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तवलीन सिंह का कॉलम: UP में PM मोदी सबसे बड़ी राजनीतिक हार का सामना करने वाले हैं?

यह वही प्रदेश है जिसने नरेंद्र मोदी को पचहत्तर लोकसभा सीटें न दी होती 2014 में तो शायद पूर्ण बहुमत उनको न मिलता।

Author नई दिल्ली | July 24, 2016 7:57 AM
राज्य में गौ हत्या पर प्रतिबंध नहीं है लेकिन अगर गाय का वध करना ही हो तो कुछ नियमों का पालन करना होता है।

राजनेता उस समय नेतृत्व दिखाना भूल जाते हैं जब नेतृत्व की गंभीर जरूरत होती है, तो उन्हें कीमत चुकानी पड़ती है इस भूल की। क्या कुछ ऐसा ही हुआ है नरेंद्र मोदी के साथ? गोरक्षक पिछले दो सालों में पागल हो गए हैं, इतना कि न उनको कानून की परवाह रही है, न देश के माथे पर कलंक लगने की और इस दौरान प्रधानमंत्री ने एक बार भी स्पष्ट नहीं किया कि उनको इनकी हरकतें पसंद नहीं हैं। कुछ बोले होते जब मोहम्मद अखलाक को निहायत बर्बरता से मारा दादरी के गोरक्षकों ने, तो शायद गुजरात के ऊना गांव के गोरक्षक दलितों के साथ वह न करते जिसके कारण आज सारा देश शर्मिंदा है।

सच पूछिए तो मैंने जब उन चार दलित नौजवानों को पीटे जाने वाला विडियो देखा तो मुझे लगा कि असली हो ही नहीं सकता। यकीन नहीं आया कि सरेआम इन लड़कों को गाड़ी से बांध कर लोहे के सरियों से पीटा जा सकता है और कोई कुछ न करे। कहां थे पुलिसवाले? कहां थे स्थानीय अधिकारी? कहां थी ऊना की जनता? क्यों नहीं किसी ने कुछ किया इन गोरक्षक गुंडों को रोकने के लिए? सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि कहां थीं गुजरात की मुख्यमंत्री और क्यों नहीं दस दिन तक उनकी तरफ से ऊना जाकर कानून-व्यवस्था ठीक करने की कोई कोशिश हुई? आखिर में तभी गर्इं पीड़ित परिवारों से मिलने, जब देश भर में हल्ला मच गया और गुजरात के शहरों में दलित लोग सड़कों पर उतर आए और कइयों ने आत्महत्या करने की कोशिश की अपना क्रोध व्यक्त करने के लिए। तब तक संसद में भी बहस शुरू हो गई थी इस शर्मनाक वारदात को लेकर और गृहमंत्री को स्पष्ट करना पड़ा कि प्रधानमंत्री बहुत दुखी हुए हैं इस घटना से।

प्रधानमंत्री की दलित समस्या लेकिन उस दिन और बढ़ गई, क्योंकि संसद में बहस दलितों पर अत्याचार की हो ही रही थी कि उत्तर प्रदेश से उनके एक साथी ने मायावती के बारे में इतनी गंदी बात कही कि यहां दोहरा नहीं सकती हूं। अगर उन्होंने मायावती की राजनीतिक मदद करने के वास्ते जानबूझ कर उनको गाली दी होती तो इससे बड़ी मदद नहीं कर सकते थे दयाशंकर सिंह। आग की तरह दलित समाज में फैल गई उनकी बात। देश भर में उनके खिलाफ प्रदर्शन हुए और मायावती का डूबा हुआ तारा उत्तर प्रदेश के आसमान में फिर से चमकने लगा।

