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तीरंदाज़ : काला धंधा गोरे लोग

अमेरिका और ब्रिटेन एक और काला काम बड़ी सफाई से कर रहे हैं- वे चोरी का पैसा अपने यहां जमीन-जायदाद की खरीद-फरोख्त में लगवा रहे हैं।

Author नई दिल्ली | April 10, 2016 01:12 am
प्रभाष सांखला: प्रभाष सांखला रिटायर सरकारी अधिकारी हैं। पनामा पेपर्स के अनुसार वे लोटस हॉरिजोन एस कंपनी में डायरेक्‍टर हैं। इसमें उनका नाम और पता भी दर्ज है। उनकी बेटी और दामाद का नाम भी इसमें दर्ज है। इस बारे में पूछे जाने पर उन्‍होंने कहा कि मैं केवल मानद डायरेक्‍टर हूं। मेरे दामाद की कनाडा और अमेरिका में एविएशन कंपनी है। मेरा इससे कोई लेना देना नहीं है। नोटिस मिलेगा तो जवाब दे दूंगा।

पनामा पेपर्स या पनामा नामक देश में छिपी काली कमाई पर दुनिया भर में हाय-तौबा मची है। आइसलैंड के प्रधानमंत्री इस्तीफा दे रहे हैं और ब्रिटिश राजनेताओं के साथ रूस, चीन आदि बड़े देशों के प्रभावशाली लोग भी इसकी लपेट में आ गए हैं। भारत के भी कुछ नाम इस सूची में शामिल हैं, पर अभी यह कहना मुश्किल है कि उन्होंने बाहर निवेश करके देश का कोई कानून तोड़ा है या नहीं। अपनी ओर से भारत सरकार कह रही है कि जांच दल इस सूची को खंगालने में जुट गया है और अगर कोई आपराधिक तौर पर लिप्त पाया गया तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

पर ये सब सिर्फ बातें हैं। पिछले करीब साठ साल से काले धन का धंधा फल-फूल रहा है और विश्व भर की सरकारों को खूब पता है कि कौन-सा पैसा कहां से आता है और कहां जाता है। पनामा, केमन आइलैंड, ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड जैसे छोटे-मोटे देश इसमें उतने ही लिप्त हैं, जितने स्विट्जरलैंड, आॅस्ट्रिया, सिंगापुर, मॉरिशस, ब्रिटेन या अमेरिका। वास्तव में अगर देखा जाए तो काले धन को संरक्षण देने वालों में ब्रिटेन और अमेरिका सबसे आगे हैं। गौरतलब है कि पनामा स्वतंत्र देश जरूर है, पर अमेरिका की निगरानी में है, जैसे ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड वगैरह ब्रिटेन के अधीनस्थ हैं।

काले धन का जंजाल कितना बड़ा है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिका और चीन की अर्थव्यवस्थाएं मिल कर भी इसका मुकाबला नहीं कर सकती हैं। अमेरिकी अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है- लगभग अठारह खरब डॉलर। चीन ग्यारह खरब डॉलर पर है। दोनों की मेहनत मजदूरी कुल मिलकर उनतीस खरब डॉलर बनती है। दूसरी तरफ चोरी की कमाई का विशाल बत्तीस खरब डॉलर का आंकड़ा है। जाहिर है कि काले धन की सत्ता विश्व के दो सबसे शक्तिशाली देशों पर भारी पड़ती है।

भारत की अर्थसत्ता काले धन की प्रभुता के सामने चींटी मात्र है। दो खरब डॉलर वाले भारत जैसे पंद्रह-सोलह देश इसकी काया में अस्त हो सकते हैं। भारत को छोड़िए, जापान, जर्मनी, फ्रांस या फिर रूस जैसे दबदबे वाले देश भी धन देवता के सामने बौने हैं। सरहदें तोड़ते, मार्क्सवाद और पूंजीवाद जैसी बाधाओं से परे, दुनिया भर के काले चोर आपस में सगे भाई हैं। चोट चाहे किसी भी भाई को लगे, दर्द सब महसूस करते हैं और फिर मिल कर संकट हर लेने में लग जाते हैं।

