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साहित्यकार की जगह

हिंदी लेखक आज भी पता नहीं कैसे इस मुगालते में हैं कि भाषा नहीं बचेगी फिर भी साहित्य बचा रहेगा।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर हुआ है।

दिनेश कुमार

यह प्रश्न कभी-कभी बहुत बेचैन करता है कि साठ करोड़ से भी अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली विश्व की दूसरी सबसे बड़ी भाषा हिंदी में उसके लेखकों और साहित्यकारों की कोई हैसियत क्यों नहीं है? विश्व की दूसरी भाषाओं की बात न करें तो भी अन्य भारतीय भाषाओं जैसे बांग्ला, मराठी, तेलुगू, मलयालम, तमिल आदि में जो महत्त्वपूर्ण स्थान उनके लेखकों को प्राप्त है, उसका हिंदी में नितांत अभाव है। स्वयं हिंदी के साहित्यकार भी यह शिकायत करते रहते हैं कि अन्य भाषा-भाषी लेखकों की तुलना में उनकी स्थिति बदहाल है और किसी परेशानी की स्थिति में उनकी खोज-खबर लेने वाला कोई नहीं होता। इस बात में सच्चाई तो है कि हिंदीभाषी समाज में अपने साहित्यकारों के प्रति उपेक्षा का भाव है, पर बड़ा प्रश्न यह है कि इस उपेक्षा-भाव का कारण क्या है? क्या सारा दोष हिंदीभाषी समाज का है या इसके लिए बहुत हद तक हमारा साहित्यकार भी जिम्मेवार है? इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

किसी भी भाषा और उसके साहित्य के बीच बहुत गहरा रिश्ता होता है। एक का अस्तित्व दूसरे पर निर्भर करता है। अगर भाषा का महत्त्व कम होगा तो उस भाषा में रचित साहित्य का महत्त्व अनिवार्यत: कम हो जाएगा। फलस्वरूप साहित्यकार का महत्त्व स्वत: घट जाएगा। साहित्य और साहित्यकार की महत्ता भाषा की महत्ता पर निर्भर करती है। भाषा निर्णायक तत्त्व है। जो भाषा शक्तिशाली होगी, उसका साहित्यकार भी शक्तिशाली होगा। भाषा की ताकत ही साहित्यकार की ताकत होती है। भाषा की ताकत इस बात पर निर्भर करती है कि उस भाषा को बोलने वाला समाज उसके प्रति कितना सचेत और प्रतिबद्ध है। वह अपनी भाषा से किस हद तक प्यार करता है। जो समाज अपनी भाषा से जितना अधिक प्यार करता है वह अपने साहित्यकारों को उतना ही अधिक महत्त्व देता है। इसलिए साहित्य और साहित्यकार की प्रतिष्ठा का सवाल मूलरूप से भाषा की प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ है। इस बात को हमारे आरंभिक लेखक बहुत अच्छी तरह समझते थे। स्वयं भारतेंदु और उस युग के दूसरे लेखकों ने भाषा के प्रश्न को अपने अस्तित्व का प्रश्न बनाया। उन्होंने साहित्य-रचना के साथ-साथ हिंदी के प्रचार-प्रसार और महत्त्व को स्थापित करने के लिए अथक प्रयास किया। भारतेंदु का मूल मंत्र ही यही था कि ‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल’। भारतेंदु से लेकर प्रेमचंद तक थोड़ी बहुत मतभिन्नता के बावजूद लगभग सभी लेखक हिंदी के अस्तित्व और सम्मान की लड़ाई लड़ते रहे।

प्रेमचंद के बाद हिंदी में किसिम-किसिम के साहित्यिक आंदोलन शुरू हुए। कहीं विषय-वस्तु को महत्त्व दिया गया तो कहीं प्रयोग को। धीरे-धीरे भाषा का सवाल पूछे छूटता गया। लेखक अपने को साहित्यिक रचना तक सीमित करने लगे। हिंदी के प्रचार-प्रसार और प्रतिष्ठा दिलाने के अभियान तथा साहित्य निर्माण के अभियान में स्पष्ट अलगाव पैदा हो गया। हिंदी के लेखकों ने हिंदी भाषा की चिंता लगभग छोड़ दी। उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष के दौरान अपनी भाषा के प्रति जो गौरव का भाव पैदा हुआ था वह आजादी के बाद क्रमश: क्षीण होता गया। दूसरी तरफ अंग्रेजी का वर्चस्व घटने की जगह और बढ़ता गया। आजादी के बाद लेखकों ने हिंदी भाषा के लिए शायद ही कोई बड़ा संघर्ष किया हो। राममनोहर लोहिया के भारतीय भाषाओं के पक्ष में शुरू किए गए अंग्रेजी हटाओ आंदोलन से कुछ लेखकों की सहानुभूति और बात है।

भाषा और साहित्यिक रचनाशीलता के प्रश्न को एक दूसरे से अलग कर देना हिंदी साहित्य और साहित्यकारों के लिए आत्मघाती साबित हुआ है। स्वतंत्रता प्राप्ति के शुरुआती दशकों में तो इसका दुष्परिणाम प्रत्यक्ष रूप से इसलिए नहीं दिखा क्योंकि उस समय तक वह पीढ़ी जीवित थी, जिसका अतीत राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ा हुआ था। इसका असल दुष्परिणाम उदारीकरण के बाद विशेषकर अब देखने को मिल रहा है। आज हिंदी में साहित्य तो खूब रचा जा रहा है पर उसे पढ़ने वाला कोई नहीं है। हिंदी का पूरा मध्यवर्ग अंग्रेजी में ‘शिफ्ट’ हो गया है। निजी स्कूलों से हिंदी की बेदखली की प्रक्रिया बहुत तेज हो गई है। बच्चे बहुत मजबूरी में ही हिंदी पढ़ रहे हैं। स्वयं हिंदी के साहित्यकार और अध्यापक भी अपने बच्चों को हिंदी पढ़ने से हतोत्साहित करते हैं। स्थिति इस कदर भयावह हो चुकी है कि हिंदी साहित्य के नए पाठक पैदा नहीं हो रहे हैं और पुराने धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं।

