमारे नागरिक समाज को रहस्यमय ढंग से पृथक रखा गया है। लिहाजा, उनका परंपराबोध, भाषाबोध, संस्कृतिबोध, यानी वस्तुबोध और आत्मबोध घटा है। अब वे अभिधा के अलावा अन्य कुछ समझने में अपनी क्षमता को लगाना निरर्थक समझते हैं।

Author October 14, 2018 3:43 AM
जिस भाषा की बोलियां जितनी उर्वर होंगी, उस भाषा का साहित्य उतना ही ताकतवर होगा।

देवशंकर नवीन

पूरे देश में इन दिनों बड़ी बारीकी से भाषा का खेल खेला जा रहा है। देखते-देखते दुनिया भर की हजारों बोलियां लुप्त हो गर्इं, पर आंदोलनधर्मियों को लग रहा है कि बोलियों को परे ठेल कर वे कोई महान सेवा कर रहे हैं। जबकि बोलियों से ही हर भाषा का विकास होता है। शिक्षा, साहित्य और सामाजिक व्यवहार में किसी बोली का योगदान जितना सघन होगा, वह बोली उतनी महत्त्वपूर्ण होगी। कोई भी भाषा कई बोलियों के समेकित समर्थन से ही समृद्ध होती है। अपनी मातृभाषा पर बात करते हुए जब कवि केदारनाथ सिंह की पंक्ति ‘लोकतंत्र के जन्म से बहुत पहले का/ एक जिंदा ध्वनि-लोकतंत्र है यह/ जिसके एक छोटे-से ‘हम’ में/ तुम सुन सकते हो करोड़ों/ ‘मैं’ की धड़कनें’ सामने आती है तो बोलियों के लोकतंत्र का पूरा क्षितिज स्पष्ट हो जाता है। आज के आंदोलनधर्मी इस बात की अनदेखी कर रहे हैं कि भाषा का अपनी बोलियों से वही सरोकार है, जो लोकतंत्र का आम नागरिक से। आम नागरिक के संवर्धन के बिना कोई लोकतंत्र प्रशंसित नहीं हो सकता। ठीक उसी तरह बोलियों की समृद्धि के बिना कोई भाषा आगे नहीं बढ़ सकती।

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जिस भाषा की बोलियां जितनी उर्वर होंगी, उस भाषा का साहित्य उतना ही ताकतवर होगा। अपने समस्त प्राचीन साहित्य पर नजर दौड़ाएं, तो स्पष्ट हो जाएगा कि बोलियों ने ही हमारे पूर्वज रचनाकारों की रचनात्मकता को संपन्न किया है। अमीर खुसरो, विद्यापति, कबीर, सूर, जायसी, तुलसी से लेकर प्रेमचंद, रेणु, नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ सिंह आदि की रचनाएं इस बात का जीवंत उदाहरण हैं। चूंकि साहित्य जनचितवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है, इसलिए हर भाषा के साहित्य में उस भाषिक-क्षेत्र की पूरी जीवन-धारा प्रवाहित रहती है- वहां के नागरिक जीवन की संपूर्ण पद्धति अपने ऐतिहासिक और भौगोलिक संदर्भों के साथ उसमें अनुरक्षित रहती है। और, यह अनुरक्षण बोलियों से ही संभव होता है। ‘मोरा रे अंगनवां चनन केरि गछिया, ताहि चढ़ि कुररय काग रे/ सोने चोंच बांधि देब तोयं वायस, जओं पिया आवत आज रे’ (विद्यापति) या ‘ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय’ या फिर ‘समरथ को नहिं दोष गुसार्इं’ जैसी पंक्तियां महज एक वक्तव्य नहीं, समकालीन जनजीवन की चितवृत्ति का समग्र अनुरक्षण हैं।

असल में भाषा जिन बोलियों की ताकत से समृद्ध होती है, उन बोलियों के स्वनिम, रूपिम और प्रयुक्तियों का उद्भव कामगारों के बीच होता है। वे काम करते हुए, नई-नई गतिविधियों और क्रियाओं को नई-नई संज्ञाएं देते हैं। बीते कुछ दशकों में, जबसे उदारीकरण और वैश्विक बाजार की प्रथा का चलन हुआ है, नागरिक जीवन की समग्र क्रियाशीलता करेंसी जुटाने में एकाग्र हो गई है। मुहावरे, लोकोक्तियां, प्रयुक्तियां आदि जो आम जनजीवन के काम-काज के दौरान पैदा होती थीं, उसके अवसर समाप्त हो गए हैं। अब तो रोटियां बेलने, झाड़ू लगाने, खेतों में बीज बोने, मवेशियों की पगहिया बटने, चटाई बुनने, दीया की बाती गढ़ने, यहां तक कि पूजा के लिए मिट्टी के महादेव गढ़ने की जरूरत नागरिक जीवन से समाप्त हो गई। बाजार में सब कुछ तैयार मिल जाता है, मनुष्य को केवल उपभोग करना है, उपभोग के इन संसाधनों पर स्वामित्व पाने के लिए करेंसी जुटाने की चिंता करनी है- और इस चिंता के सारे रास्ते मनुष्य को अमानवीय और अनैतिक होने के लिए मजबूर करते हैं।

