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संदर्भ: नस्लवाद और शिक्षा

नस्लवाद को खत्म करने के लिए हमें सबसे पहले अपने स्कूल की पाठ्य पुस्तकों में से तथ्य-रहित नस्लवादी इतिहास हटाना होगा। शिक्षा के सुधार का यह काम न तो पश्चिम की ओर ताकने वाले बाबू करेंगे, और न ही हमारे नेता। यह काम हमें खुद करना होगा, सार्वजनिक बहस के आधार पर।

CRIME, CRIME NEWSअश्वेत नागरिक की मौत के बाद अमेरिका के लगभग सभी शहरों में प्रदर्शन हुए। फोटो सोर्स – सोशल मीडिया

चंद्रकांत राजू
अमेरिका में एक गोरे पुलिस अफसर ने हथकड़ी में बंधे काले जॉर्ज फ्लॉयड की बर्बरता से हत्या की। उसके बाद नस्लवाद के खिलाफ दुनिया भर में प्रदर्शन हुए। सवाल है कि नस्लवाद अब तक कायम क्यों है? देखा जाए तो 1863 में ही अमेरिका में कालों की गुलामी समाप्त हो गई। 1452 से बाइबल का हवाला देकर अश्वेतों की गुलामी को न केवल नैतिक ठहराया, बल्कि उसका महिमागान किया गया। इसलिए गुलामी खत्म होने के बाद भी कानूनी अलगाव एक और सदी के लिए बना रहा।

विरोध के बाद यह भी खत्म हुआ, लेकिन तब भी अमेरिका ने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेदी सरकार का और चालीस साल तक समर्थन किया। रंगभेदी सरकार का पतन हुआ। उसके बाद दक्षिण अफ्रीका के पूर्व-कालीन केवल श्वेतों के लिए बने विश्वविद्यालों ने अश्वेत छात्रों को मजबूरन भर्ती किया। पर इसके दो दशक बाद भी केवल पांच प्रतिशत अश्वेत किसी प्रकार की उच्च शिक्षा में कामयाब हुए।

अश्वेतों को शैक्षिक ‘मूल्यांकन’ के हवाले नीचा ठहराया गया। इससे रोड्स-मस्ट-फाल नाम से प्रसिद्ध 2015 का नस्लवाद-विरोधी आंदोलन पैदा हुआ, जिसके दौरान केपटाउन में (रोड्स स्कॉलरशिप की प्रसिद्धि वाले) सेसिल रोड्स की मूर्ति को गिरा दिया गया, हालांकि उसकी मूर्ति अब भी आक्सफोर्ड में खड़ी है।

नस्लवाद इसलिए कायम है, क्योंकि हमारी शिक्षा प्रणाली नस्लवादी मूल्य सिखाती है, विज्ञान के एक झूठे इतिहास और दर्शन के सहारे। नैतिकता के प्रसिद्ध दार्शनिक इमैनुएल कांट ने स्पष्ट कहा कि अश्वेतों को चाबुक मार कर मौन रखना चाहिए। कांट ने माना कि अश्वेत रचनात्मक नहीं हैं। इसलिए उन्हें हीन बताया। कांट ने उस झूठे इतिहास को आंख मूंद कर माना, जो कि गोरों को ज्यादातर बौद्धिक उपलब्धियों का श्रेय देता है, अश्वेतों को कुछ नहीं। उस इतिहास को एफ्रोसेंट्रिस्ट्स ने चुनौती दी है।

उनका दावा है कि मिस्र (अफ्रीका) के काले लोगों की उपलब्धियों का श्रेय धोखाधड़ी से श्वेत यूनानियों को दिया गया। वैसे यह झूठा इतिहास सबसे पहले मुसलमानों के खिलाफ हुई मजहबी जंग (क्रूसेड) के दौरान चर्च ने गढ़ा। चर्च ने कहा कि कब्जे में आए अरबी ग्रंथों में लगभग सारा ज्ञान यूनानी मूल का है, इसलिए चर्च की विरासत है।

नस्लवादी इतिहासकारों ने आर्यन नस्ल की अटकलों के बाद इस झूठे इतिहास को खूब बढ़ावा दिया। मिस्र की उपलब्धियों को व्यवस्थित रूप से गोरे यूनानियों की उपलब्धियों में परिवर्तित किया। उस नस्लवादी इतिहास ने गोरों को बौद्धिक रूप से श्रेष्ठ दर्शाया। इसकी वैधता की जांच किए बिना उसे आज भी दुनिया भर में सिखाया जाता है। यह इतिहास कई प्राथमिक तथ्यों के खिलाफ है। मसलन, हमारी नौवीं कक्षा की एनसीइआरटी गणित की पाठ्य पुस्तक बच्चों को एक श्वेत यूक्लिड की छवि दिखाती है, जिसे ज्यामिति का पिता घोषित किया जाता है। छवि एक टकसाली गोरे की है। इसके विरोध के बाद एनसीईआरटी ने छवि बदल दी। पर छवि अब भी गोरे की है, लेकिन स्टीरियोटाइप नहीं!