हिंदी लेखक आज भी पता नहीं कैसे इस मुगालते में हैं कि भाषा नहीं बचेगी फिर भी साहित्य बचा रहेगा। पाठकविहीन साहित्यकार की स्थिति क्या होगी, इसे कोई भी समझ सकता है। यह अकारण नहीं है कि अभी हिंदी में बतौर साहित्यकार किसी की कोई हैसियत नहीं है। उसकी थोड़ी-बहुत पूछ इसलिए है कि वह संस्था का अध्यक्ष है, किसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर है, कोई अधिकारी है या किसी अन्य पद पर है। बतौर लेखक प्रतिष्ठा पाने के लिए हिंदीभाषी समाज के भीतर और उसके बाहर हिंदी भाषा की प्रतिष्ठा जरूरी है। हिंदी लेखक अगर लेखक के तौर पर वह सामाजिक हैसियत पाना चाहता है, जो अब भी दूसरी भारतीय भाषाओं के लेखकों को प्राप्त है, तो उसे साहित्य सृजन के साथ-साथ हिंदी भाषा के लिए संघर्ष करना ही होगा। इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है।
हिंदीभाषी समाज की स्थिति थोड़ी जटिल है। यह एक ऐसा समाज है जो अपनी भाषा को लेकर जबरदस्त हीनता-बोध से भरा हुआ है। उसे अपनी भाषा से तनिक भी लगाव या प्रेम नहीं है। यहां का व्यक्ति सिर्फ और सिर्फ मजबूरी या लाचारी में हिंदी बोलता है। जैसे ही वह थोड़ा पढ़ता-लिखता है सबसे पहले अपनी भाषा को तिलांजलि देता है। जो समाज अपनी ही मातृभाषा को लेकर शर्म महसूस करता हो वह उस भाषा के साहित्य को कैसे महत्त्व दे सकता है? जो भाषा उसके लिए शर्म और पिछड़ेपन का प्रतीक है, उस भाषा के साहित्य को भी वह हिकारत की दृष्टि से ही देखेगा। दूसरी भारतीय भाषाओं में ऐसी स्थिति नहीं है। हालांकि अंग्रेजी का हमला वहां भी हो रहा है पर वे आज भी अपनी भाषाई अस्मिता के प्रति सचेत हैं। भाषा के आधार पर वहां एक उपराष्ट्रीयता विकसित हुई है। उन्हें अपनी भाषा पर गर्व है। वे वैज्ञानिक हों, डॉक्टर हों, इंजीनियर हों या किसी भी पेशे से संबद्ध हों, अपने साहित्यकारों से न सिर्फ परिचित होते हैं बल्कि उनका लिखा पढ़ते भी हैं। बांग्ला, मराठी, तेलुगू, तमिल, कन्नड़, मलयालम आदि भाषाओं के लेखकों का अपने समाज पर असर भी है। यह अकारण नहीं था कि सिंगूर और नंदीग्राम की हिंसा के विरुद्ध जब महाश्वेता देवी और अन्य संस्कृतिकर्मी कोलकाता के सड़कों पर निकले थे तो हजारों-हजार लोग उनके साथ निकल आए।
ऐसे में, हिंदी के साहित्यकार को एक नागरिक के तौर पर हिंदीभाषी समाज से जुड़ने की सबसे अधिक आवश्यकता है। लेखन और भाषणों में व्यवस्था-विरोध से अधिक जीवन में व्यवस्था-विरोध जरूरी है। लेखन में क्रांतिकारिता और जीवन में तरह-तरह के समझौते करना हिंदी के लेखकों का चरित्र बन चुका है। किसी भी अन्य भाषा की तुलना में हिंदी का लेखक अधिक सत्तापरस्त है। उसके पाखंडपूर्ण आचरण ने बतौर साहित्यकार उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को नष्ट कर दिया है। हिंदीभाषी समाज की नजर में उसकी विश्वसनीयता पूरी तरह संदिग्ध हो गई है। उसके आचरण के कारण यह समाज उसकी आवाज को नैतिक आवाज के रूप में ग्रहण नहीं करता। सवाल है कि अगर कोई साहित्यकार अपने लेखन और आचरण से समाज की बुराइयों और विकृतियों से अलग नैतिकता का कोई उच्च मानदंड स्थापित नहीं करता तो फिर समाज उसकी परवाह क्यों करेगा? आज हिंदी के लेखकों की चरम उपलब्धि घर-परिवार की देखरेख और अपने बाल-बच्चों की अच्छी परवरिश है। व्यापक समाज से कटे पाठकविहीन हिंदी लेखक की अंतिम शरणस्थली सत्ता-संस्थान होते हैं। सत्ता-संस्थान से जुड़ते ही साहित्य और सत्य के पक्ष में खड़े होने की उसकी ताकत समाप्त होती जाती है। आज हिंदी में ऐसे रचनाकार शायद ही दिखें जो लगातार सत्ता के विरुद्ध और सत्य के पक्ष में खड़े होते हों। यही वजह है कि हिंदी का बड़ा से बड़ा लेखक, कवि या आलोचक इस स्थिति में नहीं है कि वह हिंदीभाषी समाज के एक छोटे हिस्से को भी अपने साथ खड़ा कर सके या उन पर कोई प्रभाव डाल सके।

 

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