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दूसरी नजर: एक अच्छा मौका गंवा दिया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए पंद्र्रह अगस्त से पहले का दिन आत्मचिंतन का रहा होगा। यह दिन उनके लिए इस बात पर विचार का था कि आखिर उनकी सरकार ने इतने ज्यादा हालात क्यों बिगड़ने दिए और नई शुरुआत कर स्थितियों को कैसे संभाला जाए। मुझे पूरी उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री संक्षिप्त और गंभीर भाषण देंगे और अतीत की गलतियों को स्वीकार कर लेंगे और राज्यों तथा विपक्षी दलों के साथ सलाह-मशविरे से शासन चलाने का वादा करेंगे।

PM Modi, Independence day,लाला किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते प्रधानमंंत्री मोदी। (फोटो-PTI)

यह साधारण पंद्रह अगस्त नहीं था। पिछले तिहत्तर साल में ऐसा कभी नहीं हुआ, जब स्वतंत्रता दिवस बिना बच्चों, बिना झंडों, मिठाइयों और उल्लास के मनाया गया हो, और इस बार भीड़ तो नहीं ही थी। इससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था जब भारत को इतनी भंयकर मंदी (जिसके चार से दस फीसद रहने की भविष्यवाणी की गई है) का सामना करना पड़ा हो। कभी ऐसा नहीं हुआ जब पूरा देश महामारी की गिरफ्त में आ गया और लोगों को अपने घरों में ही रहने को मजबूर होना पड़ा, और कभी ऐसा नहीं हुआ था जब भारत के सारे पड़ोसी उसे किसी न किसी रूप में अपना बाहुबल दिखा कर झुका रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए पंद्र्रह अगस्त से पहले का दिन आत्मचिंतन का रहा होगा। यह दिन उनके लिए इस बात पर विचार का था कि आखिर उनकी सरकार ने इतने ज्यादा हालात क्यों बिगड़ने दिए और नई शुरुआत कर स्थितियों को कैसे संभाला जाए। मुझे पूरी उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री संक्षिप्त और गंभीर भाषण देंगे और अतीत की गलतियों को स्वीकार कर लेंगे और राज्यों तथा विपक्षी दलों के साथ सलाह-मशविरे से शासन चलाने का वादा करेंगे।

तीन सुरंगों में
इस तरह का मामला था नहीं। उलटे, प्रधानमंत्री नब्बे मिनट तक बोले, जैसा कि उनका स्वभाव है। वे तेजी से बोलते गए, कहीं कोई विराम नहीं था और आवाज हमेशा की तरह ही दमदार थी। उनके प्रशंसक कहेंगे कि यह तो उनकी दक्ष कला का ही प्रदर्शन था।

मेरा मानना है कि यह उनका दिखावटी आत्मविश्वास था। हालांकि उनके प्रशंसकों ने यह गौर किया होगा, जो मैंने भी किया, वह यह कि प्रधानमंत्री एक बार भी मुस्कराए नहीं, यहां तक कि कैमरों के लिए भी नहीं। मुझे लगता है कि वे भारी दबाव में हैं, क्योंकि देश जिन तीन अंधेरी सुरंगों- गिरती अर्थव्यवस्था, महामारी और भारतीय क्षेत्र पर कब्जा, में फंस गया है, उससे निकलने के लिए कोई रोशनी नहीं नजर आ रही।

मोदी सरकार का पक्के तौर पर यह मानना रहा है कि लोग ज्यादा समय तक कुछ याद नहीं रखते। इसका एक उदाहरण है। संचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने 5 दिसंबर, 2014 को कहा था कि ‘हम सभी ग्राम पंचायतों में आप्टिकल फाइबर बिछा रहे हैं। इस परियोजना को लेकर प्रधानमंत्री बहुत ही उत्सुक हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि रवि इस काम को 2016 के आखिर तक पूरा हो जाना सुनिश्चिित करें। हमें सात लाख किलोमीटर की आॅप्टिकल फाइबर केबल बिछाना है।’ उन्होंने यह भी संकेत दिया कि पचास हजार ग्राम पंचायतों में यह काम वित्त वर्ष 2014-15 तक, मार्च 2016 तक एक लाख में और वर्ष 2016 के अंत तक और एक लाख ग्राम पंचायतों में पूरा कर दिए जाने का लक्ष्य है।

पंद्रह अगस्त को प्रधानमंत्री ने एलान किया कि ‘अगले एक हजार दिनों में देशभर के सारे गांवों को आप्टिकल फाइबर कनेक्शन उपलब्ध हो जाएगा।’ मुझे लगता है कि ‘पंचायत’ और ‘गांव’ शब्द को लेकर कोई खेल है। मार्च, 2020 तक ग्राम पंचायतों को जोड़ने, घरों तक आप्टिकल फाइबर कनेक्शन और ब्रॉडबैंड पहुंचाने का कोई लक्ष्य पूरा नहीं हुआ था। डिजिटल जीवन गुणवत्ता के सूचकांक में पचासी देशों में भारत का स्थान उन्यासीवां है। इस सरकार में पारदर्शिता और तथ्यों की भारी कमी है।