इस एकाग्र चिंता ने जनजीवन को बोलियों से इस कदर विच्छिन्न किया कि अब बोलियों की कई प्रयुक्तियां उन्हें गैरजरूरी के साथ-साथ दुर्बोध भी लगती हैं। ग्राम्य-बोध में जिस ‘कौवे के कुचरने’ से प्रियजन के आगमन की कल्पना की जाती थी, चिट्ठियों में अभिव्यक्त जिन भावनाओं से मन विह्वल हुआ करता था, मोबाइल सेवा ने उन अवसरों को समाप्त कर दिया। अब प्रतीक्षा करने का सुख या कि प्रतीक्षामग्न होने के दुख का सुख मनुष्य के जीवन में रह नहीं गया है। वैज्ञानिक विकास से उपलब्ध संसाधन का उपभोग तो ठीक माना जा सकता है, पर सबसे घातक बात जो हुई है, वह यह कि लोग इन प्रसंगों को अब समझ भी नहीं पा रहे हैं। गौरतलब है कि अपनी तमाम सहजता के बावजूद बोलियों की प्रयुक्तियां भाषा में अर्थध्वनियों का विस्तार भरती हैं। भाषा और बोली के इस अन्योन्याश्रय संबंध को कवि केदारनाथ सिंह की कविता ‘देश और घर’ की इन पंक्तियों में स्पष्टता से समझा जा सकता है- हिंदी मेरा देश है/ भोजपुरी मेरा घर/ घर से निकलता हूं/ तो चला जाता हूं देश में/ देश से छुट्टी मिलती है/ तो लौट आता हूं घर/ इस आवाजाही में/ कई बार घर में चला आता है देश/ देश में कई बार/ छूट जाता है घर/ मैं दोनों को प्यार करता हूं/ और देखिए न मेरी मुश्किल/ पिछले साठ बरसों से/ दोनों में दोनों को/ खोज रहा हूं।’ भाषा और बोली के सरोकार की ऐसी विलक्षण परिभाषा शायद ही किसी भाषावैज्ञानिक सूत्र में हो।

जॉन स्टुअर्ट मिल ने अगर भाषा को मस्तिष्क का प्रकाश कहा, तो तय मानें कि उसका ध्वन्यार्थ कहीं बोलियों के उस प्रभाव में ही है, जिसकी जीवनी ताकत से भाषा यह प्रकाश पाती है। इस दृष्टि से हमें भाषा की समृद्धि के लिए बोलियों की समृद्धि पर बल देना मुनासिब लगता है- हर घर समृद्ध रहे तो देश की समृद्धि पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगा सकता। हमारे पूर्वकालिक साहित्य के अवलोकन से स्पष्ट है कि बोलियों के अनुरक्षण में लोक-कंठ की व्याप्ति के साथ-साथ साहित्य में उपस्थित उनकी छवियों का भी बड़ा योगदान है। और, प्रामाणिक सत्य तो यह है कि बोलियों का रिश्ता ध्वनियों से है, लोक-कंठ और साहित्य मात्र ही इसके अनुरक्षण के अन्यतम उपाय हैं। एक ही मुहावरे का उच्चारण मिथिला, भोजपुर, अवध, ब्रज, बंग, उत्कल, द्रविड़ में एक समान नहीं होगा। व्यक्ति और वाचिक-क्षेत्र के परिवर्तन से ध्वनि विशेष के उच्चारण की विधियां बदलती रहती हैं, लिहजा ये लोक-कंठ और साहित्यिक प्रस्तुति के सातत्य में ही सुरक्षित रह सकती हैं।

जनजीवन से बोलियों के विस्थापन का कारण बाजार है। इस तथ्य से हमारे नागरिक समाज को रहस्यमय ढंग से पृथक रखा गया है। लिहाजा, उनका परंपराबोध, भाषाबोध, संस्कृतिबोध, यानी वस्तुबोध और आत्मबोध घटा है। अब वे अभिधा के अलावा अन्य कुछ समझने में अपनी क्षमता को लगाना निरर्थक समझते हैं। इधर रचनाकारों की मुश्किलें इस तरह बढ़ी हैं कि वे जिन जीवन-सत्यों को उकेरना चाहते हैं, कोशीय शब्दों के सहारे उनके चित्र प्रभावी नहीं हो पाते, वे कमजोर लगते हैं और बोलियों का सहारा लेने पर पाठक कहीं छूटने-से लगते हैं।

सन 1927 में जब जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने अपनी ‘ए लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया’ पुस्तक में सर्वप्रथम उपभाषाओं और बोलियों में हिंदी का वर्गीकरण किया, उससे पूर्व एक भाषाई एटलस बनाने के लिए जर्मनी में जोहान एंड्रियास श्मेलर ने उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम चरण में बोलियों का पहला तुलनात्मक अध्ययन कराया था। इन विशेष अध्ययनों ने ही भाषा और बोली का ऐसा संघर्ष पैदा किया हो और देखते-देखते संसार की बेशुमार बोलियां नष्ट हो गई हों, बची-खुची बोलियों पर आधुनिकता के वक्तव्यवीर और क्रांति शिरोमणि फरसा चला रहे हों। ओछे स्वार्थ के लिए दिग्भ्रांत आखेटकों ने इन वर्गीकरणों का सहारा नहीं लिया, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। कितनी लाख चीखों/ कितने करोड़ विलापों-चीत्कारों के बाद/ किसी आंख से टपकी/ एक बूंद को नाम मिला- ‘आंसू’/ कौन बताएगा/ ‘बूंद’ से ‘आंसू’ कितना भारी है।’ केदारनाथ सिंह की कविता ‘आंसू का वजन’ की ये पंक्तियां एक साथ भाषा में बोलियों की रचनात्मक भूमिका का महत्त्व भी स्थापित करती हैं और रचनात्मकता से क्रमश: गायब होती बोलियों की प्रयुक्तियों पर निकले आंसू का वजन मापने को मजबूर भी करती हैं। हमें याद रखने की जरूरत है कि बोलियों की प्रयुक्तियां खोते हुए हम अपने पांव तले की जमीन खो रहे हैं।

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