डूबा है अगर किसी का तारा तो भारतीय जनता पार्टी का। इसलिए कि अब तकरीबन तय है कि उत्तर प्रदेश में जीतना इस दल के लिए असंभव हो गया है। यह वही प्रदेश है जिसने नरेंद्र मोदी को पचहत्तर लोकसभा सीटें न दी होती 2014 में तो शायद पूर्ण बहुमत उनको न मिलता। सो, इस प्रदेश में हारना उनके लिए बहुत भारी पड़ेगा, खासकर इसलिए भी कि इस विधानसभा चुनाव को राजनीतिक पंडित 2019 के लोकसभा चुनावों का रिहर्सल जैसा देख रहे हैं। सो, बेहिसाब नुकसान कर चुके हैं गोरक्षक उस राजनीतिक दल का, जिसकी शरण लेकर वे अपनी हरकतें कर रहे हैं पिछले साल से।

शुरुआत हुई तब जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने बीफ पर प्रतिबंध लगाया। यह प्रतिबंध क्या लगा कि गोरक्षकों के जैसे अच्छे दिन आ गए। जगह-जगह दिखने लगे ये लोग उनको धमकाते हुए, जो मवेशियों के कारोबार से जुड़े होने के नाते इधर से उधर ले जाते हैं गाय-भैंसों को। उनके वाहनों पर हमले शुरू हुए और फिर मोहम्मद अखलाक को जान से मारा दादरी के गोरक्षकों ने। उस समय अगर प्रधानमंत्री कुछ कहते तो शायद जाहिद रसूल भट नाम के सोलह वर्षीय कश्मीरी युवक को उधमपुर के गोरक्षक जिंदा न जलाते। जाहिद का दोष सिर्फ यह था कि उसने अपने भाई के ट्रक में दिल्ली तक लिफ्ट लेने की कोशिश की। इस ट्रक में गायों को देख कर गोरक्षक हिंसा पर उतर आए, बिना कुछ पूछे, बिना कुछ जाने। जाहिद की हत्या की खबर जब कश्मीर घाटी में फैली तो आम कश्मीरियों को एक और वजह मिल गई भारत से नफरत करने की।

उस समय भी प्रधानमंत्री चुप रहे और गोरक्षकों के हौसले और बुलंद होते गए। नुकसान सिर्फ मुसलमानों का नहीं हुआ, हिंदुओं का भी उतना ही हुआ है। पिछले साल पुष्कर मेले में डर के मारे कोई जानवर बेचने आया ही नहीं, सो मेले में चौरानबे फीसद कम बिक्री हुई मवेशियों की। जाहिर है कि घाटा सिर्फ मुसलमानों का नहीं हुआ। सच तो यह है कि गाय हिंदू बेशक मारते न हों, लेकिन चमड़े के कारोबार में ज्यादातर हिंदू ही होते हैं। सो, कोल्हापुर से खबर आई थी पिछले साल कि चमड़े के अभाव की वजह से कोल्हापुरी चप्पलें कम बन रही हैं। न किसी ने उनकी बातें सुनी और न किसी राजनेता ने हमदर्दी जताई।

गोरक्षकों के हौसले और बुलंद हुए। इतने बुलंद कि नतीजा था ऊना का हादसा। नतीजा यह भी है कि अब उत्तर प्रदेश में नरेंद्र मोदी अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक हार का सामना शायद करने वाले हैं। उत्तर प्रदेश को अपनाने के लिए उन्होंने वाराणसी से चुनाव लड़ा और अपनी गुजरात वाली सीट त्याग कर वाराणसी के सांसद बन कर रहे। लेकिन बिना दलितों और मुसलमानों के समर्थन के उत्तर प्रदेश को जीतना तकरीबन असंभव है। वैसे भी हवा मायावती के पक्ष में थी और अब हवा तूफान बन सकती है। अब भी प्रधानमंत्री की तरफ से कोई ऐसा बयान नहीं आया है, जो साबित करे कि उनको गोरक्षकों की हिंसा पसंद नहीं है। मुमकिन है कि इस चुप्पी का खमियाजा देश भर में भुगतना होगा।

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