वैसे पनामा जैसे देश तो बेचारे सिर्फ बदनामी उठाने के लिए बने हैं। उनका वास्तव में चोरी की कमाई से कोई लेना-देना नहीं है। वह केवल एक पता है उन कागजात के लिए, जो प्रभावशाली लोग प्रभावशाली देशों से भेजते रहते हैं। इन कागजों और पैसों से कंपनी बनती है और नोटों का श्याम रंग हर कर गायब हो जाती है। अगर देखा जाए तो पनामा जैसे देश छोटे-मोटे धोबीघाट हैं, जहां मुद्रा की महज धुलाई-सफाई होती है। न तो वह उनका पैसा है और न ही उनके पास रहता है। असली खिलाड़ी पैसे धोबीघाट नहीं भेजते, वे उनको बड़े-बड़े देशों में ड्राई क्लीन कराते हैं जैसे अमेरिका में या फिर ब्रिटेन में।

हम लोग पनामा पर ही अटके हैं, जबकि असली काला धंधा अमेरिका में हो रहा है। यही वजह है कि पनामा पेपर्स में अमेरिकी नागरिकों का नाम अभी तक नहीं आया है। एक सर्वेक्षण के अनुसार अमेरिका फर्जी कंपनी खोलने और पैसा इधर का उधर करने के लिए दुनिया में सबसे सहज देश है। केन्या उससे थोड़ा-सा आगे है और ब्रिटेन थोड़ा-सा पीछे। दरअसल, आज की तारीख में सहजता और गुमनामी के मामले में अमेरिका स्विट्जरलैंड या पनामा से कहीं आगे है, जबकि बदनाम ये दो देश हैं। हममें से बहुतों को नहीं पता है कि अमेरिका के डेलावेर, नेवाडा, साउथ डाकोटा और व्योमिंग जैसे प्रदेश चोर रईसों को अपना लूट का माल छिपाने में अधिकृत तौर से मदद करते हैं। डेलावेर के राजस्व का एक तिहाई हिस्सा उसके मुद्रा-धोबीघाट से आता है। अन्य राज्य भी कंपनियां खोलने और बंद करने के लिए मोटी रकम लेते हैं। काला धन उनके लिए राजस्व का मुख्य स्रोत है। मजेदार बात यह है कि पनामा की मोससैक फोनसेका कंपनी का दफ्तर व्योमिंग, नेवाडा और फ्लोरिडा में भी है। कुख्यात शस्त्र विक्रेता विक्टोर बाउट, जिसे मौत का सौदागर के नाम से भी जाना जाता है, अपना धंधा फर्जी अमेरिकी कंपनियों के जरिए ही चलाता है।

अमेरिका और ब्रिटेन एक और काला काम बड़ी सफाई से कर रहे हैं- वे चोरी का पैसा अपने यहां जमीन-जायदाद की खरीद-फरोख्त में लगवा रहे हैं। अमेरिका में अगर प्रॉपर्टी में कोई विदेशी पैसा लगाता है, तो उससे आय के स्रोत नहीं पूछे जाते। ब्रिटेन में भी यही हाल है। लंदन को ही ले लीजिए। इस शहर के प्रॉपर्टी रेट पूरे ब्रिटेन की अर्थव्यस्था को संभाले हुए है। लंदन के आवासीय स्टॉक की कीमत भारत की संपूर्ण अर्थव्यवस्था से ज्यादा है। यानी 2.5 खरब डॉलर। लंदन का एक वर्ग मील का इलाका, जिसको फाइनेंशियल डिस्ट्रिक कहते हैं, हर साल ब्रिटेन की जीडीपी में चौंसठ अरब डॉलर डालता है। इतने बड़े कारोबार और ऊंची कीमतों के पीछे दुनिया भर के वे काले चोर हैं, जिन्हें ब्रिटिश सरकार अपने यहां प्रॉपर्टी में पैसे लगाने की अनुमति देती है।

वैसे ब्रिटिश और अमेरिकी सरकारें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार खोटे सिक्कों पर रोक लगाने पर बड़े-बड़े भाषण देती रही है। प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने 2013 के जी-8 शिखर सम्मेलन में कर चोरी और काले धन को खत्म करने की कसम खाई थी, जबकि अब हमें पता चला है कि वे खुद पनामा के जरिए खोटा पैसा कमा रहे थे। हिंदुस्तान हो, अमेरिका या फिर ब्रिटेन, काला धन वापस लाना या उसकी रोकथाम सिर्फ एक जुमला भर है, जिसे रोबदार लोग हम आप जैसे आम लोगों पर यों ही कसते रहते हैं, कभी चुनाव जीतने के लिए और कभी अपनी छवि बनाने के लिए, जबकि मन, तन और धन से काले चोर के साथ हैं।

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