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सुधीश पचौरी का कॉलम बाखबर: मरते महानगर

संसद की बहसें वाया लोकसभा टीवी। उनमें से कुछ टुकड़े चैनल उठा लेते हैं और उनकी शामें बहसीली बन जाती हैं।

संसद की बहसें वाया लोकसभा टीवी। उनमें से कुछ टुकड़े चैनल उठा लेते हैं और उनकी शामें बहसीली बन जाती हैं। खरगे के मुंह से निकला ही था ‘रक्तपात’ शब्द कि एंकर ने सबको बताया कि उस शब्द को संसद की कार्यवाही से निकाल दिया गया है, तब भी चैनल पर संबित महापात्रा ने रक्तपात पर आपत्ति कर डाली।

हर रोज कहीं न कहीं से कोई एक शब्द, एक मुहावरा सबको तंग कर जाता है और वही राष्ट्रीय बहस बन उठता है। संसद ने दो दिन सहिष्णुता पर सहिष्णु बहस करनी चाही। लेकिन ऐसी असहिष्णु बहस हुई कि बची-खुची सहिष्णुता भी डर के मारे कूच गर गई! असहिष्णु से असहिष्णु होकर बात करना कहां की सहिष्णुता ठहरी? राजनाथजी ने व्यंग्योक्ति में कुछ वाक्य कहे, जो बे-ताली गए।

राहुलजी ने जितनी देर बोला उत्तेजित होकर बोला। बोलते वक्त सहिष्णु न दिखे तो असहिष्णुओं को कैसे कायल करोगे महाराज! इतना गुस्सा सेहत के लिए ठीक नहीं। एंकर को पंद्रह मिनट देशभक्ति का दौरा पड़ा। पंद्रह मिनट में उनको धिक्कारा गया, जो छब्बीस ग्यारह की याद में सिनेमा हॉल में जनगणमन के वक्त सादर खड़े न हुए, फिर उनको लताड़ा गया, जिनने ‘न खड़े होने वालों’ को लताड़ा!

सीएनएन आइबीएन ने खबर की पूंछ थामी कि छब्बीस ग्यारह की स्मृति में जनगणमन होते वक्त सिनेमा हॉल में एक परिवार बैठा रहा। कुछ लोगों ने उनकी वहीं खबर ली। टाइम्स नाउ ने भी खबर की पूंछ पकड़ी। एंकर ने पहले लताड़ने वालों को धिक्कारा फिर उस परिवार को धिक्कारा, जो छब्बीस ग्यारह की स्मृति में उस समय खड़ा तक न हुआ, जिस समय जनगणमन हॉल में बजा! सबको लताड़ने के बाद बचा क्या?