थियोन के कुछ ही समय बाद पांचवीं सदी में प्रोक्लुस ने एलेमेंट्स पर भाष्य लिखा। इसलिए इसका लेखक थियोन और प्रोक्लुस के बीच का है। ज्यादा संभावना यही है कि थियोन की बेटी और प्रसिद्ध गणितज्ञ हैपेशिया इस किताब की लेखिका थी। इस बात की पुष्टि इससे भी होती है कि एलेमेंट्स के ग्रीक भाष्यकार भी एलेमेंट्स के लेखक को गुमनाम रखते हैं, हालांकि वे सभी दूसरे लेखकों का नाम से जिक्र करते हैं। गुमनामी का कारण क्या है? वह इसी बात से समझ सकते हैं कि हैपेशिया का बड़े ही क्रूर ढंग से चर्च में बलात्कार और कत्ल हुआ, क्योंकि वह अलेक्जेंड्रिया से थी। इसलिए ज्यादा संभावना यही है कि वह काली थी।

रोड्स-मस्ट-फाल आंदोलन के बाद ‘कन्वर्सेशन’ नामक पत्रिका में 2016 के छपे एक लेख में यही बात दोहराई कि यूक्लिड वास्तव में एक काली महिला थी। लेख वायरल हुआ, लेकिन प्रकाशन के बाद सेंसर किया, पहले एक दक्षिण अफ्रीका के संपादक ने, और फिर दुनिया भर में उन लोगों ने जिन्होंने इस लेख को पुन: प्रकाशित किया था। आज तक कोई भी इस सेंसर किए गए लेख के एक भी तथ्य या तर्क को चुनौती नहीं दे सका। बाद में वही लेख जर्नल आॅफ ब्लैक स्टडीज में और नस्लवाद के खिलाफ प्रदर्शनकारियों के आॅक्सफोर्ड समूह से रोड्स-मस्ट-फाल पुस्तक में पुन: प्रकाशित किया गया।

इसी तरह ‘पाइथागोरस प्रमेय’ की बात हमारी कक्षा दसवीं की एनसीइआरटी की गणित की पुस्तक में बत्तीस बार दोहराई गई है। मिस्र में बड़े-बड़े पिरामिडों का निर्माण हुआ। इसके बावजूद नस्लवादी इतिहासकारों का दावा है कि मिस्र के लोगों को पाइथागोरस प्रमेय की समझ नहीं थी और इस प्रमेय का एक ‘श्रेष्ठ’ प्रमाण केवल यूनानियों को पता था। वास्तव में पाइथागोरस के अस्तित्व का ही कोई सबूत नहीं है। तो निश्चित रूप से उसकी त्वचा के रंग का कोई सबूत नहीं है।

उसने उसके नाम के प्रमेय का सबूत दिया था या वह सबूत क्या था, इसके बार में भी किसी को जानकारी नहीं। और जैसा कि बर्ट्रेंड रसेल ने एक सदी पहले समझाया था यूक्लिड के एलेमेंट्स में पाए गए पायथागोरस प्रमेय का प्रमाण भी कोई श्रेष्ठ प्रमाण नहीं है। वह भारतीय परंपरा में उपलब्ध प्रमाणों से अलग नहीं है, हालांकि अति विस्तृत है।

पाइथागोरस प्रमेय का उपयोगी वर्णन अफ्रीकी और भारतीय रज्जु ज्यामिति (मानव शुल्ब सूत्र 10.10) में पाया जाता है। लेकिन इसमें वर्गमूल शामिल हैं। वर्गमूल निकालना मिस्र और भारत के लोग तो जानते थे, लेकिन यूनानी नहीं। वे तो साधारण भिन्न भी अच्छे से नहीं जानते थे। यूनानी उपलब्धियों का नस्लवादी इतिहास बारहवीं से सोलहवीं शताब्दी के अविश्वसनीय और मिश्रित स्रोतों पर गढ़ा गया है। गैर-पाठीय साक्ष्य उसके खिलाफ हैं। अवर ग्रीक अंकगणित ने अवर विज्ञान पैदा किया। उदाहरण के लिए ‘ग्रीक कैलेंड्स’ एक सामान्य रोमन मजाक था।

हालांकि संशोधित रोमन (जूलियन) कैलेंडर भी दोषपूर्ण था। हमारा वर्तमान कैलेंडर इसके 1582 के ग्रेगोरियन सुधार पर आधारित है। तब भी यूरोप में भिन्न के ज्ञान के अभाव में लीप वर्ष प्रणाली का प्रयोग जारी रखा। साल की अवधि 365/4 दिन बता न सके, इसलिए हर चौथे साल को 366 दिन का बना दिया, जिससे चार साल की औसत अवधि वही आ जाती है।

इसी प्रकार ग्रेगोरियन सुधार के समय यूरोपीय दशमलव 365/241 या भिन्न 241/1000 बोल नहीं पाए। इसलिए हर चौथे साल को 366 दिन, लेकिन हर सौवें साल को 365 दिन का और हर हजारवें साल को 366 दिन का बताया। इसलिए ग्रेगोरियन कैलेंडर उष्ण कटिबंधीय वर्ष का सही मान केवल एक हजार वर्ष के औसत पर ही दे पाता है, प्रत्येक वर्ष का नहीं।

इसी तरह अरस्तू, आर्किमिडीज आदि के ग्रंथों के लिए कोई दृढ़ सबूत नहीं हैं। इसके विपरीत यूनानियों के पास विज्ञान विकसित करने के लिए सामाजिक परिस्थितियों का अभाव था। वे अंधविश्वासी थे। ओरेकल की भविष्यवाणी पर विश्वास करते थे, और सुकरात को, एनाक्सागोरस जैसे, खगोल विज्ञान करने के आरोप में मौत की सजा दी।

नस्लवाद को खत्म करने के लिए हमें सबसे पहले अपने स्कूल की पाठ्य पुस्तकों में से तथ्य-रहित नस्लवादी इतिहास हटाना होगा। शिक्षा के सुधार का यह काम न तो पश्चिम की ओर ताकने वाले बाबू करेंगे, और न ही हमारे नेता। यह काम हमें खुद करना होगा, सार्वजनिक बहस के आधार पर।

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