दावे ज्यादा, हकीकत कम
गैर-पारदर्शिता के इसी क्रम में और भी दावे किए गए। दावा- हमारी प्राथमिकता देश को कोविड महामारी से बाहर निकालने की है, जो हमें निर्बाध होकर काम करने से रोक रही है।
हकीकत- सरकार बमुश्किल ही कुछ कर रही है, यहां तक कि राज्यों को पैसा भी नहीं दिया जा रहा है, जो महामारी से लड़ने के लिए अग्रिम मोर्चे पर काम कर रहे हैं और कई मायनों में कामयाबी हासिल भी की है। भारत उन कुछ देशों में से है, जहां महामारी तेजी से बढ़ रही है। संक्रमण के नए मामले (69 हजार और बढ़ भी रहे हैं) सामने आने के लिहाज से भारत शीर्ष पर है और सितंबर के तीसरे हफ्ते तक भारत में कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा पचास लाख को पार कर जाएगा।

भारत का बनाया टीका आने में अभी साल भर लगेगा। अगर हमें रूस, ब्रिटेन या अमेरिका में बना टीका मिल भी जाता है, तो उसे संपूर्ण आबादी तक पहुंचा पाना भारी-भरकम काम है। भारत में लोग तेजी से महामारी की गिरफ्त में आ रहे हैं और जनसांख्यिकी व जन्मजात प्रतिरोधक क्षमता से बच पा रहे हैं, अस्सी फीसद मामले बिना लक्षणों वाले हैं, शायद डीएनए और भाग्य का कुछ मामला हो।

दावा- हमें ‘मेक इन इंडिया’ की तरह ही ‘मेक फॉर वर्ल्ड’ के मंत्र को लेकर बढ़ना होगा।
हकीकत- ‘मेक इन इंडिया’ का मूल नारा 2014 में दिया गया था और असाधारण रूप से नाकाम रहा। 2015-16 से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में विनिर्माण की भागीदारी तकरीबन 16.6 फीसद पर ही स्थिर बनी रही और 2019-20 में गिर कर 15.9 फीसद पर आ गई। जो कारोबारी निर्यात 2013-14 में 315 अरब अमेरिकी डॉलर को पार गया था, वह पिछले छह साल में सिर्फ एक बार 2018-19 में 330 अरब डॉलर तक पहुंच पाया। उच्च आयात शुल्क (संरक्षणवादी शुल्कों सहित), गैर-शुल्क बाधाएं, मात्रात्मक प्रतिबंध, काली सूची आदि के कारण विनिर्माण बुरी तरह से चरमरा गया है।

चीन की चुनौती
दावा- चाहे आतंकवाद हो या विस्तारवाद, भारत दोनों ही मामलों में सख्ती से खड़ा रहा है और इन्हें शिकस्त देता रहा है। एलओसी से लेकर एलएसी तक, जब कभी भारत को चुनौती दी गई है, हमारे सैनिकों ने उन्हें उसी भाषा में जवाब दिया है, जो वे समझते हैं।

हकीकत- शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करना पूरी तरह से जायज है। सबसे ताजा घटना 15-16 जून की है, जब गलवान घाटी में बीस सैनिक शहीद हो गए थे। लेकिन यह अभी तक रहस्य बना हुआ है कि क्या वे पर्याप्त तैयारी न होने की वजह से मारे गए या फिर गलत निर्देशों के कारण। प्रधानमंत्री का बयान कि ‘भारतीय क्षेत्र में कोई नहीं घुसा और भारतीय क्षेत्र में कोई मौजूद नहीं है’ सैनिकों के साथ-साथ नागरिकों के भीतर भी गुस्सा पैदा करता है।

हमलावर का नाम लेने से एकदम परहेज करना पूरी तरह से अस्पष्ट है, जबकि भारत का विदेश मंत्रालय चीन को डिमार्शे भी दे चुका है। गलवान घाटी, पैंगोग त्सो और देपसांग में चीनी सैनिक अब भी भारतीय क्षेत्र में डटे हुए हैं। चीन पूरी तरह से सैनिकों को पीछे हटाने या सैनिक कम करने की बात को व्यावहारिक रूप से खारिज कर चुका है। प्रधानमंत्री की निजी शिखर कूटनीति अब अपमान पर आकर खत्म हुई है। यह वक्त बदलाव का है, जब विदेश मंत्रालय में दक्ष राजनयिक हों और उन पर भरोसा किया जाए।

अप्रत्याशित साल में देश की स्थिति का दो टूक ब्योरा देने के लिहाज से पंद्रह अगस्त, 2020 को एक अच्छा मौका गंवा दिया गया।

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