मोदीजी ने इसी बीच संसद में कहा कि देशभक्ति की परीक्षा हर समय नहीं ली जा सकती। काश इधर ध्यान गया होगा तो उस परिवार के खड़े न होने पर कोसा न गया होता!
एक अंगरेजी चैनल लाइन मारता है: चेन्नई डूबी दिल्ली का दम निकला!
दूसरा चैनल पहले को टक्कर देता है: दिल्ली सबसे गंदा शहर!
इस बीच राष्ट्रपति का वाक्य लाइन बन कर उभरता है: गंदगी सड़कों पर नहीं, हमारे दिमागों में है! क्या गजब बात कह दी, मानो कबीर साहब की बानी ही कह दी राष्ट्रपतिजी ने कि तबियत ‘खुशखुशाम’ हो गई! एक वाक्य सारे स्वच्छ भारत अभियान पर भारी है!
चेन्नई डूबती है, दिल्ली खांसती है, एंकर स्टूडियो में एक सुरक्षित बहस जुटाता है। एक ओर पर्यावरणविद, दूसरी ओर पर्यावरणमंत्री, तीसरी ओर दिल्ली के कार्बन-कण गिनने वाले विद्वान!
पर्यावरणविद: कठोर कार्रवाई जरूरी। डीजल ट्रक-कारें बंद करो अभी और इसी वक्त, नहीं तो दिल्ली मर जाएगी।
मंत्री: कर रहे हैं यूरो चार-पांच-छह लाएंगे, दिल्ली को बचाएंगे, आप परेशान न हों।
कार्बन-कण विद्वान: राजधानी खतरनाक धुएं की चपेट में है।
इंडिया टुडे ने भी कह दिया है कि दिल्ली बेजिंग से ज्यादा गंदी है। चेन्नई में सात दिन बारिश अभी और आनी है।
एक विद्वान: सिस्टम काम करेगा, निराशा न फैलाएं! लोग हिम्मत वाले हैं।
समस्या कहीं, समाधान दिल्ली की चर्चाओं में। चर्चा से बाढ़ रोको, चर्चा से दिल्ली के स्कूल बंद कराओ, ताकि बच्चे बीमार न हों, बड़े जाएं भाड़ में!
खांसती-मरती दिल्ली में इतने स्वस्थ लोग कहां से निकल आए, ताकि सबको बता सकें कि दिल्ली एक मरता हुआ शहर है और चेन्नई डूबा हुआ शहर!
संसद में सीपीएम के सलीम साहब की बड़ी कच्ची हुई। बहस में बोलते हुए राजनाथजी को कह तो गए कि ‘आठ सौ साल बाद आया हिंदू रूल’ कहा था, लेकिन जब खबर ली गई तो चुप होना पड़ा!
पेरिस में मोदी-नवाज शरीफ मिलन! एक दुर्लभ दृश्य! वैसा अंतरंग मित्रालाप कब दिखा? क्रीम रंग के बड़े सोफे पर मोदीजी नवाज शरीफ की ओर कुछ ज्यादा झुक कर कनफुसिया रहे हैं। चैनल लाइन दे रहे हैं: ये है ‘आइस बे्रकर’! यहां भी समझाने वाले विद्वान यानी केसी सिंह, पार्थसारथी, एक पाकिस्तानी भी सामने हैं! टाइम्स नाउ का एंकर एक सौ साठ मिनट की इस कनबतिया को बर्फ तोड़ने वाला बता कर खुश था। अगर कोई और बंदा होता तो देशभक्त एंकर गुस्से से बिफर रहा होता!
सबसे खराब आइटम दो नजर आए। पहला, बाबा रामदेव की ‘एबीपी प्रेस कॉनफ्रेंस’ और दूसरा टाइम्स नाउ में पहलाज निहलानीजी से अर्णव का लंबा इंटरव्यू, जिसे दो-तीन बार दिखाया गया।

बाबा जब भी आते हैं अपनी मोसमियत को इस कदर तानते हैं कि हंसी आती है। एक सवाल के जवाब में वे कहने लगे कि वे ‘किस’ का मतलब नहीं जानते थे और एक स्त्री उनसे जब अकेले में मिलने आई तो… धन्य हैं बाबाजी आप! ऐसे प्रसंग अकथित ही रहने दिए जाते तो क्या बिगड़ जाता!

टाइम्स नाउ के एंकर ने निहलानी का जो हाल किया वह देखने लायक था। एंकर अर्णव हर वाक्य में निहलानी को ‘संस्कारी सेंसर’ कह कर बात करते और निहलानी उनसे कहते रहते थे कि मुझे पूरी बात तो कहने दो। इस बीच निहलानी की कई फिल्मों का जिक्र एंकर ने किया, जो उतनी संस्कारी नहीं थीं। लेकिन निहलानी ठहरे धरती पकड़। रद्दे खा-खा कर भी जमीन पकड़े रहे। आखिर में एंकर ने कहा: आप कैमरे की ओर मुंह करके अपनी बात कहिए और जब वे कैमरे की ओर मुखातिब होकर सफाई देने लगे तो पीछे से एंकर तरह-तरह से हाथ हिला कर, चेहरा बना-बना कर उनकी खिल्ली उड़ाते रहे! हमें लगा हम टाइम्स नाउ नहीं, साइरस भडूचा का ‘द वीक दैट वाजंट’ देख रहे हैं!

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